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सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

आयुर्दाय विचार : २३७

लग्नेश पूर्ण वली हो (जा. ल. )। २९५--छरन से १ या ९ घर में शुभ गह हो, ककं लग्न में गुरु हो ( जा. ल. )। २९६-लग्न से पाँचवें स्थान में या केन्द्र में क्रूर ग्रहों के नवाँश में सम्पूर्ण ग्रह हों ( जा. ल॑. ) । २९७-सब गृह पांचवें स्थान में हों ( जा. लं. ) । २९८-शुभ गृह अपने मूल त्रिकोण या उच्च में हों ( जा. भ. ) । ८५ वर्ष आयु २९९--गुरु लग्न में हो केन्द्र में सूर्य मंगल शनि तीनों गुरु के नवांश मे हों लग्न से अष्टम स्थान छोड़कर अन्य स्थान में शेष सव गृह हो (जा.लं) । ८६ वर्ष आयु ३००-शुथ गृह केन्द्र में हो पाप गृह ८, ६ घर में हो, चन्द्र ५ घर में हो (स. चि. ) । ३०१-गुरु चन्द्रमा युक्त केन्द्र में शुभ दृष्ट हो सभी गृह दशम भाव से अपर ११.१२ भाव में हों ( स. चि. )1 ८७ वर्ष आयु ३०२-वुध लग्न में, चन्द्र कोण में शनि नवम मे हो (स. चि.) । बुध लग्न में होने से दिग्बल प्राप्त होता है । १००-वर्षे आयु ३०३-लग्नेश से केन्द्र में गुरु हो पाप ग्रह केन्द्र या कोण में न हो वह सुखी होकर १०० वर्ष जिये (स. चि.) पाप गृह केन्द्र या कोण में बुरे होते है परन्तु मंगल और सूर्य दशम में, शनि सप्तम में अच्छे होते हैं राजयोग उत्पन्न करते हैं। ३०४-सूर्य और मंगल लग्न में हो या अष्टम में हो गुरु केन्द्र में हो तो यह धनी और मनुष्यों का स्वामी होकर १०० वर्ष जिये (स. चि. )। ३०५--तुला लग्न में जन्म हो व्यय में सूर्य हो (वृ. पा.) । ३० ६-पूर्ण चन्द्र लग्न में हो शुभ ग्रह शुभ राशि के नवांश मे' होकर लग्न से २ या १२ घर में हो तो सदा लक्ष्मी युक्त रहे आयु १०० वर्ष हो ( जा. ळं. ) | ३०७-पंचम में चन्द्र, मिकोण में गुरु/दशम में मंगल हो (मान.) ३०८-उच्च ककं का गुरु लग्न में हो उच्च का शुक केन्द्र में हो (मान.) । ३०९-१,६,८ भाव में चन्द्र न हो कूर ग्रह स्वक्षेत्री हो, दशम में वली-बली ग्रह हो ( मान. ) । ३१०-शुक्र और गुरु दोनों केन्द्र में हो (जा. लं.) । ३११-१ या ९ घर में शनि ९्या १२ घर में चंद्रहो । ४१२-९ या १२ राशि लग्न में हो केन्द्र में शुक्र या गुरु हो । लग्न से केन्द्र या ५, ९ स्थानों में कूर ग्रह न हो ८ या ९ दोनों भावों को शुभ ग्रह देखते हों (जा. लं. ) । ३१३-मीन का शुक्र लग्न में गुरु केन्द्र, में हो लग्न से अष्टम भाव में चन्द्र शुभ ग्रहों से दृष्ट हो (जा. ल.) । ३१४-लग्नेश अष्टम में, चन्द्रमा दशम में हो गुरु बळी हो लग्न से नवम स्थान में सव ग्रह हो (जा. ळं. )। ३१५-कर्क राशि मेः ३, ६, “१, घर मे गुरुव चन्द्र दोनों हों केन्द्र मे शुभ ग्रह युक्त शुक्र या बुध हो (जा. छ. )। ३१६-छग्न में शुक्र चन्द्र हो, नवन पंचम मे गुर, सप्तम मे बुध हो ( मान. ) । ३१७-लग्न से दशम या पंचम में गुरु, बुध, चन्द्र और शुक्र हो तो धन से परिपूर्ण वेद मे पारंगत हो, आयु १०० वपं हो (मान.) । ३१८-लग्न में धन रागि का नवाँ नवांश हो, केन्द्र में शुभ ग्रह किसी राशि के पहिले नवांश में हो ( जा. लं. )1 ३१९-लन में मीन राशि अंत्यांश होवे और केन्द्र में ४ ग्रह हों (स. चि.) । ३२०- चन्द्रमा लग्न में कर्काश या मीन व कक का होवे उसके साथ कोई ग्रह व हों केन्द्र में ४ ग्रह हो ( स. चि )। ३२१- सिंह छग्न से ४ ग्रह त्रिकोण में होवे ( स. चि. )1

४ २३८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१०० वर्ष से अधिक आयु ३२२-यहाँ वहाँ ३ ग्रह ५, ९, ८ भाव या केन्द्र में

हों या यदि ५ ग्रह केन्द्र में हों तो वह धनी, सत आचरण वाला होकर १०० वर्ष से

अधिक जिये ( स. चि. )। ३२३-लग्न में मंगळ मिथुन के पूर्वा में हो, दूसरे आधे

में गुरु हो, बुध और शुक्र केन्द्र में हो। अर्थात्‌ मंगल गुरु बुध शुक्र केन्द्र में हो तो

१०० वर्षे से अधिक आयु हो सुखी ओर धनवान हो ( स. चि. ) । ३२४-कन्या का

उत्तराद्ध लग्न हो पूर्वादध में बुध हो या ३ ग्रह उच्च में हों (स. चि. ) ।

१०८ वर्ष आयु ३२५-मीन का अन्तिम नवांश लग्न में हो और ३ ग्रह केन्द्र में

हों ( मीन का अन्तिम नवांश बड़ा बलवान्‌ होता है धन देता है )। ३२६- लग्न

सिंह हों ओर ४ ग्रह ४ या ९ घर में हो (स. चि'. ) । ३२७--बुध लग्न में हो. गुरु

ककं में हो, ३ ग्रह उच्च के हों [स. चि. ]। ३२८--मंगल मकर में हो गुरु कर्क

मे हो दसरे सब ग्रह केन्द्र में हों | स. चि. ]। गरु ककं में मंगल मकर में उच्च का

होता है ।

१२० वर्ष आयु परमायु -२९-लग्न से व चन्द्र से आठवे स्थान में कोई ग्रह न

हो और शुक्र व गुरु ये दोनों बली हों तो पूर्णायु पावे ( जा० ल॑० ) । ३३०-लग्न

मकर का पराद्ध १५० से ऊपर होवे उसके पूर्वाद्ध १५० के भीतर मंगल लग्न में हो

और चन्द्रमा गुरु युक्त केन्द्र में हो (स० चि० )। ३३१-मंगल मिथुन लग्न के पूर्वार्द्ध

में हो, लग्न मिथुन का उत्तराद्ध॑ हो । या धन के पूवाद्धं में गुरु उत्तराद्ध में लग्न हो,

केन्द्र में शनि शुक्र चंद्र सहित हो तो परमायु हो । ३३२--बुध लग्न के अन्त्य नवाश में

हो, लग्न में शनि, केन्द्र मे गुरु व शुक्र हो पाप गृह ३,६,११ भाव मे हों तो परमायु

हो ( स० चि० ) । ३३३--मीन नवांशक लग्न मे हो, वृष का चन्द्र होरा आदि ५

वर्ग मे अपने वर्ग का हो अन्य सभी गृह उच्च के हों (स०चि०) । ३३४-केन्द्र मे सब

शुभ गृह हों लग्नेश वलवान्‌ हो या गुरु दृष्ट हो ( वृ० पा० )। ३३५--लग्नेश केन्द्र

मे गुरु शुक्र से युक्त दृष्ट हो तो पूर्णायु हो ( वृ० पा० ) । ३३६--लग्नेश अष्टमेश

सहित ३ गृह उच्च मे हों आठाँ भाव पाप गृहों से रहित हों तो पूर्णायु हो (वृ. पा') ।

परमायु या पूर्णायु ३३७--लग्नेश वली हो भाव मे ३ गृह स्वगृही, मित्र क्षेत्री

या उच्च के हों ( वु पा० ) । ३३८-अष्टमेश या शनि अपने उच्च या राशिस्थ किसी

गृह से युक्त हो ( व्‌ पा० ) । ३३९-शुभ गृह केन्द्र त्रिकोण मे हों पाप गूह ३,६,११

मे हों लग्नेश बली हो (वृ० पा०) । ३४०--६, ७, ८ भाव मे शुभ गूह ३, ११ मे

पाप गृह हों। ३४१-ऊग्नेश केन्द्र मे हो, अष्टमेश सूर्य का मित्र हो पाप गृह ६,१२ भाव

मे हो ( वृ० पा० ) । ३४२-अष्टम मे पाप गूह हो दशमेश उच्च का हो । ३४३--

हिस्वभाव लग्न हो लग्नेश केन्द्र मे या कोण मे उच्च या स्वक्षेत्री ही ( वृ० पा० ) ।

३४४-द्रिस्वभाव लग्न हो वली लग्नेश से २ पाप गूह केन्द्र मे हों तो पूर्णायु पावे

(वृ० पा०) । ३४५--लग्न मे धन राशि का दूसरा होरा हो गृह अपने २ उच्च में

हों बुध २४ अंश पर वृष राशि में हो ( जा० ल॑० ) । ३४६-चन्द्रमा लग्न से ११ वें

घर में ,गुरु शुक्र केन्द्र में हों ( जा० लं० ) । ३४७--लग्न से ३,६,११ स्थानों में सब

आयुर्दाय विचारे : २३९

कूर गृह शुभ के नवांश में हों शुभ गों से युद्ध में जीते गये हों ( जा० लं० ) । इस योग मे लग्नेश व मंगल दोनों अष्टम में हो तो पूर्णाय नहीं होगी । ३४८--लग्नेश व गुरु केन्द्र में हो ५,९,८, व केन्द्र में कूर गृह न हो ( जा० ल॑० ) । ३४९--पाप गहू लग्न से ९या ५ घर में हों शुभ ग,ह गुरु की राशि या नवांश में हों ( जा० ल० )। ३५०--सव ग,ह लग्न से ९ स्थान में हों ( जा० ल॑० ) । ३५१--सब क्रूर ग ह. कूर राशियों में शुभ ग,ह सव शुभ राशियों में हों लग्नेश बली हो ( जा० ल॑० )। ३५२-- अष्टमेश अष्टम में हो । अष्टमेश से केन्द्र या त्रिकोण में कोई शुभ ग,ह हो ( ज्यो० र० )। ३५३--लग्न से अष्टमेश ६ ८,१२ भाव में हो जहाँ अष्टमेश हो उस घर का स्वामी अष्टम में हो ( ज्यो० र० ) । ३५४--लग्नेश केन्द्र में गुरु या शुक्र से युक्त या दृष्ट हो। ३५५--लग्न से शनि ६,८, ११ घर में हो लग्नेश दशमेश केन्द्र या त्रिकोण में हो। ३५६-चन्द्र उच्च का मित्र ग,ही मूल त्रिकोण में हो उस पर गुरु या शुक्र की दृष्टि हो । ३५७-गुरु शुक्र केन्द्र में, शनि लग्न से ५,६,८,११ घर में हो । २५८-शनि लग्नेश या अष्टमेश होकर एक या अधिक शुभ गृहों से युक्त हो । ३५९-शनि अष्टमेश के साथ हो या अष्टमेश की शनि पर दृष्टि हो ।

१२० वर्ष से ऊपर आयु ३६०--कर्क लग्न में गुरु-चंद्र हो बुध, शुक्र केन्द्र में हों ३,६,११ भाव में अन्य ग्रह सूर्य मंगल हो तो गणितागत आयु से भी अधिक आयु मिले (स. चि. ) ।

८०० वर्ष आयु ३६१--सूर्य लग्न में मंगल युक्त या सूर्य अष्टम में, गुरु केन्द्र में हो तो लक्ष्मी का गुणी होकर ८०० वर्ष जीये (स. चि ) ।

१००० वर्ष आयु ३६२--कुंभ लग्न में सूय हो, २,१२ घर मे गुरु हो तो रसायन एवं योग क्रिया द्वारा १००० वर्ष जीवे और वह ऊँचे दर्जे का योगी हो ( स. चि. ) । ३६३--सिंह लग्न में गुरु हो, शुक्र बारहवां या कर्के में और बुध दुसरे में या कन्या . में हो पाप ग्रह ३,६,११ घर में हो तो १००० वर्ष जीवे । मतांतर-बुध के स्थान में चन्द्र किया है ! (स. चि. ) ।

१० गुणी आयु ३६४--लग्न कुंभ हो, गुरु मीन का, शुक्र व्यय में ओर सूर्य लग्न में हो तो रसायन सेवन आदि से गणितागत आयु से दशगुणी आयु पावे (स. चि.) ।

२००० वर्ष आयु ३६५--लग्न में शनि, चतुर्थ में सूर्य और मंगल हों, शेष ग्रह दूसरे में हों, राहु बारहवें हे ( स. चि. )। शनि लग्न में बहुधा बालारिष्ट करता है

परन्तु जब वच जाता है तो दीर्घायु करता है। यहाँ कुछ शंक। हो जाती है कि शेष ग्रह चन्द्र वुध गुरु शुक्र केतु दूसरे में होना कहा है जब सूर्य चतुर्थ में हो तो बुध दूसरे में होना कठिन है राहुवारहवें में है तो केतु ६ में होगा । इस प्रकार शेष ३ ही ग्रह दूसरे में रहेंगे । सम्भव है कि बहुत प्राचीन काल में बुध सूयं से इतने अन्तर पर रहा हो । ३६६--मेष छरन हो उच्च का सूयं शुभ ग्रह युक्त हो, गुरु दशम में हो, मंगळ सप्तम,

२४० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतोय फलित खण्ड

पूणं चन्द्र १२ वाँ हो तो रसायन शास्त्र की सहायता से २००० वर्ष तक जीवे ( स.

चिं. ) । ३६७--गुरु और बुध कोण में मंगल वृष का लग्न में हो चन्द्र गौपुरांश में हो

( स, चि. ) । ३६८--शुक्ल पक्ष में दिन का जन्म हो गुरु केन्द्र में या ककं या लग्न में

हो, सप्तम मंगल हो, चोथा सूर्य हो ( स. चि. ) ।

१०००० वर्ष आयु ३६९ लग्न दिन का हो, शुक्ल पक्ष हो गुरु केन्द्र में हो और

कर्क लग्न हो मगल सप्तम हो, शनि चतुर्थ में हो ( स. चि. ) । ३७०--जब गुरु शनि

मंगल ओर शुक्र एक दूसरे से कोण या केन्द्र में हो (स. चि. ) 1

(१) ये सब चाहे लग्न से या चन्द्र से केन्द्र गों हों ये सव किसी भी केन्द्र या

चारों केन्द्रों मों हों यह एक योग हुआ । (२) दूसरा योग एक दूसरे से त्रिकोण में हों।

एक अयुत वषं आयु ३८१--गुरु शनि शुक्र का अन्योन्य केन्द्र स्थित सम्बन्ध हो

या त्रिकोण में हो तो एक अयुत वषं जीवे (स. चि. ) । ६०००० वर्ष आयु ३७१--लग्न सिंह हो शुभ ग्रह चारों केन्द्रों में हों पाप ग्रह

३-६ और १२ भाव में हों (स. चि. )। ६ अयुत वषं आयु ३७३-_चारों केन्द्रों में शूभ ग्रह हों पाप ३,६,११ भाव में हों लग्न सिंह हो (स. चि. )।

अनगिन्ती वर्ष आयु ४७४ मेष के अण्तांश लग्न में गुरु या शुक्र हो चन्द्रमा वृष

के मध्य नवांश में हो मंगल सिंहासनांश में हो तो मंत्र बल से असंख्य वषं जीवे ( जा०

पारि. ) । ३७४--मेष के अन्त्यांश लग्न में गुरु या शुक्र हो, चन्द्रमा वृष का या धन

के मध्यांश में होवे मंगल सिंहासनांश में हो ( स. चिता. )। अन्य-गुरु या शुक्र मेष

के अंत में लग्न में हो, चन्द्र वृष का या धन के पुर्वाद्ध में हो मंगल सिंह के नवांश में

द्रो। ३७५--लग्न में बुध कन्या के अंत नवोश में हो, सप्तम में गुरु गोपुरांश में हो या

शनि मृद्धांश में हो ( स. चि. ) षष्ठ्यंश का १९ वाँ अंश मृद्दांश है ।

युगों तक आयु ३७६--सब शुभ या पाप ग्रह इकट्ठे केन्द्र या त्रिकोण में हो तो

वह तुरंत मरे । यदि बच जावे तो मन्त्र सिद्धि से कई युग तक जीवे (स. चि. ) ७

ग्रहों के एकत्र होने. का योग २। दिन से अधिक नहीं होता । ३७७--गुरु केन्द्र में,

शति ११ वें, सूर्य दुसरे, चन्द्र सप्तम, मंगल नवम हो तो मन्त्रों से कई हजार युगों तक

जीवे । २७८--गुरु केन्द्र में गोपुरांश में हो, शुक्र कोण में पारावतांश में हो, लग्न ककं

हो तो युगों तक जीवे ( स. चि- ) । ३७९--सूयं गुरु मंगल ये शनि के नवांश में

हों या नवम भाव में या उसके नवांश में बलवान्‌ हों लग्न में चन्द्रमा हो तो लक्ष्मी

युक्त युगांत आयु पावे ( जा. पारि, )। ३८०--गुरु केन्द्र में शनि लाभ में सूर्य धन

स्थान में केतु सप्तम म, मंगळ नवम में हो तो मन्त्र बल से युगांत आयु पावे (स.चि.)।

३८१--केन्द्र में शुक्र गोपुरांश में, गुरु त्रिकोण में पारावतांश में हो, लग्न ककं हो तो

य॒गांत आयु हो ( स. चि. )। ३८२--मकर लग्न में मंगल से लेकर सूर्य तक ग्रह हों

तीसरे में गुरु हो दिन का जन्म हो (स. चि. )।

आयुर्दाय विचार : २४१

दिव्य आयु ३८३--सब शुभ ग्रह केन्द्र त्रिकोण में हों सब पाप ग्रह ३, ६, ११ भाव में हों अष्टम भाव में शुभ ग्रह की राशि हो [ वृ० पा० ]। अमित आयु ३८४--कके लग्न व कर्कांश होवे गुरु केन्द्र में, मंगल सप्तम में हो विशेष कर शुक्र सिहासनांश में हो तो रसायन आदि से अमित आयु हो [ स' चि. ] ।

असंख्य आयु ३८५--शुऋ देवलोकांशक में, मंगल केन्द्र में, गुरु सिहासनांश में केन्द्र गत हो तो असंख्य आयु पावे [ स. चि ]। ३८६--उत्तमाँश गत बुध केन्द्र में, शुक्र पारावतांग में गुरु स्वर्ग लोकांश में हो तो असंख्य आयु पावे [ स. चि ] । आयु बढ़ावे ३८७-शुक्र का उत्तमांश होकर केन्द्र में हो । शनि पारावतांश में हो और गुरु स्वर्ग लोकांश में होकर केन्द्र में हो तो औषधियों द्वारा अपनी आयु बढ़ावे

[स. चि ]।

“अमित आयु ३८८--कर्क लग्न हो उसमें चन्द्र और गुरु हो बुध शुक्र केन्द्र में हों ३, ६, ११ भाव में सूर्यं मंगल शनि राहु पाप ग्रह हों तो अमित आयु हो [ वृ. पा ] मुनि योग ३८९-यदि गुरु चन्द्र आदि पाप ग्रह शनि तक परमोच्च में हो तो उसे ज्ञान प्राप्त होकर मुनि के बरावर हो या विद्या के कारण उसका मान हो [स. चि.] । जव सव ग्रह उच्च में होंगे तो बुध उच्च को नहीं हो सकता जव बुध उच्च में हो तो सूर्य शुक्र उच्च में नहीं हो सकते । ३९०--शनि देवलोकांश में, मंगल पारावतांश में और लग्न में सूयं सिंहासनांश में हो तो वह मुनि तुल्य होगा [ वृ' पा. ]। ३९१-- मेष लग्न हो, सूर्यं मकर में या दशम में हो, गुरु कक में चतुर्थ स्थान में हो ३, ६, ११ में पाप ग्रह हो तो बड़ा मुनि होगा [स. चिः ]। २९२--चन्द्रमा क्षीण न हो मित्र गृही या उच्च का होकर लग्न या लाभ स्थान में हो, नवमेश बलवान होकर सूयं के साथ हो तो वह बड़ी आयु वाला मुनि होगा । ३९३--कर्क से मकर तक सब ग्रह गुरु चन्द्रादि होवें इस बीच में जिनके उच्च हैं वे उच्च राशियों में होवें तो वह मुनि तुल्य होगा [ स. चि- ]। ३९४--सूर्य बुध युक्त स्थिर राशि में, चन्द्रमा बुध का, शुक मिथुन का गुरु कर्क का लग्न में, शनि तुला का हो तो मुनि तुल्य हो [ स. चि. ]।

३९५--चन्द्रमा देव लोकांश में, मंगल पारावतांश में, लग्न में धुर्य सिहासनांश में

हो [ स. चि. ]।

देव तुल्य ३९६--छग्न से लेकर क्रम से शनि सूर्य चन्द्र मंगल होवें वैशे- पिकांशो में भी होवें तो देव तुल्य हो [ जा. पारि. ]। ३९६- त्रिकोण में पाप ग्रह न हो केन्द्रं में शुभ ग्रह न हो अष्टम भाव में भी पाप ग्रह न होवे तो मनुष्य देवता के तुल्य हो [ स. चि. ] । ३९८--शुक्र देवलोकांश में हो, मंगल केन्द्र में हो, गुरु सिहा-

सनांश में हो तो देव तुल्य होगा [ स. चि. ]।

ऋषि योग ३९९--सूर्य वुध सिंह में हो, चन्द्र वृष में, शुक्र मिथुन में, शनि तुळा

में ककं लग्न में गुरु हो [ स. चि. ]।

इन्द्रपद पावे ४००--वृष लग्न में शुक हो, गुरु वेन्द्र में हो और दूसरे ग्रह

३, ६, १०, १ भाव में हों वह रसायन और मन्त्र बल से इन्द्र पदवी को प्राप्त करे

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२४२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

[ स. चि. ] । ४०१--चन्द्रमा वृष का विशेषतः लग्न में बुध गुरु शुक्र से युक्त हो, शेष ग्रह धन भाव में हों [ स. चि ]। ४०२--गुरु स्वगृही लग्न या दशम भाव में हो, मिथुन का शुक्र केन्द्र में हो तो रसायन आदि प्रयोगों से बहुत वर्ष जिये और इन्द्र पद पावे [ स. चि. ]। ४०३--गुरु स्वग[ही लग्न में हो, मिथुन में कोई ग्रह न हो शुक्र केन्द्र में हो तो वह रसायन शास्त्र की सहायता से कई वर्ष जीवे इन्द्र लोक पावे [ स. चि. ]। गुरु केन्द्र में कन्या में होने से नीच का होता है मीन में होतो अच्छा है [ स. चि. ]

ब्रह्म पद पावे ४०४--ककं लग्न हो, धनु के नवांश में हों, गुरु कर्क को हो ३-४ ग्रह केन्द्र में हों तो ब्रह्मपद पावे [ जा. पारि. ]॥ ४०५--छग्न वर्गोत्तम हो और वृष हो, ३, ११ भाव में शुक्र हो और गोपुरांश में हो तो ब्रह्मपद पावे [ स. चि. ] । ४०६--कुंभ लग्न में गुरु हो, बुध गोपुराँश में पञ्चम भाव में हो तो ब्रह्मपद पावे [ स. चि. ]। ४०७--लग्न ककं हो, शनि तुळा का, गुरु मकर का, चन्द्र वृष का हो तो योग साधन और मन्त्र सिद्धि से ब्रह्म पद पावे [ स. चि. ]। परमपद प्राप्ति ४०८--धनु लग्न में मेष का नवांश हो, शुक्र लग्न में हो गुरु सप्तम हो चन्द्र कन्या का हो तो वह परम पद पावे [ स. चि. ]। ४०९--जन्म में धनु राशि में मेष का नवांश हो अर्थात ८-१-२० लग्न हो उसमें गुरु हो, सप्तम भाव में शुक्र हो कन्या राशि में चन्द्र हो तो वह परम पद पाबे अर्थात मोक्ष पावे [ जा. पारि. ] । ४१०-३, ११ भाव में शुक्र गोपुरादि शुभांशक में हो, वृष लग्न वर्गोत्तम हो, धनु लग्न में मेषांशः का हो [ स. चि. ]। ४११--छमन में गुरु कुंभ का हो; पंचम बुध गोपुरादि अंशक में हो तो ब्रह्मपद पावे [स, चि. ]। योगज आयु पर विचार यहाँ जो योगज आयुर्दाय कहा है वह शुभ कर्म करने वाले यशस्वी व पथ्य भोजन करने वाले एवं शुभाचरण वाले मनुष्यों को कहा है । धर्मिष्ट मनुष्यों का ही ग्रहों का बलाबल विचार कर आयु के योग पर विचारना । गणित से जो आगु बताई है यदि हानि कारक ग्रह दशा कुंडली में हो तो वह आयु संभव नहीं होती : वह आयु तव संभव होगी जव हानिकारक ग्रहों की दशा को शांत करने वाली स्थिति हो । सवं ग्रह अरिष्ट भंग योग १--गुरु बलवान्‌ होकर लग्न में हो तो सब आपत्तियों को दूर करता है [ स. चि. ]। २- केन्द्र में बुध गुरु या शुक्र बलवान्‌ हों पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट न हों [ स. चि. ]। ३_-चन्द्र शत्रु राशि में भी हो यदि वह शुक्र या बुध के साथ और शुभ द्रेष्काण में हो तो सब आपत्तियाँ दूर होंगी । [ स. चि. ] | ४---चंद्र यदि ६ या = भाव में हो, यदि चन्द्र मास के शुक्ल पक्ष में रात का जन्म हो, चन्द्रमा पर शूभ दृष्टि हो या यदि कृष्ण पक्ष में दिन का जन्म हो और चन्द्रमा पर पाप दृष्टि न हो तो सब अरिष्ट से रक्षा होगी [ स. चि. ]। ५--पूर्ण चन्द्र हो शुभ ग्रह के अंशक में शुभ

आयुर्दाय विचार : २४३

राशि में और शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो अरिष्ट का नाश हो [स. चि.] । ६-गुरु तेज भ्रकाशवान हो और केन्द्र में हो तो सव आपत्तियों से रक्षा करेगा [स. चि. ]॥ ७--गुरु छुध शुक्र चन्द्र यदि शुभ नवांश में हों तो अरिष्ट दूर हो [ स. चि. ] 1 ये सौम्य गृह या सौम्य नवांश या सौम्य द्रेष्काण में हों [ मान. ] । ८--जन्म लग्नेश शुभ ग्रह केन्द्र में शुभ दृष्ट हो [ स. चि. ]। ९--राहु लग्न से ३, ६, ११ घर में पाप रहित हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो । १०--पूर्ण चन्द्र शुभ ग्रह युक्त व दृष्ट हो पाप युक्त न हो [ स. चि. ]। ११--पूर्ण चन्द्र पर सव पाप या शुभ ग्रहों की दृष्टि हो । १२-- रून में शुभ राशि हो जिसमें शुभ ग्रह हो या शुभ ग्रह की दृष्टि हो और शुभ ग्रह वलवान्‌ हो पाप ग्रह निर्बल हों [ स. चि. ]। १ ३--राहु मेष वृष का कर्क लग्न में हो [ जा. पारि. ]। १४ चन्द्रमा वल्हीन हो परन्तु शुभ वर्ग में हो और उस पर शुभ दृष्टि हो । १५--पूर्ण चन्द्र शुभ ग्रहों से दृष्ट होकर उच्च का या स्वगृही हो या मित्र के वर्ग में या स्ववर्गमें हो शत्रु दृष्टि से रहित और पाप योग दृष्टि रहित हो तो कठिन अरिष्ट भी दूर हो [स.चिं.] । १६- चन्द्र राश लग्न में शुभ दृष्ट होवे तथा चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो चन्द्र उच्च में हो [स. चिं.] । १७--चन्द्रमा पाप राशि में हो उस राशि के स्वामी की दृष्टि हो शुभ ग्रह के अंशादि में हो [ स. चिं. ] । १८--चन्द्र से ६, ७, ८ स्थानों में शुभ ग्रह हो ।

अरिष्ट भंग

१९--अष्टमेश चन्द्रमा शुभ ग्रहों के द्रेष्काण में हो तो सदा रक्षा करता है क्लेश होकर भी बच जाता है [स. चिं.] । २०- लग्नेश अति बली हो शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट होकर केन्द्र में हो पाप दृष्टि रहित हो तो भाग्यवान्‌ दीर्घायु हो, अरिष्ट दूर हों [स. चि.] । २१-ळमग्नेश शुभ या पाप ग्रह हो परन्तु उसे अपने अंशक सहित शुभ ग्रह देखते हों [स. चिं.]। २२--लगनेश बलवान्‌ होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो, केन्द्र गत शुभ ग्रहों से दृष्ट हो पाप ग्रहों से दृष्ट न हो तो अरिष्ट दूर होकर दीर्घायु हो लक्ष्मी युक्त रहे [जा.पारि.] । २३-पापग्रह बलहीन हों शुभ ग्रह पूर्ण बली हों, लग्न में शुभ ग्रहों की राशि हो ओर लग्न को शुभ ग्रह देखते हों [जा.भ.] । २४--पाप ग्रह शुभ राशि में हों, शुभ ग्रह भी शुभ राशि में बैठकर उन पाप ग्रहों को देखते हों [ जा. भ. ]। २५--सम्मूणं ग्रह ३, ५, ७, ८, ११ राशियों में हों [ जा. भ. ] । २६--३,६,११ भाव में केतु मकर कुम्भ मोन राशि का हो [जा. भ.] । २७--३,६, ११ भाव में उच्च राशि का सूर्य हो पाप ग्रह से ग्रसित न हो [जा,भ.] । २५--३,६, ११ भाव में से किसी एक राशि में सब ग्रह हों [ जा. भ. ]। २९-- चतुर्थ में गुरु धन या मीन राशि में हो उस पर बलवान्‌ चंद्र की दृष्टि हो [जा. भ.] । ३०---वक्री शुभ ग्रह लग्न या केन्द्र में हो शुभ ग्रहों से दृष्ट हो [ छ. चं. ]। ३१--समस्त ग्रह शीर्षोदय ५, ६, ७, ८, ११, ३ राशियों में शुभ ग्रह के अंशक में हों [ श. चि. ] ३२--यपाप ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और शुभ वर्ग में हों [ स. चि. ]।

२४४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

३३--शनि तुला कुम्भ या मकर में हो या १, ३, ८ भाव मेंहो[ल. चं. ]।

FT) 3? | | १, ३, ६ गा [ मान, ] 1

३४--चन्द्रमा ६, ८ भाव में हो किसी ग्रह की दृष्टि न हो [वृ.जा.] । ३५--चन्द्रमा

६,८ भाव में हो व बुध गुरु शुक्र के नवांश में हो [ जा.शा. ]। ३६--गुरुया शुक्र

१, ४, १०, ५, ९ या ११ भाव में हो [मान.| । ३७-एक भी उच्च का ग्रह केन्द्र में

हो [मान-] । ३८--लग्न में बुध हो तो हजार दोष दूर करता है शुक्र हो तो १०

हजार और गुरु हो तो १ लक्ष दोष शांत करता है [ मान. ] । ३९--स्वक्षेत्री या

उच्च का गुरु केन्द्र त्रिकोण में हो [ मान. ]।

४०--लम्नेश बली होकर ३,११ या केन्द्र में हो [मान.]। ४१--अष्टम घर में

चन्द्र हो बुध गुरु शुक्र के द्रेष्काण में हो [मान.] । ४२--छठे घर में चन्द्र शुभ ग्रह के

द्रेष्काण में हो शुभ ग्रह वली हो [मान.] । ४३--पूर्ण बली चन्द्र दो सौम्य ग्रहों के

बीच हो [मान.] । ४४--तत्काल युद्ध में जीतने वाले शुभ ग्रह पर शुभ ग्रह की दृष्टि

हो [मान.] । ४५--जन्म लग्न से ३,६,११,१२ भाव मे केतु हो [मान.] । ४६--ब्रुध

गुरु शुक्र त्रिकोण में हों [मान.] । ४७--पष्ठ में राहु सभस्त ग्रहों से दृष्ट हो [जा.सं.] ।

४८--चन्द्र से ६,८ स्थानों में शुभ ग्रह हों पाप ग्रह न हों चन्द्र शुभ ग्रह से युक्त हो

शुभ ग्रह के द्रेष्काण में हो [ प्रा. यो. ]। ४९--पूर्णं चन्द्र शुभ ग्रह युक्त १२ वें

स्थान में हो [प्रा. यो.| । ५०--चन्द्रमा शुभ ग्रह की राशि का हो उस पर लग्नेश की

दृष्टि हो अन्य ग्रह की दृष्टि न हो | प्रा. यो. ]। ९१--चन्द्र से गुरु दशम, बुध

शुक्र द्वादश, पाप ग्रह एकादश घर में व लग्नेश तृतीय, चतुर्थ या दशम में हो, या

एकादश स्थान में हो, चन्द्र शुभ ग्रह युक्त या दुष्ट हो [ जा. भरण |। ५२--जन्म

राशीश बलिष्ट हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो [ प्रा. यो. ]। ५३-रात्रि का जन्म हो

चन्द्र पूर्ण हो वृप या कर्क राशि का [ उच्च या स्वगृही ] या वृष ककं के नवांश में

हो शुभ ग्रह की दृष्टि हो [ जा. भ. ] । ५४--त्रिपुष्कर योग पूर्ण हो [ जा. भ: ] !

त्रिपु्कर योग तिथि वार नक्षत्र

२ शनिवार विशाखा या

७ मंगलवार उत्तरा फाल्गुनी या

१२ रविवार पूर्व भाद्रपद, पुनर्वसु, कृतिका, उत्तराषाढा

जव तिथि वार नक्षत्र उपरोक्त हो तब यह योग होता है।

५५--पुष्य नक्षत्र के दूसरे या तीसरे चरण, रोहिणी के दूसरे चरण में चन्द्र

शुभ ग्रह से युवत या दृष्ट हो [ मान. ] । ५६--केन्द्र में कर्क या मेष का चन्द्र हो उस

पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो यदि चन्द्र क्षीण भी हो तो अरिष्ट भंग हो [ जा. भ. ]।

५८--क्षीण चन्द्र सप्तम में हो शभ ग्रह लग्न में हो केन्द्र में दो-दो ग्रह हों [जा-भ.] ।

ए८--पूर्ण चन्द्र हो और लग्न में गुरु हो [ प्रा. यो. ]। ५९--साप ग्रह शुभ ग्रह के

८ड वर्ग में हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो [ मान. ] । ६०--सूर्य उपचय स्थान में हो पाप

बत न हो [ मान. ]।

आयुर्दाय विचार : २४५

अरिष्ट भंग योग

६१--सवं ग्रह उपचय स्थान में हों [ मान. 11 ६२--छग्न से या चन्द्र हे २ ग्रह, ३ ग्रह या वहुत ग्रह एक राशि छोड़ कर एक ठिकाने हों [ मान. 11 ६३--ग्रुरु सवक्षेत्री का चतुर्थ में हो उस पर पूर्ण चन्द्र की दृष्टि हो [ मान. ] । ६४--छग्न, धन या द्वादश स्थान में ३-३ ग्रह हों [मान.] । ६५-शुक्लपक्ष में जन्म हो लान पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो या कृष्ण पक्ष में जन्म हो लग्न पर पाप ग्रह की दृष्टि हो टो सव अरिष्ट नाश हो जाते हैं [ वृ. पा. ]। ६--पाप गृह शुभ गृहो के वीच हों या केन्द्र त्रिकोण में शुभ गह हों तो सब अरिष्ट नाश हो [वृ.पा. ] । ६७--मंगल यदि गुरु से युक्त या दृष्ट हो [ वृ. पा. ]। ६८--लग्नेश ठग्न में हो सब गुहो की उस पर दृष्टि हो [ जा. भ. ]। ६९--दशा के आरम्भ समय में कोई गृह अधिमित्र के घर में हो और शुभ गूह या मित्र ग्रह की दृष्टि हो तो अरिष्ट दूर हो [थीधर] 1 ७०--जन्म समय आकाश निमंल हो ग्रह स्वस्थ हो मेघ नील वर्ण वाले साफ हों मंद-मंद पवन चलता हो शुभ मुहृतं हो ऐसे समय जन्म हो तो सव अरिष्ट भंग हो [जा.भ.]। ७१-जन्म समय तारा उदय हो तथा मरचि आदि सप्त ऋषियों का उदय हो [ स. चि. ] । ७२- जन्म सायं या प्रातः संध्या में हो या वैधृति व्यतीपात योग में या भद्रा में या गंडांत काल में जन्म हो और सब ग्रह दृश्य भाग लग्न से लेकर सातवें भाव तक हों तो सब अरिष्ट भंग हो [जा.भ.] | ७३--चन्दर, चन्द्र स्थान का स्वामी, और. लग्नेश ये तीनों अच्छे स्थान में हों शुभ ग्रह से युवत या दुष्ट हों और अधिक गुण [उच्चादि] में हों वह समय जातक को अति शुभ और लाभदायक है [फल.] । ७४--गुरु पूर्ण बली हो पूर्ण किरण से प्रकाशित हो यदि वह लग्न में हो तो कई अरिष्ट जो दूसरे प्रकार से दूर करना कठिन है वह सव दूर कर सकता है [फल.] । ७५--पूर्ण चन्द्र यदि केन्द्र त्रिकोण या ग्यारहवें भाव में हो साथ ही सूय चन्द्र या गुरु की राशि या नवांश में हो तो सव दोषों को पूर्ण रूप से दूर कर सकता है [फल.] । ७६--चन्द्रमा लग्न से ६,८, १२ भाव में भी हो परन्तु शुभ दुष्ट हो [ ज्यो. र. ] ७७--केन्द्र या आपो- क्लिम या पणफर में सव ग्रह हों और शुभ ग्रह के नवांश में हों [ जा. भ. | 1 ७८-- ३,६,११ भाव में मंगल शनि राहु एकत्र या दो या एक ही हों [ ज्यो. र. 11

रिष्टकर और रिष्टभंगकर विचार

अरिष्ट करने वाले ग्रह को रिष्टकर और अरिष्ट भंग करने वाले ग्रह को रिष्ट- भंगकर ग्रह कहते हैं ।

अल्पायु योग आदि जो पहिले वता चुके हैं वे सव अरिष्ट कारक योग हैं अंत में अरिष्ट भंग योग ऊपर बताया गया है ।

` पहिले देख लेना चाहिये कि अरिष्ट तो नहीं है, इसमें गणितागत आयु लागू होगी या नहीं । कई ग्रह अरिष्ट कारक हों तो उनमें जो वली हो वही रिष्टकर ग्रह होगा । इसी प्रकार रिष्ट भंग करनेवाले योगों में जो ग्रह बली हो वह लेना फिर रिष्टकर और रिष्ट-

२४६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

भंगकर ग्रहों के बलाबल पर विचार कर देखना कि कौन बली है। रिष्टभंगकर ग्रह वली

होंगे तो अरिष्ट नहीं होगा ।

इसका विचार गणित खंड में दिया है जिससे प्रगट होता है कि शुभत्व कितना है

और अशुभत्व कितना है ।

यहाँ स्थूल रूप से उसका विचार बताया जाता है रिष्टेश और भंगेश दोनों प्रकार

के ग्रहों में देखो ।

(१) ग्रह शुभ है या पाप (२) उसका प्रभाव मिलाकर अच्छा है या बुरा (३)

उसकी स्थिति क्या है। उच्च राशि, मूल त्रिकोण, स्वगृही, मित्र क्षेत्री, शत्रु क्षेत्री,

नीच अस्तंगत आदि में कसा है ।

फिर वर्गों में एक दूसरे का बळ घटाकर अन्तर निकालना । रिष्ट बड़ा होतो

रिष्ट होगा यदि भंगेश्वर बड़ा हो तो रिष्टकर का बुरा प्रभाव निकल जायगा । यदि

दोनों बराबर हों या बहुत अधिक अन्तर हो तो रिष्ट नहीं होगा ।

इसके लिए ग्रहों का राशि होरा द्रेष्काण आदि वर्ग ऊपर बताये प्रकार से अच्छा

या बुरा प्रभाव है।

अर्थात्‌ स्वामी की स्थिति उच्च मूल त्रिकोण स्वक्षेत्र अधिमित्र, मित्र, सम, शत्रु,

अधिशत्रु के घर का है बलवान्‌ या निंर है,ग्रह की युद्ध में स्थिति,अस्तंगत नीच आदि

के कारण स्थिति । इन परिस्थितियों को अच्छी प्रकार तौलना चाहिए। फिर उनकी

अच्छी या बुरी स्थिति पर से विचारना कि रिष्ट होगा या नहीं होगा ।

साधारण प्रकार से उनकी वर्ग में अच्छी और बुरी स्थिति को इस प्रकार

नम्बर देना ।

१-मित्र अधिमित्र मूल त्रिकोण आदि अच्छे घर का-१ नम्वर

२-शत्रु अधिशत्र आदि बुरे घर को-१ नम्बर

३-शुभ और पाप ग्रह को अच्छा या बुरा-१७१ नम्बर

४-उच्च और युद्ध जय को अच्छा-४ नम्बर

५-नीच अस्तंगत युद्ध में हारा-४ नम्बर

६-समत्व को कुछ नहीं गिना गया ।

कल्पित उदाहरण-मान लो शनि अरिष्टकर और मंगल अरिष्ट हर है--

वग मंगल शनि मंगल अरिष्ट हर अच्छा वुरा शनि अरिष्टकर

१ गृह ८ स्व० शत्रु गृह स्व० १ ० सूर्य ० १

२ होरा ४ मित्र ५ शत्र मंगल ० शंत्रू ० १

नीच होरा नीच ० ४ सूर्यं ० १

३ ब्रेष्काण १२मि ५ शत्रु चन्द्र १ ० शत्रु ० १

द्रेष्का” मित्र १ ० सूर्य ० १

४ सप्तांश ४ मित्र ६ मित्र गुरु १० शत्रु ० १

नीच

आयुर्दाय विचार : २४७

वर्ष मंगल शनि मं० अ० हर अच्छा बुरा शनि अ० कर

५ नवमांश ७ सम ३ मित्र सप्तांश नीच ०७ ४ बुध. १ ०

६ द्वादशांश १२मित्र शत्रू चन्द्र १ ० मित्र १ ०

७ त्रिशांश १२ मित्र ११ स्वा नवां० सम ० ० बुध १ ०

शुक्र १ ० मित्र १ ०

द्वाद० मित्र १ ० मंगल ० १

गुरु बे गा शुत चित्रा” मित्र १ ० शनि ० १

गुरु १ 40) lS

योग १० ४ ५ ९.

शेष +१ शेष -४

यहाँ रिष्ट हर मंगल का हित १०-९ अहित=्शेष + १ हित रिष्ट कर शनि का

५-९ अहितः=शेष--४अहित +१ हित -४ अहित- -३ महित = अरिष्ट अधिक होने

से अरिष्ट होगा ।

अध्याय &

मारक स्थान

मारक स्थान--लग्न से तृतीय और अष्टम स्थान ये दोनों आयुर्दाय के स्थान हैं।

इन दोनों के व्यय स्थान अर्थात्‌ द्वितीय और सप्तम स्थान मारक स्थान हुए । इनमें

सप्तम से द्वितीय स्थान अति प्रबल हैं मारक का अर्थ यह है। कि मार डालने वाळा या

अरिष्ट उत्पन्न करने वाला स्थान । इन स्थानों के स्वामी या इससे सम्बन्ध रखने वाले

ग्रह अरिष्ट उत्पन्न करते हैं। इन ग्रहों की दशा में अरिष्ट या मृत्यु होती है। इन सब

में जो प्रबल ग्रह हो वही मारकेश होगा ।

मारकेश-२ और ७ मारक स्थान हैं । इनके स्वामी साधारण प्रकार से मारकेश

ग्रह कहलाते हैं ।

मारक ग्रह--२ और ७ स्थान में स्थित पाप ग्रह तथा द्वितीयेश और सप्तमेश

के साथ रहने वाला पाप ग्रह भी मारक गूह है । *

मारकेश विचार

१-ऱसाध!रणत: २ और सात भाव के स्वामी मारक हैं । २-प्रह जो २, ७ भाव

२४८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

में हैं या इन भावों पर जिनकी दृष्टि है । ३--सूर्य चन्द्र को छोड़कर मारक स्थान के स्वामी होने से सव ग्रह मारक होते हैं। ४--६, ८, १२ स्थान के स्वामी और राहु केतु भी मारक स्थान में पड़ने से मारक होते हुं । ५--उपरोबत प्रकार से मारकेश प्रकट न हों तो व्ययेश से युक्त शुभ ग्रह या ३,८ भाव के स्वामी या पप्ठेश मारक होता है । ६--आत्म कारक या लरत से तृतीयेश, पष्ठेश, अष्टमेश और द्वादशेश में जो बली हो वह मारक होता । ७--शुभ ग्रह २, ६ भाव के स्वामी हों व स्वोच्च मूल त्रिकोण में हों और इनका शुभ ग्रहों रे सम्बन्ध हो तो मारक होते हैं । ८--शुभ ग्रह गुरु शुक्र केन्द्रेश होने से दोष युक्त होते हूँ । ये यदि मारक स्थान में हों विशेषकर द्वितीय स्थान में या इन स्थानों के स्वामी हों तो प्रवल मारक होते हैं । द्वितीयेश, सप्तमेश या अष्ट- मेश मारकेश होते हैं ०रन्तु शनि और केतु महा मारक हैं। यदि पष्ठ स्थान में बहुत पाप ग्रह हैं तो पष्ठेश भी मुख्य मारक होता है। १०--शनि, मांदि, राहु गुलिक और अष्टमेश जहाँ हो उनके राशि का नवाश स्वामी भी मारक होता । ११-- विपत्ति और प्रत्यरि तारा ( जन्म नक्षत्र से तीसर और पांचवें नक्षत्र के स्वामी ) तथा वध तारा ( जन्म नक्षत्र से ७ वाँ तारा ) इसके स्वामी भी मारक होते हैं । जैसे धनिष्ठा नक्षत्र का जन्म है तो उससे तीसरा पूर्व भाद्रपद और पाँचवाँ रेवती. सातवां भरणी नक्षत्र हुए । जन्म नक्षत्र का जो चरण हो उससे ४-४ चरण का एक नक्षत्र जानना । जेसे धगिष्ठा के तीसरे चरण का जन्म है तो पूर्वाभाद्रपद का तीसरा चरण कुंभ राशि आया जिसका स्वामी शनि है, रेवती की मीन का स्वामी गुर और भरणी की मेष का स्वामी मंगल हुआ ये भी मारक हुए ।

मारकेश पर विचार--सवसे पहिले यह देखना कि कुण्डली में अल्प मध्य या पूर्णायु में क्या है । ग्रह की दशा निकाल कर यह जान लेना चाहिए कि अल्पादि आयु अनुमान से किस ग्रह की दशा में पूर्ण होगी । उस ग्रह की अन्तंदशा आदि निकाल कर कौन ग्रह मारक हो सकता है इसका विचार करना चाहिए । मारकेश अपनी अन्तर्दशा में मृत्यु का अरिष्ट करता हू मारक ग्रह अपनी दशा में मारक प्रभाव नहीं करते । विदशा, सुक्ष्म दशा, प्र(णदशा ग्रहा की इनमें कौन मारक है यह निश्चय करना चाहिए । वली कूर ग्रहों से सम्वन्ध होने से इनकी दशा में मारक ग्रह प्रभाव करते हैं ।

इस सम्वन्ध में मारकेश या मारक ग्रह का कब्र प्रभाव होगा, निम्न बातों पर विचार करना :--

६-जव २ या ७ भाव के स्वामी की महादशा हो उसके अन्तर में किसी दूसरे मारक ग्रह की अन्तदेशा हो । २-२, ७ भाव के स्वामी में से किसी मारकेश की महा- दशा हो और उसके अन्दर अष्टमेश की अन्तर्दशा हो । ३-अष्टमेश शुभ ग्रह की अन्तदंशा हो उसका त्रिकोण के स्वामियों से कोई सम्वन्ध न हो । ४-इधर मारकेश के अन्दर अष्टमेश की दशा हो । ५-मारकेश की महादशा के भीतर ऐसे अष्टमेश को दणा हो जो शुभ तो हो परन्तु त्रिकोण के अशुभ गृह स्वामियो से सम्बन्ध न हो । ६-किसी

मारक स्थान : २४९

मारकेश की महादशा के भीतर केन्द्रवर्ती शुभ ग्रह का अन्तर आवे | ७-मारकेश की

महादशा के भीतर केन्द्र स्वामियों की अन्तर्दशा हो जो शुभ ग्रह हो । ( केन्द्रेश शुभ

अच्छे नहीं होते) । ८-किसी मारकेश की महादशा के भीतर द्वादशेश की अन्तर्दशा हो

जो शुभ ग्रह न हो । ९-मारकेश की महादशा के भीतर ऐसे द्वादशेश की अन्तदंशा हो

जो शुभ ग्रह हो ५, ९, १, ४, १० भाव के स्वामियों से सम्बन्ध न रखता हो । १२-

मारकेश की महादशा के भीतर त्रिषडाय स्थान के स्वाभियों की अन्तदंशा हो । ११०

व्ययेश की महादशा में धनेश की अन्तर्दशा या धनेश के भीतर व्ययेश की अन्तर्दशा हो ।

१२-वे ग्रह जो धनेश और व्ययेश के साथ हों। १३-अष्टमेश की महादशा में पष्ठेश

का अन्तर या पष्ठेश के भीतर अष्टमेश का अन्तर । १४-व्यय भाव में जो ग्रह हों

कभी-कभी उनके अन्तर में । १५-मारकेश की महादशा में मारक स्थान में स्थित क्रूर

ग्रह की अन्तर्दशा में । १६-पाप ग्रह में पाप ग्रह का अन्तर । १७-शैनि पाप ग्रहों से

युक्त हो तो सबको दवाकर मृत्यु कारक होता है। १८-जब चन्द्र दुष्ट स्थान में पड़े

तो उसकी अन्तर्दशा में । १९-२, ७, १२, ८, ६ या ३ भाव के स्वामियों की अंतदेशा

में । २०-वारहवें या १० वें स्थान में केतु हो उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो उसको

अन्तर्दशा में । यदि शुभग्रह देखते हों तो मारक नहीं होता है । २१-पष्ठेश की दशा

भी मारक होती है।

इन सव पर विचार करना चाहिए इन सव में जो बलवान्‌ होता है उसकी दशा

अन्तदंशा में मृत्यु होती है वही मारक ग्रह कहलायेगा ।

उपर जो विचार वताया है उसमें कुछ वाते ऊपर बताये के अनुकूल हों कुछ प्रति-

कूल हों अर्थात्‌ सब वातं पूरी न हों तो शुभाशुभ से मिला फळ होता है मरण तो नहीं

होता मरण तुल्य कष्ट होता है ।

बहुत से ग्रह बलवान्‌ होकर मारकेश हों तो उनकी दशा में रोग कष्ट आदि होता

है । बलवान्‌ मारक ग्रह की दशा में मुत्यु या मृत्यु के तुल्य महारोग, भय, शोक,चोर

अग्नि भय आदि कष्ट होता है ।

लग्न के अनुसार शुभाशुभ व

मारक बिचार

अन्तर्दशा में त्रिकोण के स्वामी शुभ

होते है । त्रिषडाय ( ३, ६, ११ भाव ) के

स्वामी साहचर्यं वश शुभाशुभ होते हैं ।

केन्द्रेश-सम । केन्द्रेश पाप ग्रह शुभ, शुभ

ग्रह-अशुभ होते हैं ।

उदाहरण--

[१] जन्म मेप छग्न-मंगल अध्टमेश होने पर भी लग्नेश होने के कारण अशुभ

फल नहीं देगा । शुभ फल दायक ग्रह का सहायक होगा अर्थात्‌ शुभ कारक ग्रह की

२५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

दशा में अपनी अंतर्दशा में शुभ फल को बढ़ावेगा । पाप ग्रह की दशा में पाप फल को घटायेगा । -

२, ७ भाव कास्वामी होने से शुक्र, ३, ६ का स्वामी होने से बुध और ११ स्थान का स्वामी होने से शनि ये तीनों पाप फल दायक होंगे ५,९ भाव के स्वामी होने से सूयं और गुरु शुभदायक होंगे । गुरु द्वादशेश होने पर त्रिकोण नवम भाव का: स्वामी होने से भी शुभ है। पर द्वादशेश होने से शनि आदि पापी के संयोग होने से साहचर्यं वश पाप फल ही देगा।

शनि केन्द्रेश होने से शुभत्व नाश होने पर भी लाभेश होने के कारण पाप हुआ । चन्द्र केनद्रेश होने से सम हुआ, यहाँ शक्र २,७ का स्वामी होने से प्रबल मारक हुआ । मारकेश से सम्वन्ध होने पर बुध और शनि भी मारक हो सकेंगे । [२] वृष लग्न--८, ११ भाव का स्वामी होने से गुरु; षष्ठेशे होने से शुक्र, तृती- येश होने से चन्द्र यहाँ पाप फलदायक हुए । त्रिकोण होने से शनि, त्रिकोणेश बुध शुभ हैं । मंगल सप्तमेश और व्ययेश होने से, गुरु अष्टमेश और लाभेश होने से, शुक्र षष्ठेश “होने से पाप फल प्रद होंगे । सूर्ये पाप ग्रह केन्द्रेश होने से शुभ है। इस प्रकार गुरु शुक्र चन्द्र पाप प्रद, शनि, सूर्यं शुभ, बुध अल्प शुभ प्रद है। क्योंकि वह दूसरे स्थान का भी स्वामी है । शनि राजयोग कारक है । यहाँ गुरु शुक्र मंगल ये मारक होते हैं । मिथुन छम्न--मंगछ [ ६,११ का स्वामी ] गुरु [ ७,१० का स्वामी ], सूर्य [ तृतीयेश ] ये पाप फल प्रद हैं । शुक्र [ पंचमेश व्ययेश ] शुभप्रद है । शनि [अष्टमेश नवमेश ] योग कारक होकर भी गुरुके योग से पूर्ण योग फल नहीं होता । चन्द्रमा [ द्वितीयेश ] मुख्य मारक होकर भी नहीं मारता । मंगल गुरु सूर्यं मारक हो सकते हूँ । ४ [४] कर्केलग्न--शुक्र [लाभेश, चतुर्थेश], बुध [तृतीयेश, व्ययेश] पाप फल प्रद हैं । चन्द्र [लग्नेश], मंगल [पंचमेश, दशमेश], गुरु [पष्ठेश, नवमेश] शुभ हैं। मंगल विशेष योग कारक है । शनि [ सप्तमेश, अष्टमेश ] मारक हैं । सूयं [ द्वितीयेश ] साहचर्य से फल देता है । [५] सिंह छग्न- बुध [ द्वितीयेश, लाभेश ], शुक्र [ तृतीयेश, दशमेश ], शनि [षष्ठेश, सप्तमेश], ये पाप फल प्रद हैं । मंगल [ चतुर्थेश, नवमेश ], गुरु, [अष्टमेश, पंचमेश], सूयं लग्नेश शुभ प्रद हैं । किन्तु गुरु और शुक्र के सम्वन्ध मात्र से ही शुभ फल नहीं होता| शनि [ षष्ठेश सप्तमेश | मारक है । चन्द्र [ व्ययेश ] साहचर्य से फल प्रद होगा ।

[= ] कन्या छग्न--मंगल [ तृतीयेश, अष्टमेश ], गुरु [चतुर्थेश, सप्तमेश], चन्द्र [ छाभेश ] पाप फल प्रद है । शुक्र [ द्वितीयेश, नवमेश |, बुध [ लग्नेश, दशमेश |, ये शुभ हैं और योग कारक हैं । शुक्र मारकेश होने पर भी नवमेश होने के कारण नहीं मारता । सूर्य (व्ययेश) साहचथं से फलप्रद है यहाँ मंगल और गुरु मारक होंगे ।

मारक स्थान : २५१

(७) तुला लस्न--गुरु ( तृतीयेश, षष्ठेश ), सूर्य ( लाभेश ), मंगल ( द्वितीयेश, सप्तमेश ) पाप फल प्रद हैं । शनि ( चतुर्थेश, पंचमेश ), बुध (नवमेश, व्ययेश) शुभ हैं। चन्द्रमा (दशमेश) है यहाँ चन्द्रमा और बुध ये राजयोग कारक हैं । मंगल मारक है। सूर्य गुरु भी मारक लक्षण वाले हैं । शुक्र ( लग्नेश और अष्टमेश दोनों होने से सम है।

(०) वृश्चिक लग्न--वुध ( अष्टमेश, लाभेश ), शुक्र ( सप्तमेश व्ययेश ) शनि (तृतीयेश, चतुर्थेश) पाप फल प्रद है। गुरु (द्वितीयेश पंचमेश) चन्द्र (नवमेश) शुभ हैं। सूर्य (दशमेश) और चन्द्र ये राजयोग कारक हैं मंगल षष्ठेश लग्नेश का सम है ।

गुरु मारकेश होने पर भी त्रिकोणेश होने के कारण नहीं मारता । शुक्र, बुध, शनि, पाप ग्रह मारक लक्षण वाले ग्रह होते हैं ।

(९) घनु लग्न--णुक्र (पष्ठेश, लाभेश) पाप प्रद है । सूर्य ( नवमेश ) मंगल

( पंचमेश, व्ययेश ) शुभ हँ । बुध सप्तमेश दशमेश है यहाँ सूर्य और बुध योग कारक हैं। चन्द्र अष्टमेश है। शनि ( द्वितीयेश, तृतीयेश ) मुख्य मारक ओर पाप ग्रह हैं । शुक्र भी पापी होने के कारण मारक लक्षण युक्त है । गुरु ( चतुर्थेश ओर लग्नेश ) सम है।

(१०) मकर लग्न-मंगल ( चतुर्थेश, लाभेश ) गुरु ( तृतीयेश व्ययेश ) चन्द्र ( सप्तमेश ) पाप फल प्रद हैं । शनि द्वितीयेश लग्नेश मारक होने पर भी स्वयं नहीं मारता । मंगल गुरु चन्द्र मारक होते हैं शुक्र सुयोग कारक है । सूयं अष्टमेश है ।

(१२) कुम्भ लग्न--गुरु ( द्वितीयेश छाभेश ), चन्द्र षष्ठेश, मंगल ( तृतीयेश दशमेश ) पाप फळ प्रद हैं । शुक्र (चतुर्थेश नवमेश) शुभ है । शनि (व्ययेश, लग्नेश), सम । सूर्य सप्तम होने से मारक है यहां गुरु सूर्यं मंगल मारक होंगे । बुध ( अष्टमेश पंचमेश ) मध्यम फल प्रद है।

(१३) मीन लग्न--शनि ( दशमेश, लाभेश ), शुक्र (तुतीयेश, अष्टमेश), बुः ( चतुर्थेश, सप्तमेश ) सूर्य ( षष्ठेश ) पापप्रद हैं । मंगल ( दितीयेश, नवमेश ), चन्द्र ( पंचमेश ) शुभ है। गुरु ( दशमेश, लग्नेश ) और मंगल राजयोग कारक है । मंगल मारकेश होकर भी नहीं मारता । बुध और शनि यहाँ मारक हैं ।

इस प्रकार मारक ग्रहों का विचार होता है । सूर्य चन्द्र को छोड़कर सब ग्रह मार- केश होने पर मारक होते हैं । मारक ग्रह बहुधा अपनी दशा में नहीं मारता । पाप फल प्रद ग्रह की अंतर्दशा में मारता है शुभ प्रद ग्रह की दशा में नहीं मारता । अन्य रीति से मारकेश विचार--

मांदि ग्रह से भी मारकेश निकाला जाता है । दिन इतवार | सोमवार | मङ्गल | बुध | गुरु | शुक्र | शनि सूर्योदय से घटी २२ |२ वाँ बा) | २२ | १८ ।१४।१०| ६ ।२ (दूसरा)

जिस लग्न में मांदि ग्रह है वही मारकेश समझना । वहाँ २-३ ग्रह हों तो उनमें

२५२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

जो बलवान्‌ होगा वही मारकेश होगा । वहाँ कोई ग्रह न हो तो मांदि लग्न का स्वामी ही मांरकेश होगा ।

इष्ट दिन को कितनी घड़ी पर मांदि है ऊपर दिया है मान लो मंगलवार के दिन किसी का जन्म १५-५१ पर हुआ उस समय रा० ११-४९ का दिनमान २९-५४ था। मंगलवार को १८ वीं घड़ी पर मांदि है जैसा ऊपर चक्र में बताया है १८ वीं घडी इष्ट पर उस दिन का लग्न निकाला कर्के मांदि लग्न आई । कुंडली में कर्क में

कोई ग्रह नहीं था इससे ककं का स्वामी चन्द्र ही मारकेश हुआ ।

इसको गणित से इस प्रकार भी निकालते हैं-(दिनमान % उपरोक्त मांदि ध्रुवांक)

=३० मांदि इष्ट । इस पर से लग्न निकाल लो ।

यहाँ दिनमान घ०>२९प०५४ % मंगलवार काघ्रुवांक १८८(५७७-४८) + ३० =

घ०१८प०३५वि०३६ मांदि इष्ट आया । इस पर से लग्न निकाला तो ककं के १ अंश

आया । कर्के मांदि लग्न आंया । यहाँ ककं का स्वामी चन्द्रमा मांदि ग्रह मारक हुआ । चन्द्रमा मारकेश नहीं होता इससे मारक ग्रह का विचार ग्रह परिस्थितियों पर से

करना होगा ।

मारक ग्रह निश्चित करना

शनि मांदि गुलिक, राहु और अष्टमेश जहाँ हो उनकी राशि का नवांश स्वामी जातक को मारक होता है जबकि इनमें से किसी खराब ग्रह की दशा हो और शनि "उससे अष्टम में आवे ।

उदाहरण--लग्न कुंडली नवांश कुंडली

लग्न से अष्टमेश शनि है । चन्द्रमा से अष्टमेश बुध है जो लग्नेश भी है और

त्रिकोण में है । यहाँ अष्टमेश स्वतः शनि ही है । लग्नेश बुध है ।

नवांश में यह शनि ३ भाव में है जिसका स्वामी

गुलिक ५ ) „» >» सूर्य हैं सूर्य चन्द्र को छोड़कर

मांदि ¥ sss » चन्द्र. यहाँ बुध और गुरु ही

राहु ९ त 0) „ गुरु मारक हुए ।

मारक स्थान : २५३

" इन दोनों में गुरु निर्बेल है। लग्न कुण्डली में नोच का है और नवांश कुण्डली में अपने शत्रु शुक्र के घर में है । जिसकी दृष्टि भी है इससे गुरु मारकेश हो सकता है । । करन कुण्डली में भी यह गुरु शुभ ग्रह केन्द्रेश होने से और अष्टम में होने से खराब है इसके सम्मुख मांदि और गुलिक भी है । नवांश कुंडली में मांदि कर्क का है इससे शनि जब गोचर में ककं का होगा या ककं से अष्टम में अर्थात्‌ कुंभ में होगा तब मृत्यु संभव है जवकि गुरु की अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा हो । मृत्यु समय

१-०जन्म काल में बलहीन लग्न हो तो लग्नेश अष्टमेश की दशा कष्ट देने वाली होती है और दशा के अन्त में सुख होता है । परन्तु लग्नेश वली हो तो अष्टमेश की दशा में मृत्यु होती है ।

२--अष्टमेश बली हो तो लग्नेश की दशा में मृत्यु होती है । ३--शनि लग्न या अष्टम में हो तो उसकी दशा अन्तदंशा में मृत्यू होती है । ४--छग्नेश और अष्टमेश जिस ग्रह से युत हो वह निर्बल हो तो उसकी दशा अन्तर्दशा में मृत्यु हो ।

५--लग्नेश अष्टम में या पाप ग्रहों से युक्त अष्टमेश अस्त हो या शत्रु गृह में हो तो मृत्यु हो ।

६--अष्टमेश ६,०,१२ भाव में कहीं हो तो उसकी अंतर्दशा में । ७--शनि जिस स्थान में हो उस स्थान के स्वामी की दशा और अष्टमेश को अंत्ईशा में ।

८--अप्टमेश की दशा ओर अष्टम स्थान में स्थित ग्रह को अंतर्दशा में । ९--अष्टम स्थान में २-३ ग्रह हों तो उनमें जो सबसे निर्बल हो उस ग्रह की अन्तर्देशा में ।

१०--लग्न से पंचम राशि के स्वामी से युक्त ग्रहों की दशा संख्या में १ २ से भाग देने से जो शेय बचे उसके समान संख्या वाली राशि में जब सूर्य आवे । ११--पंचमेश किसी अन्य ग्रह से युक्त न हो तो केवल उसी की दशा वर्ष से विचारना । १२--लस्नेश से युक्त ग्रह की दशा वर्ष में ३० का भाग देने से जो शेप बचे उतने दिन संक्रांति दिन से वीत जाने पर।

१३--ऊग्नेश अष्टमेश दोनों किसी भी ग्रह से युत होकर केन्द्र या कोण में स्थित हो तो अष्टम स्थान में स्थित ग्रह की दशा में निश्चय मृत्यु होगी । १४-ऊग्नेश अष्टमेश दोनों ६,१२ घर में होकर राहु या केतु के साथ हो तो लग्नेश या अष्टमेश से युक्त ग्रह की.दशा में मृत्यु होगी । अन्य मत लग्नेश किसमें शेष उपरोक्त ।

१५--यदि दोनों के साथ कोई भी ग्रह न हों तो उनसे युक्‍त राशि स्वामी की दशा में ।

२५४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१६--पुर्वोक्त ग्रहों की दशा में राहु की अन्तर्देशा आने पर मुख्य मारक होता है ।

१७--नक्षत्र आयुर्दाय साधन से जो वर्ष प्रमाण आयु निकलती है ठीक उसी

समय किसी का मरण हो जाय ऐसा नियम नहीं है उसके आगे-पीछे भी प्रवल मारकेश

की दशा अंतर्दशा प्राप्त होने पर मृत्यु हाती है ।

१८--२, ७ भाव के स्वामी की दशा अंतर्दशा में व मारक स्थान में जो पाप

ग्रह हो या मारकेश ग्रह के साथ जो पाप ग्रह हो उसकी दशा अंतदंशा में संभव रहने

पर गणितागत आयु की समाप्ति समय आने पर मरण होता है।

१९--इसके असभव होने पर अर्थात्‌ मारक स्थान में कोई भी पाप फल दायक

प्रह न होवे और मारकेश के साथ भी कोई ग्रह न हो तो उस परिस्थिति में लग्न से

व्ययेश ग्रह की दशा में मारकेश की अंतर्देशा आने पर मरण होगा।

२०--मारक स्थान २, ७ के स्वामी और मारक स्थान में रहनेवाला या मारकेश

के साथ रहनेवाला ओर त्रिषडाय आदि स्थान के स्वामी ग्रह इस प्रकार ३ मुख्य

मारक हैं । ॥ :

इनमें द्वितीमेश सबसे प्रबल है उससे न्यून सप्तमेश है, उससे न्यून द्वितीय स्थान में

रह्नेवाला ग्रह, उससे न्यून द्वितीयेश के साथ रहनेवाला ग्रह, उपसे न्यून सप्तम में

रहनेवाला ग्रह, उससे न्यून सप्तमे ग के साथ रहुनेवाला पापी ग्रह मारक होता है इनमें

जो प्रवल मारकेश हो उसमें से किसी एक की दशा में और दूसरे की अंतर्दशा आने

पर संभव रहने पर मरण होगा ।

२१--इन मारक सम्वन्धी ग्रहों के असंभव होने पर द्वादशेश की दशा में मारकेश

का अंतर आने पर मरण होगा ।

२२--उपरोक्त मारकेशों की दशा न आने पर व्ययेश के सम्वन्ध रखने वाले

शुभ ग्रहों की दशा में भी ओर कभी अष्टमेश की दशा में भी मरण होता है ।

२३-यदि मारकेश सम्बन्धी शुभ और अष्टमेश की दशा न हो तो केवल मारकेश

के सम्वन्ध बिना ही पाप फल देने वाले ग्रहों की दशा में मरण होता है ।

मारकेशों में व्ययेश निर्बल है उसके सम्बन्ध से भी शुभ ग्रहों में मारकत्व आ

जाता है तब मुख्य मारकेशों से सम्बन्ध रखने वाले ग्रहों में भी क्यों नहीं मारकत्व

आयगा ।

२४-३, ६ आदि अशुभ स्थान के स्वामी होने से यदि पाप कारक शनि का

मारक ग्रहों से सम्बन्ध हो तो अन्य सब मारक को हटांकर अकेला शनि ही कारक

होता है । शनि तो बिना मारक के सम्बन्ध के ही साधारण प्रकार से मारक होता

है तब मारकेश से सम्बन्ध होने से प्रबल मारक होगा ही। त्रिषडाय आदि का

स्वामी होने से पाप कारक होकर शनि मारक हो जाता है।

२५--यदि क्रूर ग्रह को महादशा में कर ग्रह का ही अन्तर हो चाहे शत्र, ग्रहों

से या मित्र ग्रहों से योग हो तो जातक की मृत्यु हो जाती है । डि |

मारक स्थान : २५५

२६--मंगल की दशा में शनि की अंतर्दशा हो तो चिर जीवी भी मृत्यु को

आप्त हो 1

२७--कूर राशि में पाप ग्रह ६या ८ घर में हो और शुक्र या सूर्य की उस पर

दृष्टि हो तो उप्त कूर ग्रह की दशा में मृत्यु होगी ।

२०--जन्म लग्नेश का शत्रू, ग्रह लग्नेश की दशा के अन्तर में जब आता है तव

अकस्मात्‌ मृत्यु होती है ऐसा सत्याचायं का मत है ।

२९-मारक ग्रह अपने सम्बन्ध होने पर भी शुभग्रह (त्रिकोणेश आदि) की अंतर्दशा

में नहीं मारता किन्तु बिना सम्बन्ध के भी पाप ग्रह की अंतर्देशा में मरण होता है !

३०--अल्पायु वाले को-विपत्ति ( तृतीय ) तारा में मृत्यु भय ।

मध्यायु वाले को-प्रत्यरि ( पांचवीं ) तारा में या लग्नेश के शत्रू, की दशा में मृत्यु ।

दीर्घायु वाले को-वध ( सातवाँ ) तारा में या अष्टमेश की दशा में मृत्यु ।

३१-छग्न द्रेष्काण से २२ वां द्रेष्काण जो हो उस राशि का स्वामी तथा विनाश

नक्षत्र ( जन्म नक्षत्र से २३ वां) का स्वामी तथा ३, ५, ७, ताराओं के स्वामी और

चन्द्रमा जिस राशि में हों उससे द्वितीय और द्वादश स्थान के स्वामी यदि दोनों पापी

हों तो ये सब भी मारक होते हैं ।

३२--मारकेश की दशा में ६, ८, १२ भाव के स्वामी में से किसी किसी की

अंतर्देशा हो तो विशेष कर मरण संभव है ।

३३---राहु या केतु यदि लग्न से ७, ८, १२ भाव में या मारकेश से ७ भाव में

या मारकेश से युक्त हों तो वह मारक होता है ।

३४--मकर और वृश्चिक लग्न वालों को राहु मारक होता है ।

३५--६, ८, १२ भाव में राहु हो तो उसकी दशा काल में कष्ट होता है, यदि

उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि या योग हो तो कष्ट नहीं होता 1

३६--दशमेश, अष्टमेश, लग्नेश और शनि के मध्य में राहु युक्त और बल

रहित जो ग्रह हो उसकी अन्तर्देशा में मरण या उसके साथी या दर्शी ग्रह की अंतर्दशा में मरण हो ।

३७--दशमेश बली हो तो लग्नेश की दशा में मृत्यु हो ।

३८--शीर्षोदय राशि में चर आदि राशियों में क्रम से धनेश की, लग्नेश की

और राहु की दशा में मृत्यु हो, अर्थात्‌ जब शोर्षोदय राशि चर हो तो धनेश की,

स्थिर हो तो लग्नेश की द्विस्यभाव राशि हो तो राहु की दशा में मृत्यु होगी ।

यदि पृष्ठोदय राशि हो तो क्रम से चरादि राशि में उसके द्रेष्काणेश व उसके

देखने वाले ग्रह तथा उसमें युक्त की दशा में मृत्यु होगी ।

शीर्षोदय राशि ३, ५, ६, ७, ९, ११ |

पृष्ठोदय राशि २, ४, १, ९, १० का अन्त ।

३९--अल्पायु योग हो और अश्विनी नक्षत्र में उत्पन्न हुआ हो ( केतु दशा में )

तो उससे तीसरी दश सूर्य की होती है उसमें मरण होगा । इसी प्रकार जन्म नक्षत्र से

२५६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

तीसरे नक्षत्र की दशा विशोत्तरी के अनुसार विचार लेना जैसे घनिष्ठा नक्षत्र में जन

हो तो तीसरा नक्षत्र पूर्वा भाद्रपद हुआ इसमें गुरु की दशा आती हैं ।

मध्यायु--लग्नेश के शत्रु की दशा में मृत्यु होगी मान लो लग्नेश बुध है तो उसके

शत्रु चन्द्र की दशा में मृत्यु होगी ।

दीर्घायु--अष्टमेश की दशा में मृत्यु हो। मान लो मिथुन लग्न है अष्टम में मकर

हुआ उसका स्वामी शनि अष्टमेश की दशा में मृत्यु होगी ।

४०--लग्न से अष्टम स्थान में लग्नेश, दशमेश व शनि इन तीनों में जो निवंल

हो उस ग्रह की दशा में मृत्यु हो ।

४१--मंगल की दशा--पंचमी में मृत्यु होती हैं या पाँचवीं दशा में ।

गुरु की दशा--षष्ठी में मृत्यु होती है या छठवीं दशा में ।

शनि की दशा--चतुर्थी में मत्यु होती है या चोथी दशा में ।

राहु की दशा--सप्तमी में मृत्यु होती है या सातवीं दशा में ।

जैसे किसी का जन्म भरणी नक्षत्र में हो तो शुक्र की विशोत्तरी दशा हुई इससे

छठवीं गुद की दशा आने पर मारक होगी (१ शुक्र, २ सयं, ३ चन्द्र, ४ मंगल ५

राहु, ६ गुरु की ) इस दशा में प्रयत्न से वचना । कोई जन्मदशा हो उससे यदि चौथी

शनि की पड़ जाय या राहु की सोतवों या मंगल की पांचवीं दशा पड़ जाय या छठवीं

गुरु की दशा पड़ जाय तव मारक होती है ।

४२--तीसरे छठें या आठवें के स्वामी की दशा कठिन होतो है जब उन पर पाप

ग्रह की दृष्टि हो तव मरण होता है । जब ये नीच में, अस्त, शत्रु गृही, ग्रह युद्ध में

पराजित हो और पाप ग्रह की भी दृष्टि हो तव और भी अधिक बुरे हैं । ३,६,८ घर

के स्वामी यदि क्रूर अंश में हों तो भी अपनी दशा में मरण करते हैं ।

४३--लग्नेश पाप युक्त और अस्त हो या नीच में या शत्रुगृह हो तो जव गोचर

में वही स्वामी दुष्ट स्थान ( ६,८,१२ ) में या लग्न में जावे या किसी प्रकार इनसे

सम्बन्धित हो तब मरण होता है ।

४४- लग्नेश छठे हो तो जिस राशि में बैठा हो उस राणि के समान वर्षों में

मृत्यु करता है । द्रेष्काण स्वामी छठे बंठा हो तो उतने महीनो में मृत्यु करता है ।नवांश

` स्वामी छठे बेठा हो तो उतने दिनों में मृत्यु करता है ।

४५--लग्नेश सूर्य से अस्त हो और अष्टमेश से दृष्ट हो तो जिस राशि में

लग्नेश बैठा हो उस राशि के समान बर्षो में रिष्ट करता है ।

४६--छग्तेश शत्रु राशि में हो तो राशि के अंक समान वर्षों में मृत्यु करता है। ४७- होरेश सूर्यं हो ओर सर्य से युक्त अष्टम में हो शुक्र की दृष्टि हो तो राशि

के समान वर्षो में मृत्यु करता हैं ।

४८--लग्नेश अष्टम हो उस पर सूर्य और शुक्र की दृष्टि हो तो राशि के समान वर्षों में मत्यु हो ।

४९--लग्नेश सप्तम स्थान में पाप ग्रह के युद्ध में पराजित हुआ हो तो जिस राशि