भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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आयुर्दाय विचार : २४३

राशि में और शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो अरिष्ट का नाश हो [स. चि.] । ६-गुरु तेज भ्रकाशवान हो और केन्द्र में हो तो सव आपत्तियों से रक्षा करेगा [स. चि. ]॥ ७--गुरु छुध शुक्र चन्द्र यदि शुभ नवांश में हों तो अरिष्ट दूर हो [ स. चि. ] 1 ये सौम्य गृह या सौम्य नवांश या सौम्य द्रेष्काण में हों [ मान. ] । ८--जन्म लग्नेश शुभ ग्रह केन्द्र में शुभ दृष्ट हो [ स. चि. ]। ९--राहु लग्न से ३, ६, ११ घर में पाप रहित हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो । १०--पूर्ण चन्द्र शुभ ग्रह युक्त व दृष्ट हो पाप युक्त न हो [ स. चि. ]। ११--पूर्ण चन्द्र पर सव पाप या शुभ ग्रहों की दृष्टि हो । १२-- रून में शुभ राशि हो जिसमें शुभ ग्रह हो या शुभ ग्रह की दृष्टि हो और शुभ ग्रह वलवान्‌ हो पाप ग्रह निर्बल हों [ स. चि. ]। १ ३--राहु मेष वृष का कर्क लग्न में हो [ जा. पारि. ]। १४ चन्द्रमा वल्हीन हो परन्तु शुभ वर्ग में हो और उस पर शुभ दृष्टि हो । १५--पूर्ण चन्द्र शुभ ग्रहों से दृष्ट होकर उच्च का या स्वगृही हो या मित्र के वर्ग में या स्ववर्गमें हो शत्रु दृष्टि से रहित और पाप योग दृष्टि रहित हो तो कठिन अरिष्ट भी दूर हो [स.चिं.] । १६- चन्द्र राश लग्न में शुभ दृष्ट होवे तथा चन्द्र पर शुक्र की दृष्टि हो चन्द्र उच्च में हो [स. चिं.] । १७--चन्द्रमा पाप राशि में हो उस राशि के स्वामी की दृष्टि हो शुभ ग्रह के अंशादि में हो [ स. चिं. ] । १८--चन्द्र से ६, ७, ८ स्थानों में शुभ ग्रह हो ।

अरिष्ट भंग

१९--अष्टमेश चन्द्रमा शुभ ग्रहों के द्रेष्काण में हो तो सदा रक्षा करता है क्लेश होकर भी बच जाता है [स. चिं.] । २०- लग्नेश अति बली हो शुभ ग्रहों से युक्त या दृष्ट होकर केन्द्र में हो पाप दृष्टि रहित हो तो भाग्यवान्‌ दीर्घायु हो, अरिष्ट दूर हों [स. चि.] । २१-ळमग्नेश शुभ या पाप ग्रह हो परन्तु उसे अपने अंशक सहित शुभ ग्रह देखते हों [स. चिं.]। २२--लगनेश बलवान्‌ होकर केन्द्र या त्रिकोण में हो, केन्द्र गत शुभ ग्रहों से दृष्ट हो पाप ग्रहों से दृष्ट न हो तो अरिष्ट दूर होकर दीर्घायु हो लक्ष्मी युक्त रहे [जा.पारि.] । २३-पापग्रह बलहीन हों शुभ ग्रह पूर्ण बली हों, लग्न में शुभ ग्रहों की राशि हो ओर लग्न को शुभ ग्रह देखते हों [जा.भ.] । २४--पाप ग्रह शुभ राशि में हों, शुभ ग्रह भी शुभ राशि में बैठकर उन पाप ग्रहों को देखते हों [ जा. भ. ]। २५--सम्मूणं ग्रह ३, ५, ७, ८, ११ राशियों में हों [ जा. भ. ] । २६--३,६,११ भाव में केतु मकर कुम्भ मोन राशि का हो [जा. भ.] । २७--३,६, ११ भाव में उच्च राशि का सूर्य हो पाप ग्रह से ग्रसित न हो [जा,भ.] । २५--३,६, ११ भाव में से किसी एक राशि में सब ग्रह हों [ जा. भ. ]। २९-- चतुर्थ में गुरु धन या मीन राशि में हो उस पर बलवान्‌ चंद्र की दृष्टि हो [जा. भ.] । ३०---वक्री शुभ ग्रह लग्न या केन्द्र में हो शुभ ग्रहों से दृष्ट हो [ छ. चं. ]। ३१--समस्त ग्रह शीर्षोदय ५, ६, ७, ८, ११, ३ राशियों में शुभ ग्रह के अंशक में हों [ श. चि. ] ३२--यपाप ग्रहों पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और शुभ वर्ग में हों [ स. चि. ]।