भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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आयुर्दाय विचार : २३७

लग्नेश पूर्ण वली हो (जा. ल. )। २९५--छरन से १ या ९ घर में शुभ गह हो, ककं लग्न में गुरु हो ( जा. ल. )। २९६-लग्न से पाँचवें स्थान में या केन्द्र में क्रूर ग्रहों के नवाँश में सम्पूर्ण ग्रह हों ( जा. ल॑. ) । २९७-सब गृह पांचवें स्थान में हों ( जा. लं. ) । २९८-शुभ गृह अपने मूल त्रिकोण या उच्च में हों ( जा. भ. ) । ८५ वर्ष आयु २९९--गुरु लग्न में हो केन्द्र में सूर्य मंगल शनि तीनों गुरु के नवांश मे हों लग्न से अष्टम स्थान छोड़कर अन्य स्थान में शेष सव गृह हो (जा.लं) । ८६ वर्ष आयु ३००-शुथ गृह केन्द्र में हो पाप गृह ८, ६ घर में हो, चन्द्र ५ घर में हो (स. चि. ) । ३०१-गुरु चन्द्रमा युक्त केन्द्र में शुभ दृष्ट हो सभी गृह दशम भाव से अपर ११.१२ भाव में हों ( स. चि. )1 ८७ वर्ष आयु ३०२-वुध लग्न में, चन्द्र कोण में शनि नवम मे हो (स. चि.) । बुध लग्न में होने से दिग्बल प्राप्त होता है । १००-वर्षे आयु ३०३-लग्नेश से केन्द्र में गुरु हो पाप ग्रह केन्द्र या कोण में न हो वह सुखी होकर १०० वर्ष जिये (स. चि.) पाप गृह केन्द्र या कोण में बुरे होते है परन्तु मंगल और सूर्य दशम में, शनि सप्तम में अच्छे होते हैं राजयोग उत्पन्न करते हैं। ३०४-सूर्य और मंगल लग्न में हो या अष्टम में हो गुरु केन्द्र में हो तो यह धनी और मनुष्यों का स्वामी होकर १०० वर्ष जिये (स. चि. )। ३०५--तुला लग्न में जन्म हो व्यय में सूर्य हो (वृ. पा.) । ३० ६-पूर्ण चन्द्र लग्न में हो शुभ ग्रह शुभ राशि के नवांश मे' होकर लग्न से २ या १२ घर में हो तो सदा लक्ष्मी युक्त रहे आयु १०० वर्ष हो ( जा. ळं. ) | ३०७-पंचम में चन्द्र, मिकोण में गुरु/दशम में मंगल हो (मान.) ३०८-उच्च ककं का गुरु लग्न में हो उच्च का शुक केन्द्र में हो (मान.) । ३०९-१,६,८ भाव में चन्द्र न हो कूर ग्रह स्वक्षेत्री हो, दशम में वली-बली ग्रह हो ( मान. ) । ३१०-शुक्र और गुरु दोनों केन्द्र में हो (जा. लं.) । ३११-१ या ९ घर में शनि ९्या १२ घर में चंद्रहो । ४१२-९ या १२ राशि लग्न में हो केन्द्र में शुक्र या गुरु हो । लग्न से केन्द्र या ५, ९ स्थानों में कूर ग्रह न हो ८ या ९ दोनों भावों को शुभ ग्रह देखते हों (जा. लं. ) । ३१३-मीन का शुक्र लग्न में गुरु केन्द्र, में हो लग्न से अष्टम भाव में चन्द्र शुभ ग्रहों से दृष्ट हो (जा. ल.) । ३१४-लग्नेश अष्टम में, चन्द्रमा दशम में हो गुरु बळी हो लग्न से नवम स्थान में सव ग्रह हो (जा. ळं. )। ३१५-कर्क राशि मेः ३, ६, “१, घर मे गुरुव चन्द्र दोनों हों केन्द्र मे शुभ ग्रह युक्त शुक्र या बुध हो (जा. छ. )। ३१६-छग्न में शुक्र चन्द्र हो, नवन पंचम मे गुर, सप्तम मे बुध हो ( मान. ) । ३१७-लग्न से दशम या पंचम में गुरु, बुध, चन्द्र और शुक्र हो तो धन से परिपूर्ण वेद मे पारंगत हो, आयु १०० वपं हो (मान.) । ३१८-लग्न में धन रागि का नवाँ नवांश हो, केन्द्र में शुभ ग्रह किसी राशि के पहिले नवांश में हो ( जा. लं. )1 ३१९-लन में मीन राशि अंत्यांश होवे और केन्द्र में ४ ग्रह हों (स. चि.) । ३२०- चन्द्रमा लग्न में कर्काश या मीन व कक का होवे उसके साथ कोई ग्रह व हों केन्द्र में ४ ग्रह हो ( स. चि )। ३२१- सिंह छग्न से ४ ग्रह त्रिकोण में होवे ( स. चि. )1