भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 264, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 264

२५४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१६--पुर्वोक्त ग्रहों की दशा में राहु की अन्तर्देशा आने पर मुख्य मारक होता है ।

१७--नक्षत्र आयुर्दाय साधन से जो वर्ष प्रमाण आयु निकलती है ठीक उसी

समय किसी का मरण हो जाय ऐसा नियम नहीं है उसके आगे-पीछे भी प्रवल मारकेश

की दशा अंतर्दशा प्राप्त होने पर मृत्यु हाती है ।

१८--२, ७ भाव के स्वामी की दशा अंतर्दशा में व मारक स्थान में जो पाप

ग्रह हो या मारकेश ग्रह के साथ जो पाप ग्रह हो उसकी दशा अंतदंशा में संभव रहने

पर गणितागत आयु की समाप्ति समय आने पर मरण होता है।

१९--इसके असभव होने पर अर्थात्‌ मारक स्थान में कोई भी पाप फल दायक

प्रह न होवे और मारकेश के साथ भी कोई ग्रह न हो तो उस परिस्थिति में लग्न से

व्ययेश ग्रह की दशा में मारकेश की अंतर्देशा आने पर मरण होगा।

२०--मारक स्थान २, ७ के स्वामी और मारक स्थान में रहनेवाला या मारकेश

के साथ रहनेवाला ओर त्रिषडाय आदि स्थान के स्वामी ग्रह इस प्रकार ३ मुख्य

मारक हैं । ॥ :

इनमें द्वितीमेश सबसे प्रबल है उससे न्यून सप्तमेश है, उससे न्यून द्वितीय स्थान में

रह्नेवाला ग्रह, उससे न्यून द्वितीयेश के साथ रहनेवाला ग्रह, उपसे न्यून सप्तम में

रहनेवाला ग्रह, उससे न्यून सप्तमे ग के साथ रहुनेवाला पापी ग्रह मारक होता है इनमें

जो प्रवल मारकेश हो उसमें से किसी एक की दशा में और दूसरे की अंतर्दशा आने

पर संभव रहने पर मरण होगा ।

२१--इन मारक सम्वन्धी ग्रहों के असंभव होने पर द्वादशेश की दशा में मारकेश

का अंतर आने पर मरण होगा ।

२२--उपरोक्त मारकेशों की दशा न आने पर व्ययेश के सम्वन्ध रखने वाले

शुभ ग्रहों की दशा में भी ओर कभी अष्टमेश की दशा में भी मरण होता है ।

२३-यदि मारकेश सम्बन्धी शुभ और अष्टमेश की दशा न हो तो केवल मारकेश

के सम्वन्ध बिना ही पाप फल देने वाले ग्रहों की दशा में मरण होता है ।

मारकेशों में व्ययेश निर्बल है उसके सम्बन्ध से भी शुभ ग्रहों में मारकत्व आ

जाता है तब मुख्य मारकेशों से सम्बन्ध रखने वाले ग्रहों में भी क्यों नहीं मारकत्व

आयगा ।

२४-३, ६ आदि अशुभ स्थान के स्वामी होने से यदि पाप कारक शनि का

मारक ग्रहों से सम्बन्ध हो तो अन्य सब मारक को हटांकर अकेला शनि ही कारक

होता है । शनि तो बिना मारक के सम्बन्ध के ही साधारण प्रकार से मारक होता

है तब मारकेश से सम्बन्ध होने से प्रबल मारक होगा ही। त्रिषडाय आदि का

स्वामी होने से पाप कारक होकर शनि मारक हो जाता है।

२५--यदि क्रूर ग्रह को महादशा में कर ग्रह का ही अन्तर हो चाहे शत्र, ग्रहों

से या मित्र ग्रहों से योग हो तो जातक की मृत्यु हो जाती है । डि |