सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 248, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें४ २३८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१०० वर्ष से अधिक आयु ३२२-यहाँ वहाँ ३ ग्रह ५, ९, ८ भाव या केन्द्र में
हों या यदि ५ ग्रह केन्द्र में हों तो वह धनी, सत आचरण वाला होकर १०० वर्ष से
अधिक जिये ( स. चि. )। ३२३-लग्न में मंगळ मिथुन के पूर्वा में हो, दूसरे आधे
में गुरु हो, बुध और शुक्र केन्द्र में हो। अर्थात् मंगल गुरु बुध शुक्र केन्द्र में हो तो
१०० वर्षे से अधिक आयु हो सुखी ओर धनवान हो ( स. चि. ) । ३२४-कन्या का
उत्तराद्ध लग्न हो पूर्वादध में बुध हो या ३ ग्रह उच्च में हों (स. चि. ) ।
१०८ वर्ष आयु ३२५-मीन का अन्तिम नवांश लग्न में हो और ३ ग्रह केन्द्र में
हों ( मीन का अन्तिम नवांश बड़ा बलवान् होता है धन देता है )। ३२६- लग्न
सिंह हों ओर ४ ग्रह ४ या ९ घर में हो (स. चि'. ) । ३२७--बुध लग्न में हो. गुरु
ककं में हो, ३ ग्रह उच्च के हों [स. चि. ]। ३२८--मंगल मकर में हो गुरु कर्क
मे हो दसरे सब ग्रह केन्द्र में हों | स. चि. ]। गरु ककं में मंगल मकर में उच्च का
होता है ।
१२० वर्ष आयु परमायु -२९-लग्न से व चन्द्र से आठवे स्थान में कोई ग्रह न
हो और शुक्र व गुरु ये दोनों बली हों तो पूर्णायु पावे ( जा० ल॑० ) । ३३०-लग्न
मकर का पराद्ध १५० से ऊपर होवे उसके पूर्वाद्ध १५० के भीतर मंगल लग्न में हो
और चन्द्रमा गुरु युक्त केन्द्र में हो (स० चि० )। ३३१-मंगल मिथुन लग्न के पूर्वार्द्ध
में हो, लग्न मिथुन का उत्तराद्ध॑ हो । या धन के पूवाद्धं में गुरु उत्तराद्ध में लग्न हो,
केन्द्र में शनि शुक्र चंद्र सहित हो तो परमायु हो । ३३२--बुध लग्न के अन्त्य नवाश में
हो, लग्न में शनि, केन्द्र मे गुरु व शुक्र हो पाप गृह ३,६,११ भाव मे हों तो परमायु
हो ( स० चि० ) । ३३३--मीन नवांशक लग्न मे हो, वृष का चन्द्र होरा आदि ५
वर्ग मे अपने वर्ग का हो अन्य सभी गृह उच्च के हों (स०चि०) । ३३४-केन्द्र मे सब
शुभ गृह हों लग्नेश वलवान् हो या गुरु दृष्ट हो ( वृ० पा० )। ३३५--लग्नेश केन्द्र
मे गुरु शुक्र से युक्त दृष्ट हो तो पूर्णायु हो ( वृ० पा० ) । ३३६--लग्नेश अष्टमेश
सहित ३ गृह उच्च मे हों आठाँ भाव पाप गृहों से रहित हों तो पूर्णायु हो (वृ. पा') ।
परमायु या पूर्णायु ३३७--लग्नेश वली हो भाव मे ३ गृह स्वगृही, मित्र क्षेत्री
या उच्च के हों ( वु पा० ) । ३३८-अष्टमेश या शनि अपने उच्च या राशिस्थ किसी
गृह से युक्त हो ( व् पा० ) । ३३९-शुभ गृह केन्द्र त्रिकोण मे हों पाप गूह ३,६,११
मे हों लग्नेश बली हो (वृ० पा०) । ३४०--६, ७, ८ भाव मे शुभ गूह ३, ११ मे
पाप गृह हों। ३४१-ऊग्नेश केन्द्र मे हो, अष्टमेश सूर्य का मित्र हो पाप गृह ६,१२ भाव
मे हो ( वृ० पा० ) । ३४२-अष्टम मे पाप गूह हो दशमेश उच्च का हो । ३४३--
हिस्वभाव लग्न हो लग्नेश केन्द्र मे या कोण मे उच्च या स्वक्षेत्री ही ( वृ० पा० ) ।
३४४-द्रिस्वभाव लग्न हो वली लग्नेश से २ पाप गूह केन्द्र मे हों तो पूर्णायु पावे
(वृ० पा०) । ३४५--लग्न मे धन राशि का दूसरा होरा हो गृह अपने २ उच्च में
हों बुध २४ अंश पर वृष राशि में हो ( जा० ल॑० ) । ३४६-चन्द्रमा लग्न से ११ वें
घर में ,गुरु शुक्र केन्द्र में हों ( जा० लं० ) । ३४७--लग्न से ३,६,११ स्थानों में सब