सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 272, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२६२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
बलाबल विचार कर अल्प, मध्य, पूर्ण आयु के अनुसार इन योगों का विचार करना ।
यदि आयु शेष है तो मृत्यु तुल्य कष्ट होगा । आयु पूर्ण होने पर मृत्यु की संभावना है। इसलिए पहिले आयु का कई प्रकार से विचार कर लेना आवश्यक है। इसमें
अरिष्ट भंग योग पर भी विचार कर लेना चाहिए ।
मृत्यु सुख पूर्वक होगी या कष्ट पूर्वक विचार क
सुख पूर्वक--(१) जन्म समय जिस नवांश में गुलिक हो उसकी सातवीं राशि में यदि बलवान् शुभ ग्रह हो तो निश्चय सुख पूर्वक मृत्यु होगी । (२) यदि जन्म समय १२ वाँ घर या उसका स्वामी घर में या उस नवांश में हो जो शुभ ग्रह का स्थान हो या शुभ ग्रह युक्त हो तो सुख पूवंक मृत्यु हो मृत्यु समय कोई कष्ट न होगा । (३) अष्टम में उच्च का सूर्य हो । (४) अष्टम भाव में शुभ ग्रह का विशेष सम्बन्ध होने से । कष्ठ पुवॅक--(१) अष्टम भाव में पाप ग्रहों का सम्बन्ध हो तो मृत्यु कष्ट iS हो | (२) अष्टम में उच्च के सूर्य के अतिरिक्त अन्य राशि का सूर्य हो तो दुःख पूवक
और कष्ट प्रद होता है । (३) जन्म समय १२ वाँ घर या उसका स्वामी उस घर में या नवांश में हो जो पाप ग्रह का स्थान हो या पाप ग्रह युक्त हो तो कष्ट पूर्वक
मरण होगा।
अष्टम में बुध हो तो कष्ट युक्त दूर मरण होता है वृथा शत्रुओं वाला और बड़ी
गर्देन वाला होता है ( जा० सं० ) ।
मरण समय मोह का समय-- (१) लग्न के जितने नवांश उदित होने को शेष
रहे हों उतने ही काळू तक मरण समय मोह होवे, अर्थात् वेहोशी रहेगी । (२) शुभ . ग्रह लर्न में हो तो भोह का समय दुगुना होगा । (३) शुभ ग्रह स्वक्षेत्री, उच्च राशि
या अपने नवांश में होकर लग्न में हो तो मोह काळ तिगुना होगा ।
अन्य मत--छूग्न के शेष ( भोग्य ) नवांश पर से अनुपात से जितनी घड़ी समय
मिले सो यदि नवांश पति की दृष्टि उस पर हो तो उतना काल मोह होगा । यदि
उस लग्न नवांश पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो यणितागत काळ से दूना और शुभ
ग्रहों की दृष्टि में तिगुना काळ मोह गूस्त रहेगा ( जा० पारि० ) ।
मरण समय होश--अष्ट्म का कोई सम्बन्ध बुध से हो तो मरण समय होश रहे ।
मृत्यु तक काम काज चलता रहे--अष्टम का कोई सम्वन्ध शुक्र से हो तो उसके काम-काज समय के अन्त तक अच्छे प्रकार चलता रहे । सरल शांति पूर्वक मृत्यु--अष्टम का कोई सम्वन्ध गुरु से हो तो सरल और शांति पूर्वक मृत्यु हो ।
ज्ञान पूर्वक मरण---लग्न व कारक ग्रह से तृतीय स्थान गुरु शुक्र इन दोनों से युक्त या दृषट हो ।
अज्ञान पुवंक मरण- तृतीय भाव गुरु शुक्र को छोड़कर अन्य किसी ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो अज्ञान पुर्वेक मरण हो ।