भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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२८४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

गमन विषय हानि साफल्य राया न लोटे मृत्यु हो।

रण विषय नाश शत्रु मोरने वाला भंग मृत्यु तथा भंग

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यह चक्र बहुधा गोल बनाया जाता है परन्तु सुगमता के निमित्त यहाँ चौकोर

बनाया गया है । किसी प्रकार बनाओ परन्तु इसमें कुंडली के १२ स्थान अवश्य होने

चाहिये । इसमें सबसे नीचे भीतर पहिले लग्न कुंडली रहती है उसके ऊपर चंद्र कुंडली

पूरी रहती है और सबसे ऊपर सूर्य कुंडली रहती है जैपा यहाँ बनाया है चक्र देखने से

सब समझ में'आ जायगा।

लग्न कुंडली के अनुसार को ऊपर रखकर लग्न कुडली यहाँ भर दी गई है।

चंद्र जिस राशि पर है वह राशि ऊपर रखकर बीच में पूरी चंद्र कुंडली भर दी गई

है । सबसे ऊपर सूर्यं जिस राशि में है उसे ऊपर रखकर कुंडली रख दी गई है।

यास्तव में लग्न कुण्डली ही है जो यहाँ ३ प्रकार से एकत्र रख दी गई है जिससे कि

तीनों प्रकार की कुण्डली से एक साथ किसी भाग का विचार किया जा सके ।

इसमें विशेषता यही है कि लग्न चंद्र ओर सूर्य तीनों एक भाव में अर्थात्‌ लग्त

भाव में आ जाते हैं । इसी को इस चक्र का लग्न भाव समझकर पूरी सुदर्शन कुण्डली

का विचार ( करना ) अर्थात्‌ लग्न के आगे धन भाव फिर सहज भाव आदि क्रमशः

मानकर उनका फल विचारना ।

यदि सूर्य और चन्द्र लग्न में ही हों तो इस सुदर्शन चक्र की कुण्डली लिखने की

आवश्यकता नहीं रहेगी। सूर्य ओर चंद्र जब पृथक्‌-पृथक्‌ राशियों में लग्न से अन्य

राशि में हों तब ही इस चक्र द्वारा फल विचारने की आवश्यकता होगी ।

(१) उपरोक्त सुदर्शन चक्र की कुण्डली में लग्न भाव में सूर्य शुभ माना जाता

है अन्य भाव में पाप समझा जाता है । पाप ग्रह की उच्च या स्वराशि में हो तो अशुभ

फल नहीं देगा ।