सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआयुर्दाय विचार : २४७
वर्ष मंगल शनि मं० अ० हर अच्छा बुरा शनि अ० कर
५ नवमांश ७ सम ३ मित्र सप्तांश नीच ०७ ४ बुध. १ ०
६ द्वादशांश १२मित्र शत्रू चन्द्र १ ० मित्र १ ०
७ त्रिशांश १२ मित्र ११ स्वा नवां० सम ० ० बुध १ ०
शुक्र १ ० मित्र १ ०
द्वाद० मित्र १ ० मंगल ० १
गुरु बे गा शुत चित्रा” मित्र १ ० शनि ० १
गुरु १ 40) lS
योग १० ४ ५ ९.
शेष +१ शेष -४
यहाँ रिष्ट हर मंगल का हित १०-९ अहित=्शेष + १ हित रिष्ट कर शनि का
५-९ अहितः=शेष--४अहित +१ हित -४ अहित- -३ महित = अरिष्ट अधिक होने
से अरिष्ट होगा ।
अध्याय &
मारक स्थान
मारक स्थान--लग्न से तृतीय और अष्टम स्थान ये दोनों आयुर्दाय के स्थान हैं।
इन दोनों के व्यय स्थान अर्थात् द्वितीय और सप्तम स्थान मारक स्थान हुए । इनमें
सप्तम से द्वितीय स्थान अति प्रबल हैं मारक का अर्थ यह है। कि मार डालने वाळा या
अरिष्ट उत्पन्न करने वाला स्थान । इन स्थानों के स्वामी या इससे सम्बन्ध रखने वाले
ग्रह अरिष्ट उत्पन्न करते हैं। इन ग्रहों की दशा में अरिष्ट या मृत्यु होती है। इन सब
में जो प्रबल ग्रह हो वही मारकेश होगा ।
मारकेश-२ और ७ मारक स्थान हैं । इनके स्वामी साधारण प्रकार से मारकेश
ग्रह कहलाते हैं ।
मारक ग्रह--२ और ७ स्थान में स्थित पाप ग्रह तथा द्वितीयेश और सप्तमेश
के साथ रहने वाला पाप ग्रह भी मारक गूह है । *
मारकेश विचार
१-ऱसाध!रणत: २ और सात भाव के स्वामी मारक हैं । २-प्रह जो २, ७ भाव