सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसुदर्शन चक्र : १८४
(२) जो भाव अपने स्वामी या शुभ ग्रह से युक्त दृष्ट हो उस भाव की वृद्धि होती है
जिस भाव में पाप ग्रह का योग या दृष्टि हो उस भाव की हानि होती है ।
इस प्रकार ग्रहों का शुभत्व और अशुभत्व विचार कर भावों में ग्रहों के योग और
दृष्टि के अनुसार फल विचारना ।
(३) जिस भाव में ग्रह हो उस भाव का फल उसी ग्रह के अनुसार विचारना ।
(४) जिस भाव में ग्रह न हो उस भाव पर जिस ग्रह की दृष्टि हो उसके अनुसार
फल विचारना।
(५) जिस भाव में केवल शुभ ग्रह का योग या दृष्टि हो उस भाव का फल शुभ
जानना ।
जिस भाव में केवल पाप ग्रह का योग या दृष्टि हो उस भाव का फल अशुभ
न जानना ।
जिसमें शुभ और पाप ग्रह दोनों की दृष्टि या योग हों तो मिश्र फल होगा । इसमें
भी शुभाधिक्य से शभ फल पापाधिक्य से अशुभ फल होगा ।
शुभ और पाप ग्रह दोनों बराबर हों तो उनका वल देखकर जिसका बल अधिक
हो उसका फल कहना । इसी प्रकार दृष्टि के सम्बन्ध में भी विचार करना ।
(६) जिस भाव में कोई ग्रह न हो और न किसी ग्रह की दृष्टि हो तो उस भाव
के स्वामी के अनुसार फल विचारना ।
(७) शुभत्व अशुभत्व का विशेष विचार ।
स्वाभाविक शुभ ग्रह यदि सप्त वर्ग में पाप वर्ग में पड़े तो शुभत्व नष्ट हो जाता है ।
स्वाभाविक पाप ग्रह यदि सप्त वर्ग में शुभ वर्ग में पड़े तो शुभप्रद हो जाता है ।
(८) अपनी राशि ओर शुभ ग्रह के वर्ग शुभ होते हैं । पाप ग्रह, शत्रु और नीचराशि के वर्ग अशुभ होते हैं।
( ९) पाप ग्रह भी अधिक शुभ व में हो तो शुभ हो जाता है क्योंकि शुभ वर्ग
में आने से उसका पापत्व नष्ट हो जाता है ।
अशुभ वर्ग में शुभ ग्रह का शुभत्व नष्ट हो जाता है। इससे उसका फल कहा है ।
(१०) इस प्रकार सप्त वर्ग में ग्रहों का वर्ग निकाल कर उनके शुभत्व पर विचार
करना और भावों के भी वर्ग निकालकर उनका भी शुभत्व अशुभत्व पर विचार करना
पश्चात् सुदर्शन चक्र की स्थिति पर विचार कर फळ विचारना ।
( ११ ) सुदर्शन चक्र में राहु केतु का भी विचार होता है इससे इनका भी सप्त
बगे निकाल लेना चाहिये ।
(१२) वर्ग में ५ या अधिक वर्ग में शुभ ग्रह हो तो शुभ । ४ शुभ का वर्ग होने
से मध्यम । कम शुभ वर्ग होने से ग्रह पाप फलप्रद समझा जायेगा जैसा आगे उदा-
हरण देकर बताया है ।