भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304

२९४ ४ सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

में पाप दृष्ट हो तो अनेक रोग से पीड़ित रहे ( शंभु० ) । ९--कूर ग्रह से युक्त या दृष्ट शनि ५,९,१२, भाव में हो तो रोगी हो ( जा० ल॑० )। १०--४ ग्रह नीच शत्रगृहो या कूरांश में हों तो रोगो रहे ( स० चि० ) । ११--निर्वक्त लग्नेश केन्द्र या त्रिकोण में हो तो शरीर कुछ रोगी रहे ( जा० पारि० ) । १२--लग्न से छटे स्थान में क्र ग्रह युक्त चन्द्र हो तो रोगी हो। १३--क्ूर ग्रहों के योग या दृष्टि सै पीडित

चन्द्र लग्न में हो तो रोगी हो। १४--कूर ग्रह केळ में हो और शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तो रोगी हो । १५-केन्द्र में स्थित ऋर ग्रह शुक्र गृही हो परन्तु गुरु, शुक्र, बाद इन ग्रहों की दृष्टि न हो तो रोगी हो ( जा० छं० )। १६--अष्टम भाव में पाप ग्रह हो तो बहुत रोग हो ( जा० पारि० )। १७--लग्नेश व अष्टमेश का पाप योग

हो तो बहुत दुःख हो ( प्रा० यो० ) । १८--छठे भाव में मंगल से युक्त शनि हो जिस पर सूर्य और राहु की दृष्टि हो लग्नेश निबंल हो तो दीघं रोगी हो ( स० चि० )। १९--छम्न में शनि राहु हो बुध से भी दृष्ट हो तो निश्चय रोगी रहे ( शंभु ) । २०--क्षीण चन्द्र बारहवें हो पाप ग्रह से दृष्ट हो तो दुःख हो । आठवे में शनि भी बड़ा क्लेश देता है ( ७० चं० )। २१--सूर्य चन्द्रमा अन्योन्य राशि नवांशकों में हों तो शरीर क्लेश रहे | २२--छठे घर में शुक्र का कोई सम्बन्ध हो तो आहार विहार की असावधानी से रोग उत्पन्न हो । २३- -लग्नेश पाप युक्त ६,८,१२ में हो तो क्लेश कारक है ( वु० पा० )। २४--लग्नेश अस्त, शत्रु गृही या नीच हो तो रोग कारक है ( वृ० पा० )। २४५--धनभाव में मंगल और शनि हो तो सब रोगों को उत्पन्न करे ( जा० पारि० ) । २६--३ या ६ स्थान में शुक्र हो तो रोग शोक और भयदायक है ( जा० पारि० ) । यदि वही शुक्र सूर्य के आगे हो तो शुभ है ( जा० पारि० )। २७--लग्नेश षष्ठेश के साथ दुष्ट स्थान में हो या लग्न में हो । २८--षष्ठ भाव और षष्ठेश दोनों पाप युक्त होवे और शनि राहु से युक्त हो तो आजन्म रोगी रहे ( वु० पा० ) । २९--रवि व शनि षष्ठ भाव में एकत्र हों या एक ६ में दूसरा १२ घर में हो या दोनों का केन्द्र योग हो तो शरीर प्रकृति का बहुत हानिकारक है। ३०--सूर्य १,६ या ५ स्थान में हो तो हानिकारक है। ३१--सूर्य में शनि से पीड़ित होकर ५,९,६,७,८, ४ इन स्थानों में हो तो दीर्घकाल तक रोग रहे ( बा० बो० )। ३२--छग्नेश और अष्टमेश बलवान्‌ होकर केन्द्र त्रिकोण में होत उक्त ग्रह की दशा में रोग ओर अपवाद हो ( जा० पारि० ) 1 ३३ -- अष्टमेश अष्टमं हो तो उसकी दशा अन्तर्देशा में रोग हो ( जा० परि० ) । ३४--अष्टम भाव में पाप ग्रह हो तो रोग हो वह मृत्यु को प्राप्त हो यदि बन्धन प्राप्त हुआ हो तो वन्धन से छट जाय ( जा० सं०) । ३५--चतुर्थेश सूर्य मङ्गल युक्त होकर क्रूर अंश में हो शुभ दृष्टि नहो भोर यदि आरोह को छोड़कर और कोई हो अर्थात्‌ अवरोह हो तो सदा रोगी रहें ( स० चि०)। ३६--चतुथे में पाप युक्त मंगल या सूर्य नीच या शत्रु अंश में हो तो बहुत रोगी रहते हुए यात्रा करता रहे ( स० चि० ) ३७--लग्नेश मंगल और बुध ये ४ या १२ भाव में हो तो कई प्रकार,के रोग हों ( स० चि०)। ३८-६, ८

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २ · पृष्ठ 304, कुल 454 में से · BharatKosha