सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 260, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२५० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
दशा में अपनी अंतर्दशा में शुभ फल को बढ़ावेगा । पाप ग्रह की दशा में पाप फल को घटायेगा । -
२, ७ भाव कास्वामी होने से शुक्र, ३, ६ का स्वामी होने से बुध और ११ स्थान का स्वामी होने से शनि ये तीनों पाप फल दायक होंगे ५,९ भाव के स्वामी होने से सूयं और गुरु शुभदायक होंगे । गुरु द्वादशेश होने पर त्रिकोण नवम भाव का: स्वामी होने से भी शुभ है। पर द्वादशेश होने से शनि आदि पापी के संयोग होने से साहचर्यं वश पाप फल ही देगा।
शनि केन्द्रेश होने से शुभत्व नाश होने पर भी लाभेश होने के कारण पाप हुआ । चन्द्र केनद्रेश होने से सम हुआ, यहाँ शक्र २,७ का स्वामी होने से प्रबल मारक हुआ । मारकेश से सम्वन्ध होने पर बुध और शनि भी मारक हो सकेंगे । [२] वृष लग्न--८, ११ भाव का स्वामी होने से गुरु; षष्ठेशे होने से शुक्र, तृती- येश होने से चन्द्र यहाँ पाप फलदायक हुए । त्रिकोण होने से शनि, त्रिकोणेश बुध शुभ हैं । मंगल सप्तमेश और व्ययेश होने से, गुरु अष्टमेश और लाभेश होने से, शुक्र षष्ठेश “होने से पाप फल प्रद होंगे । सूर्ये पाप ग्रह केन्द्रेश होने से शुभ है। इस प्रकार गुरु शुक्र चन्द्र पाप प्रद, शनि, सूर्यं शुभ, बुध अल्प शुभ प्रद है। क्योंकि वह दूसरे स्थान का भी स्वामी है । शनि राजयोग कारक है । यहाँ गुरु शुक्र मंगल ये मारक होते हैं । मिथुन छम्न--मंगछ [ ६,११ का स्वामी ] गुरु [ ७,१० का स्वामी ], सूर्य [ तृतीयेश ] ये पाप फल प्रद हैं । शुक्र [ पंचमेश व्ययेश ] शुभप्रद है । शनि [अष्टमेश नवमेश ] योग कारक होकर भी गुरुके योग से पूर्ण योग फल नहीं होता । चन्द्रमा [ द्वितीयेश ] मुख्य मारक होकर भी नहीं मारता । मंगल गुरु सूर्यं मारक हो सकते हूँ । ४ [४] कर्केलग्न--शुक्र [लाभेश, चतुर्थेश], बुध [तृतीयेश, व्ययेश] पाप फल प्रद हैं । चन्द्र [लग्नेश], मंगल [पंचमेश, दशमेश], गुरु [पष्ठेश, नवमेश] शुभ हैं। मंगल विशेष योग कारक है । शनि [ सप्तमेश, अष्टमेश ] मारक हैं । सूयं [ द्वितीयेश ] साहचर्य से फल देता है । [५] सिंह छग्न- बुध [ द्वितीयेश, लाभेश ], शुक्र [ तृतीयेश, दशमेश ], शनि [षष्ठेश, सप्तमेश], ये पाप फल प्रद हैं । मंगल [ चतुर्थेश, नवमेश ], गुरु, [अष्टमेश, पंचमेश], सूयं लग्नेश शुभ प्रद हैं । किन्तु गुरु और शुक्र के सम्वन्ध मात्र से ही शुभ फल नहीं होता| शनि [ षष्ठेश सप्तमेश | मारक है । चन्द्र [ व्ययेश ] साहचर्य से फल प्रद होगा ।
[= ] कन्या छग्न--मंगल [ तृतीयेश, अष्टमेश ], गुरु [चतुर्थेश, सप्तमेश], चन्द्र [ छाभेश ] पाप फल प्रद है । शुक्र [ द्वितीयेश, नवमेश |, बुध [ लग्नेश, दशमेश |, ये शुभ हैं और योग कारक हैं । शुक्र मारकेश होने पर भी नवमेश होने के कारण नहीं मारता । सूर्य (व्ययेश) साहचथं से फलप्रद है यहाँ मंगल और गुरु मारक होंगे ।