सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 239, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाला -
आयुर्दाय विचार : २२९
६, ८ या १२ वर्ष में मृत्यु ११२- लग्नेश लग्न में हो शुभ युक्त हो और शनि और गुर से दृष्ट हो अष्टम में न हो । लग्न राशि संधि में हो तो ६, ८ या १२ वर्ष में मृत्यु हो । राशि संधि के अन्तिम ४ और पहिले के ४ में जन्म नहीं होना (स.चि.) । १ वर्ष से ८ वर्ष तक मृत्यु ११३- गुरु लग्न में हो युध ओर शुक्र मिथुन या तुला में हो पाष ग्रह से दृष्ट हो जो कि अष्टम स्थान में हो तो १ वर्ष से ८ वर्ष तक आयु होगी । ( स० चिं० ) । इसमें गोचर और दशा का भी बिचार कर जीवन का निश्चय करना । इस योग में पाठ यह भी है कि शुक्र मिथुन में और बुध तुला में हो । यहाँ जव शुक्र मिथुन में हो तो बुध तुला का नहीं हो सकता । ८ वर्ष आयु ११४- ६, ८ घर में शुभ ग्रह ५, ९ घर में पाप ग्रह हो और पाप ग्रहों से दुष्ट हो ( जा० भ० )। ११५- ६, ८ घर में चन्द्र हो शुभ ग्रहों की दृष्टि हो ( वृ० जा० ) । पाप दृष्टि हो तो शीघ्र मृत्यु होगी । ११६- चन्द्र बलहीन हो पाप ग्रह अष्टम में हो ( स० चिं० ) । ११७- वलहीन चन्द्र ६,८,१२ घर में हो । यदि वलहीन न हो परन्तु क्र ग्रह युक्त और शुभ ग्रह से दृष्ट हो ( स० चिं० ) । ११५० ३,७ राशि का गुरु लग्न में बुध या शुक्र युक्त पाप ग्रह से दृष्ट या अष्टम भाव में हो ( स० चिं० )। ३ वर्ष आयु या ८ वपं आयु ११९- लग्न में शनि, सप्तम सूर्य या अष्टम मंगल हो तो ३ वर्ष की आयु होती है परन्तु ऐसे योग में चन्द्र पर पाप दृष्टि न हो, राहु पर भी पाप दृष्टि न हो तो ८ वर्ष में मृत्यु हो ( सर्व चिं )। १२०- लग्नेश लग्न में कूर ग्रह युक्त, शनि से दृष्ट हो ( स० चि० ) यदि वहाँ गुरु हो तो यह फल नहीं होगा । १२१- गंडांत ( राशि संधि ) में जन्म हो ६, ८, १२ भाव में पापयुक्त चन्द्र हो उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो ( स० चि० ) । १२२- ६,८ घर में चन्द्र हो, मंगल के घर में गुरु हो। ९ वर्ष आयु १२३- लग्नेश पाप गृही हो वह चन्द्र से १२ वें घर में हो उस पर दूसरे पाप ग्रह की दृष्टि हो या चन्द्र के नवांश में हो ( स० चि० )। इस योग में उच्चता और दूसरी प्रकार की अच्छी स्थिति पर भी ध्यान रखना । ग्रहों की अच्छी
स्थिति से संकट होगा परन्तु मृत्यु नहीं होगी । यहाँ लग्नेश पाप ग्रह के घर में होकर छर्न में हो और चन्द्र से १२ वें घर में हो या लग्नेश किसी भी राशि में चन्द्रमा के नवांश में हो। १२४-सूर्य, शनि और शुक्र पापयुक्त हो और गुरु की दृष्टि न हो । ( जा० भ० ) । १२५-लग्न में अष्टमेश हो जिस पर शनि की दृष्टि हो, चन्द्र सप्तम में हो ( जा० भ० ) । १२६-सूर्य चन्द्र मंगल पञ्चम में हों ( जा० पारि० ) । १२७- लग्नेश से क्षीण चन्द्र अष्टम में हो पाप ग्रह से दृष्ट हो ( स० चिं० ) । १२८-सूर्य और चन्द्र से शनि युक्त हो ( जा० भ० ) । १२९-सूय चन्द्र मंगल ये पञ्चम में बुध की राशि में हों (जा० भ० ) | १३०-छग्नेश पाप ग्रह चन्द्र से १२ वें भाव में पाप दृष्ट हो या ऐसे योगों में चन्द्र राशीश पापांशक में हो ( स० चिं० ) । १० वर्ष आय्, १३१-शनि मकर के नवांश में हो बुध से दृष्ट हो तो उसके