सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंआयुर्दाय विचार : २४५
अरिष्ट भंग योग
६१--सवं ग्रह उपचय स्थान में हों [ मान. 11 ६२--छग्न से या चन्द्र हे २ ग्रह, ३ ग्रह या वहुत ग्रह एक राशि छोड़ कर एक ठिकाने हों [ मान. 11 ६३--ग्रुरु सवक्षेत्री का चतुर्थ में हो उस पर पूर्ण चन्द्र की दृष्टि हो [ मान. ] । ६४--छग्न, धन या द्वादश स्थान में ३-३ ग्रह हों [मान.] । ६५-शुक्लपक्ष में जन्म हो लान पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो या कृष्ण पक्ष में जन्म हो लग्न पर पाप ग्रह की दृष्टि हो टो सव अरिष्ट नाश हो जाते हैं [ वृ. पा. ]। ६--पाप गृह शुभ गृहो के वीच हों या केन्द्र त्रिकोण में शुभ गह हों तो सब अरिष्ट नाश हो [वृ.पा. ] । ६७--मंगल यदि गुरु से युक्त या दृष्ट हो [ वृ. पा. ]। ६८--लग्नेश ठग्न में हो सब गुहो की उस पर दृष्टि हो [ जा. भ. ]। ६९--दशा के आरम्भ समय में कोई गृह अधिमित्र के घर में हो और शुभ गूह या मित्र ग्रह की दृष्टि हो तो अरिष्ट दूर हो [थीधर] 1 ७०--जन्म समय आकाश निमंल हो ग्रह स्वस्थ हो मेघ नील वर्ण वाले साफ हों मंद-मंद पवन चलता हो शुभ मुहृतं हो ऐसे समय जन्म हो तो सव अरिष्ट भंग हो [जा.भ.]। ७१-जन्म समय तारा उदय हो तथा मरचि आदि सप्त ऋषियों का उदय हो [ स. चि. ] । ७२- जन्म सायं या प्रातः संध्या में हो या वैधृति व्यतीपात योग में या भद्रा में या गंडांत काल में जन्म हो और सब ग्रह दृश्य भाग लग्न से लेकर सातवें भाव तक हों तो सब अरिष्ट भंग हो [जा.भ.] | ७३--चन्दर, चन्द्र स्थान का स्वामी, और. लग्नेश ये तीनों अच्छे स्थान में हों शुभ ग्रह से युवत या दुष्ट हों और अधिक गुण [उच्चादि] में हों वह समय जातक को अति शुभ और लाभदायक है [फल.] । ७४--गुरु पूर्ण बली हो पूर्ण किरण से प्रकाशित हो यदि वह लग्न में हो तो कई अरिष्ट जो दूसरे प्रकार से दूर करना कठिन है वह सव दूर कर सकता है [फल.] । ७५--पूर्ण चन्द्र यदि केन्द्र त्रिकोण या ग्यारहवें भाव में हो साथ ही सूय चन्द्र या गुरु की राशि या नवांश में हो तो सव दोषों को पूर्ण रूप से दूर कर सकता है [फल.] । ७६--चन्द्रमा लग्न से ६,८, १२ भाव में भी हो परन्तु शुभ दुष्ट हो [ ज्यो. र. ] ७७--केन्द्र या आपो- क्लिम या पणफर में सव ग्रह हों और शुभ ग्रह के नवांश में हों [ जा. भ. | 1 ७८-- ३,६,११ भाव में मंगल शनि राहु एकत्र या दो या एक ही हों [ ज्यो. र. 11
रिष्टकर और रिष्टभंगकर विचार
अरिष्ट करने वाले ग्रह को रिष्टकर और अरिष्ट भंग करने वाले ग्रह को रिष्ट- भंगकर ग्रह कहते हैं ।
अल्पायु योग आदि जो पहिले वता चुके हैं वे सव अरिष्ट कारक योग हैं अंत में अरिष्ट भंग योग ऊपर बताया गया है ।
` पहिले देख लेना चाहिये कि अरिष्ट तो नहीं है, इसमें गणितागत आयु लागू होगी या नहीं । कई ग्रह अरिष्ट कारक हों तो उनमें जो वली हो वही रिष्टकर ग्रह होगा । इसी प्रकार रिष्ट भंग करनेवाले योगों में जो ग्रह बली हो वह लेना फिर रिष्टकर और रिष्ट-