भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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4४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

गुरु की--उत्तम देश, ग्राम तथा नगरों का स्वामी, राजा, चुर गुणों का जानने

चाला, गुणवान्‌, शीलवान्‌ । हा है

शुक्र की--अति सुन्दर वेष, वस्त्राभूषणयुक्‍्त, स्त्रियों को कामदेव और काम से

बड़े हर्ष को प्राप्त, अत्यन्त चतुर, उदार, श्रे ष्ठ भाग्य ।

शनि की- -म्म्री, पुत्र, मित्र और वाइन से दुःख, सन्तप्त चित्त, सुख और धन से

हीन । १

(३) स्वक्षेत्री बुघ पर दृष्टि का फल ,

सूर्य की--सत्ययुक्त, सुन्दर लीला का विलास करने वाला, राजा से मान और

उन्नति को प्राप्त, चंचलता रहित ।

चंद्र की--वहुत बोलने वाला, मिष्ठभाषी, लड़ाई जिसे प्यारी हो, राजा के पास

रहने वाला ।

मंगल की-प्रसन्नदेह, चुगलखोर, कलाओं का ज्ञाता, राजा के कृत्य में निरन्तर

प्रवीण, मनुष्यों का प्यारा ।

गुरु की-धनयुक्त, सामथ्यं सहित, श्रेष्ठ, राजा के मान से अधिकार को प्राप्त,

बहुश्रुत ।

bs की-राजा का दूत, बैरियों को जीतने वाला, दोनों की सन्धि कराने में चतुर

वेशया में आसक्त, मन की अभिलाषा को प्राप्त ।

शनि की-प्रारम्भ किये कार्यं को सिद्ध करने वाला, नम्रता रहित, श्रेष्ठ वस्त्र

और आभूषण आदि समुद्धियों सहित । (४) ककं के वृध पर दृष्टि

सूर्यं की-स्श्री के निमित्त से पूर्ण पीड़ा, धन का व्यय, अतिदुर्वेल देह, बहुत उत्पातों

सहित ।

चंद्र की--वस्त्र!दियों की शुद्धि और मणियों का संग्रह करने वाला, घर आदिं

स्थान बनाने में चतुर, फूलों की माला गूंथने में चतुर ।

मंगल की--थोड़ा शास्त्र का ज्ञाता, अर्थ में तत्पर, शूरवीर, प्यारी वोली, झूठ

बात करने में चतुर ।

गुरु की--चतुर, विद्या का जानने वाला, भाग्यवान्‌, श्रेष्ठ वाणी ।

शुक्र को--प्योरी वाणी, सुन्दर शरीर, श्रेष्ठ गीत, बाजो की विधि में चतुर ।

शनि को--गृणहीन, अपने मित्र तथा भाई बन्धु रहित, झूठ बोले, दंभ में तत्पर, कृतध्न ।

(५) सिंह के बुघ पर दृष्टि

सूर्य की- कृपा रहित, चंचळ स्वभाव, ईर्षालु, हिसा में तत्पर, क्र, क्षुद्र । चंद्र की--ह्पवान्‌ सुन्दर वुद्धि, नञ्ज, गीत और नृत्य में तत्पर, श्रेष्ठ वृत्ति । मा मंगल की--कामदेव ओर पराक्रम रहित, वृत्तिहीन, बत्ति घावों से अंकित, अं वुद्धिहीन,