सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआयुर्दाय विचार : २०९
में मंगल हो तो बूढ़ा भी युवा के तुल्य समझा जावे ( शंभु० ) । लग्न में मंगल हो तो जातक वृद्ध होकर भी युवा के समान रहता है ( जा० सं० ) । युवा होकर बालक समान- -लग्न में बुध हो तो युवा भी बालक समझा जाता है। न अति बूढ़ा न अति युवा--लूग्न में चन्द्र शनि हो तो न अति वृद्ध न अति युवा मालूम पड़े ( शंभु० ) । लग्न में चन्द्र शुक्र हो तो न अति वृद्ध और न अति युवा
के समान रहे ( जा० सं० )।
स्वभाव से वृद्ध-जिसके २ वळवान् वृद्ध ग्रह छन्न में हों तो वह स्वभाव से ही
वृद्ध रहता है और सव जनों में मान पाने योग्य रहता है ( जा० सं० ) । दीर्घायु योग ( ७० वषं के ऊपर आयु )
दीर्घायु १--षष्ठेश ६ या १२ भाव में हो, व्ययेश १२,१ या ८ भाव में हो ।
दीर्घायु २--लग्नेश या अष्टमेश स्वगृही होकर अपने नवांश में या अधिमित्र के
नवांश में न बेठ कर मित्र के नवांश में हो । ( जैमिनी )
दीर्घायु ३--शुभ ग्रहों से युक्त अष्टमेश उच्च का केन्द्र या त्रिकोण में हो ।
चिरायु ४--अष्टमेश अष्टम में और लग्नेश लग्न में हो । ( जैमिनी )
चिरायु ५--शुभग्नह शुभ राशि में अष्टम में होकर शुभग्रह से दृष्ट हो । (जेमिनी)
दीर्घायु ६--अष्टमेश अपने गृह में हो । ( जैमिनी )
दीर्घायु ७--लग्नेश और अष्टमेश ६ या १२ भाव में शुक्र ग्रह युक्त हो। (जैमिनी)
दीर्घायु द--दशमेश लग्नेश और अष्टमेश केन्द्र त्रिकोण या लाभ में हो।
( जेमिनी ) ४
दीर्घायु ९--अष्टमेश केन्द्र में हो ( वृ०्पा० )
दीर्घायु १०--षष्ठेश या द्वादशेश ६-१२-१ या ८ भाव में हो (वृ० पा० )
दीर्घायु १९--पंचमेश लग्नेश और अष्टमेश यदि स्वराशि या स्वनवोश में या मित्र गृही हो ( बृ०पा० ) ।
दीर्घायु १२-लग्नेश, अष्टमेश, दशमेश और शनि ये केन्द्र त्रिकोण में हो । ( इन
चारों में जो बलवान् हो उसकी स्थिति से आयु निर्णय करना ) 1
दीर्घायु १३-लग्नेश उच्च में, चन्द्र ११ वें घर में, गुरु अष्टम भाव में हो (वृ.पा.)
दीर्घायु धनी १४-बली लग्नेश, केन्द्र स्थित शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो घन और सब
गुणों से युक्त दीर्घायु हो ( वृ०्पा० ) ।
दीर्घायु धनी १५-लग्नेश, बुध, गुरु, या शुक्र यदि केन्द्र त्रिकोण में हों तो धनी,
बुद्धिमान्, राजा का प्रिय और दीर्घायु हो ( वृ० पा० ) ।
दीर्घायु धनी १६-उदय राशि का स्वामी ( लग्नेश ) अति बली हो पाप ग्रह से
दृष्ट न हो शुभ ग्रह से दृष्ट होकर केन्द्र में हो तो मृत्यु को भी भगा देता है दीर्घायु
धनवान् और बहुगुणी राजलक्ष्मी युक्त करता है ( फल० ) ।
दीघंजीवी सुखी १७-कुंडली में १, ४, ५, ७, ८, ९, १० घर में कोई पाप ग्रह
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