भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 454 में से

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पृष्ठ 303

नीरोगता ४ २९३

( ४) बुध का दंड हो और लग्न बुध से'वेध करे तो अरिष्ट अव । हो यहाँ जो वर्षे मास या दिन सूचक अंक है इसके समीप ही अर्थात्‌ कुछ आगे या” कु बाद ग्रह

परिस्थिति के अनुसार मृत्यु हो सकती है ।

अध्याय १०

नीरोगता

१--लग्नेश या षष्ठेश गुरु युक्त होवे तो निरोग हो ( स० चि० ) । २--अष्टम

में शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो स्वास्थ्य ठीक रहे ( स० चि० ) । ३--लग्न में सब शुभ

ग्रह हों तो निरोग हो ( ल० चं० ) । ४--सूर्यं पर गुरु या चन्द्र की शुभ दृष्टि हो

( वाल वो० )। ५--षष्ठ स्थान में गुरु का कोई सम्बन्ध हो तो रोग से शीघ्र छुट￾कारा हो । ६--३,६,११ भाव में शनि, मङ्गल, राहु एक साथ या पृथक्‌ र हो तो

छुटकारा हो । ७ --लग्नेश केन्द्र त्रिकोण में हो तो देह सुख कारक हो ( वु० पा० ) ।

८--दुर्बल लग्नेश केन्द्र त्रिकोण में हो तो व्याधि रहित हो ( जा० पारि० ) । परन्तु

कुछ रोग भी रहे । परन्तु लग्नेश दुर्बळ होने से क्रोधी हो ( जा० पारि० ) । ९--

षष्ठेश या षष्ठस्थ ( षष्ठ स्थान में ) षष्ठदर्शी ( षष्ठ को देखने वाले ) कोई-कोई ग्रह

शुभ ग्रहों और केन्द्र कोण या लाभ में कहीं भी वल्युक्त हों तो छोटे-छोटे रोगों का

नाश करता है ( जा० पारि० ) । १०--पष्ठेश से युक्त शुक्र, गुरु युक्त हो तो विख्यात

और स्वस्थ देह वाला हो परन्तु शत्रु का भय वना रहे ( जा० सं० ) । ११--सूर्य

चतुर्थ स्थान में पाप दृष्ट हो तो शरीर गरम रहे तथा श्रेष्ठ लोग पित्त धातु पृथक्‌

रहने से निरोग और सुखी भी हों । १२-छग्नेश व अष्टमेश इनका शुभ योग हो तो

आरोग्यता हो ( प्रा० यो० ) ।

रोगी

१---द्वितीय स्थान में पाप ग्रह हो तो रोगी हो ( जा० सं० ) १ २--रूग्नेश

दुष्ट स्थान ( त्रिक या मारक ) के स्वामी से युक्त हो या दुष्ट स्थानेश लग्न में हो

तो शीघ्र रोगी हो । २-" लग्नेश बलहीन हो तो उपरोक्त फल ( स० थि० ) ४--

अष्टमेश ६,८,१२ भाव में हो । ५ - सूर्य चन्द्र तीसरे भाव में गा क्रूर ग्रहों से दुष्ट

हो तो वह रोग युक्त रहे ( स० चि० )। ६-- लग्न में पाप ग्रह हो लग्नेश निर्बेल

हो तो नाना प्रकार से रोगी होकर चिता युक्त रहें ( प्राण यो० ) ( जा० पारि० )।

७--छटे स्थान में सौम्य ग्रह हों तो बड़ा रोगी हो ( मान० ) । ८--शनि ५,९ भाव

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