भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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नीरोगता ! २९%

भाव या केन्द्र में वक्री शनि हो उस पर मंगल की दृष्टि हो तो ३ वर्ष में रोग हो ( जा० भ० ) । ३९ छठे भाव में गुरु हो तो दीघंव्याधि हो ( जा० स० )। ४०-- लग्नेश मंगल या वुध हो किसी स्थान में हो उसपर शत्रु ग्रह की दृष्टि हो तो रोग हो ( प्र० यो० ) । ४१--नवम भाव पाप युक्त हो तो रोग से पीडित ब्रण सहित वाम पाद हो । यदि शुभ ग्रह भी हो तो कूर फल नहीं होता ( शंभु० )। ४२--६,८ या १२ स्थान में जो ग्रह या छठे भाव का स्वामी और वह ग्रह जो इनसे यक्त हो इनसे पृथक्‌-पृथक्‌ विचारना जहाँ २,३ या अधिक रोग होने के योग हों तब विशेष रोग कहना (फल०) । रोग उत्पन्न होने का योग--४३--लग्न या चन्द्र से २,४,८,१२ घरं में शनि राहु सूर्य मंगल ये पाप ग्रह क्रमानुसार हों । ४४- लग्न या चन्द्र के सप्तम में, अष्टम में या व्यय स्थान में सब पाप ग्रह हों। या ४५--लग्न या चन्द्र पाप ग्रह युक्त हो और शेष पाप ग्रह उक्त स्थानों में हों । ४६--३ या ११ स्थान में कोई पाप ग्रह हो शेष ८ या १२ स्थान में हों । ४७- चन्द्र के पास कुछ पाप ग्रह हों शेष पाप ग्रह लग्न में हों । ४८--चन्द्र के ८,१२ स्थान और लग्न के ८,१२ स्थान में सब पाप, ग्रह हों । ४९--लान, व्यय, धन इन तीनों स्थानों में या ६ ,७,८ इन स्थानों में सब पाप ग्रह हों यह लग्न और चन्द्र दोनों प्रकार से विचार कर देखना । ५०--लग्न या चन्द्र के १० स्थान से लग्न तक या चन्द्र तक सब पाप ग्रह हों । ५१--लग्न या चन्द्र के चतुर्थ स्थान में एक या कई पाप ग्रह हों । ५२--सप्तम में मंगल और शनि हो तो अपने २ धातु जन्य रोग उत्पन्न करते हैं ।

किस ग्रह के दोष से रोग होगा--१--लग्न, लग्नेश और लग्न का नवांश इन

तीनों में जो वली हो उस ग्रह की पीड़ा होगी ( प्रा० यो० ) ।

२--रोग कारक ग्रहों में जो बली हो उसकी धातु वात पित्त कफ आदि से

रोग हो ।

३--कौन ग्रह क्या रोग प्रगट करते हैं यह संज्ञा अध्याय में दिया है उससे भी

विचारना ।

रोग कहां होगा--१--अष्टम में जो राशि कालांग में कही है उस अङ्ग में वात

पित्त आदि ग्रहजनित विकार से रोग होगा ।

२--बहुत ग्रह वलवान्‌ होकर अष्टम को देखते हों तो सभी ग्रहों को धातु से

बहुत रोग एक साथ हो ( बु० जा० ) ।

` ३--छठे भावस्थ राशि के कालांग में रोग होगा ।

राशि-मेष | २ |३ | ४ | ४५ | द |

अङ्ग-शिर | मुख | कंठ | कान | नाक, ) गुप्तांग | हाथ

राशि | ९[१०| ११| १२ | (सं० चि० ) अङ्ग ।नेत्र | पैर | घुटने | पर कुक्षि

कौन ग्रह कहाँ पर क्या रोग करता है

१--सूये--शरीर के हृदय का भाग, मस्तक या मुख के पास दुःख, रक्त का

७ ८

| वाल (बाजू |