भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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आयुर्दाय विचार : २४१

दिव्य आयु ३८३--सब शुभ ग्रह केन्द्र त्रिकोण में हों सब पाप ग्रह ३, ६, ११ भाव में हों अष्टम भाव में शुभ ग्रह की राशि हो [ वृ० पा० ]। अमित आयु ३८४--कके लग्न व कर्कांश होवे गुरु केन्द्र में, मंगल सप्तम में हो विशेष कर शुक्र सिहासनांश में हो तो रसायन आदि से अमित आयु हो [ स' चि. ] ।

असंख्य आयु ३८५--शुऋ देवलोकांशक में, मंगल केन्द्र में, गुरु सिहासनांश में केन्द्र गत हो तो असंख्य आयु पावे [ स. चि ]। ३८६--उत्तमाँश गत बुध केन्द्र में, शुक्र पारावतांग में गुरु स्वर्ग लोकांश में हो तो असंख्य आयु पावे [ स. चि ] । आयु बढ़ावे ३८७-शुक्र का उत्तमांश होकर केन्द्र में हो । शनि पारावतांश में हो और गुरु स्वर्ग लोकांश में होकर केन्द्र में हो तो औषधियों द्वारा अपनी आयु बढ़ावे

[स. चि ]।

“अमित आयु ३८८--कर्क लग्न हो उसमें चन्द्र और गुरु हो बुध शुक्र केन्द्र में हों ३, ६, ११ भाव में सूर्यं मंगल शनि राहु पाप ग्रह हों तो अमित आयु हो [ वृ. पा ] मुनि योग ३८९-यदि गुरु चन्द्र आदि पाप ग्रह शनि तक परमोच्च में हो तो उसे ज्ञान प्राप्त होकर मुनि के बरावर हो या विद्या के कारण उसका मान हो [स. चि.] । जव सव ग्रह उच्च में होंगे तो बुध उच्च को नहीं हो सकता जव बुध उच्च में हो तो सूर्य शुक्र उच्च में नहीं हो सकते । ३९०--शनि देवलोकांश में, मंगल पारावतांश में और लग्न में सूयं सिंहासनांश में हो तो वह मुनि तुल्य होगा [ वृ' पा. ]। ३९१-- मेष लग्न हो, सूर्यं मकर में या दशम में हो, गुरु कक में चतुर्थ स्थान में हो ३, ६, ११ में पाप ग्रह हो तो बड़ा मुनि होगा [स. चिः ]। २९२--चन्द्रमा क्षीण न हो मित्र गृही या उच्च का होकर लग्न या लाभ स्थान में हो, नवमेश बलवान होकर सूयं के साथ हो तो वह बड़ी आयु वाला मुनि होगा । ३९३--कर्क से मकर तक सब ग्रह गुरु चन्द्रादि होवें इस बीच में जिनके उच्च हैं वे उच्च राशियों में होवें तो वह मुनि तुल्य होगा [ स. चि- ]। ३९४--सूर्य बुध युक्त स्थिर राशि में, चन्द्रमा बुध का, शुक मिथुन का गुरु कर्क का लग्न में, शनि तुला का हो तो मुनि तुल्य हो [ स. चि. ]।

३९५--चन्द्रमा देव लोकांश में, मंगल पारावतांश में, लग्न में धुर्य सिहासनांश में

हो [ स. चि. ]।

देव तुल्य ३९६--छग्न से लेकर क्रम से शनि सूर्य चन्द्र मंगल होवें वैशे- पिकांशो में भी होवें तो देव तुल्य हो [ जा. पारि. ]। ३९६- त्रिकोण में पाप ग्रह न हो केन्द्रं में शुभ ग्रह न हो अष्टम भाव में भी पाप ग्रह न होवे तो मनुष्य देवता के तुल्य हो [ स. चि. ] । ३९८--शुक्र देवलोकांश में हो, मंगल केन्द्र में हो, गुरु सिहा-

सनांश में हो तो देव तुल्य होगा [ स. चि. ]।

ऋषि योग ३९९--सूर्य वुध सिंह में हो, चन्द्र वृष में, शुक्र मिथुन में, शनि तुळा

में ककं लग्न में गुरु हो [ स. चि. ]।

इन्द्रपद पावे ४००--वृष लग्न में शुक हो, गुरु वेन्द्र में हो और दूसरे ग्रह

३, ६, १०, १ भाव में हों वह रसायन और मन्त्र बल से इन्द्र पदवी को प्राप्त करे

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