भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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२९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

बहाव, नेत्र पीडा, दृष्टि दोष, जीवन शक्ति की स्थिति, हृदय रोग, उष्ण वात, ज्वर,

पित्त, मूर्छा चक्कर पीठ या पैरों में दर्द या व्यंग ।

२--चन्द्र--सर्व साधारण शरीर का व्यापार अच्छी प्रकार न चलने वाला और

उससे उत्पन्न विकार दर्शाता है ।

पेट में विकार, जलोदर, सर्दी या ज्वर, हृदय का विकार, स्त्रियों के रोग, प्रदर,

आतंव दोष, अपस्मार सहनशक्ति ।

३--मंगल--दाह जन्य विकार, क्षत, व्रण, शस्त्र प्रयोग, इनसे उत्पन्न होने वाला

विकार या दुःख ।

रक्त की क्षीणता, माता का रोग, खाज, सुजन, ज्वर, प्लेग, नेत्र के रोग, गुह्य

रोग, घाव; चौर फाड़ आदि ।

४--बुध--सव प्रकार का मानसिक विकार, मज्जा तन्तु का विकार, मस्तिष्क सम्बन्धी विकार, ग्रीवा या गले का रोग, गंड माला, मज्जा तन्तु की गड़बड़ी, वाणी का दोष, सिर का धूमना, मानसिक व्यथा आदि ।

५--गुर--मोटे होने, बाढ़, रक्त संचार इनमें विकार उत्पन्न करता है यक्ृत्‌ का रोग, शरीर में रक्त संचय, दंत रोग, प्रति बंधक रोगं, फोड़े आदि । ६--शुक्र--नाक, मूत्रेन्द्रिय में, विष से उतपन्न रोग, गर्मी, वाघी, वीर्य दोष, प्रमेह, मधुप्रमेह आदि रोग ।

७-शनि--इन्द्रियों के व्यापार में जरा भी गड़बड़ी हुई तो रोग उत्पन्न करता है, अर्धाग वायु.खाँसी, क्षय रोग, शीत, दमा, संधिवात, वात रोग, बद्ध कोष्ठ, अपच, दाढ़ की पीड़ा आदि दीघ कालीन रोग ।

शरीर की नीरोगता--जानने को लग्न में बहुत अंश से उदय होने वाली राशि और कुंडली में चन्द्र व सूर्ये की स्थिति पर अवलंबित है। जोवन शक्ति प्रद राशियाँ-जीवन शक्ति देने वाली राशियाँ । उत्तम जीवन शक्ति प्रद-१, ५, ७, ९ ये लग्न, इन लग्नो में जन्म हों तो । साधारण शक्ति प्रद-२, ३, ६, ८, ११

अल्प शक्ति प्रद-४, १०, १२

आनुवंशिक रोग न हों शरीर अच्छा हो-कुंडळी में सूर्य बलवान्‌ हो, पाप ग्रह से पीड़ित न हो ।

. आनुवंशिक रोग--यदि सूर्य निर्वळ या पाप ग्रहों से पीडित हो तो शरीर में आनुवंशिक रोग रहता है। राशि अनुसार सूर्यं पीड़ित हो तो प्रभाव १चर राशि भें रवि पीडित हो तो--अशुभ योग घटाता है--मस्तक विकार मूत्रपिंड का विकार, त्वचा के रोग हों । (२) स्थिर राशि में रवि पीडित हो तो- हृदय विकार, रक्ताभिसरण सम्बन्धी, रोग, कंठ विकार ।