भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 454 में से

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पृष्ठ 205

गजादि चक्र : १९५

अन्यमत से वक्रो शनि का पुरुषाकार चक्र

जिस नक्षत्र पर वक्री शनि हो उस नक्षत्र से जन्म तक का फल विलोम (उल्टो

क्रम से विचारना ४ नक्षत्र दाहिना हाथ फल-रोग । ६ नक्षत्र पैर-छाभ। ४ नक्षत्र

चाँया हाथ-द्रव्य लाभ । ५ नक्षत्र पैर-बन्धन । ३ नक्षत्र मस्तक-पूजा । २ नक्षत्र नेत्र￾जन सौख्य । ३ नक्षत्र गुदा-अल्प मृत्यु ।

गज चक्र

यात्रा और युद्ध में जय का विचार इससे होता है । अभिजित सहित २८ नक्षत्र

हाथी का चित्र बनाकर क्रमानुसार लिखना। पहिले मुख से लेकर निम्न क्रम से नक्षत्र

{लखे और उसके अनुसार फल विचारे---

२ नक्षत्र मुख में = युद्ध में विजय

२ नक्षत्र सूंड के अग्र भाग में = युद्ध में विजय

२ नक्षत्र नेत्रों में = युद्ध में विजय

२ नक्षत्र कर्णो में = वली हो तब भी मृत्यु या भंग हो

२ नक्षत्र सिर में = जीत

८ नक्षत्र पाँच में = बली हो तब भी मृत्यु या भंग

२ नक्षत्र पूँछ में = बली हो तब भी मृत्यु या भंग

४ नक्षत्र पीठ में = बली हो तब भी मृत्यु या भंग

४ नक्षात्र पेट में = युद्ध में जीत

यहाँ बताये अशुभ अङ्ग में यदि शनि हो तो युद्ध, राज्याभिषेक आदि सवथा

वर्जित है ।

अश्व चक्र

यात्रा, युद्ध, राजतिळक आदि में इसका विचार होता है ।

घोड़े का चित्र बनाकर अभिजित सहित २८ नक्षत्र उसके मुख से लेकर नीचे

बताये क्रम से लिखे फिर उसके फल का विचार करे ।

२ नक्षत्र मुख = शत्रु हार कर वश हो जावे

२ नक्षत्र नेत्र ८ शत्रु हार कर वश हो जावे

२ नक्षत्र काना = शत्रु हार कर वश हो जावे

२ नक्षत्र सिर = शत्रु हार कर वश में हो जावे

२ नक्षत्र पूंछ = विभ्रम, भंग और हानि

८ नक्षत्र पाँव = विश्वम, भंग और हानि

५ नक्षत्र पेट = विश्रग, भंग और हानि

५ नक्षत्र पीठ = विभ्रम, भंग और हानि

जिस नक्षत्र में शनि हो उसके अनुसार फळ का विचार करे ।

यमदंष्ट्रा चक्र

यह काळ चक्र सर्पाकार होता है वतमान दिन नक्षत्र से अर्थात्‌ गोचर फे चन्द्र

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