सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
२९६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
बहाव, नेत्र पीडा, दृष्टि दोष, जीवन शक्ति की स्थिति, हृदय रोग, उष्ण वात, ज्वर,
पित्त, मूर्छा चक्कर पीठ या पैरों में दर्द या व्यंग ।
२--चन्द्र--सर्व साधारण शरीर का व्यापार अच्छी प्रकार न चलने वाला और
उससे उत्पन्न विकार दर्शाता है ।
पेट में विकार, जलोदर, सर्दी या ज्वर, हृदय का विकार, स्त्रियों के रोग, प्रदर,
आतंव दोष, अपस्मार सहनशक्ति ।
३--मंगल--दाह जन्य विकार, क्षत, व्रण, शस्त्र प्रयोग, इनसे उत्पन्न होने वाला
विकार या दुःख ।
रक्त की क्षीणता, माता का रोग, खाज, सुजन, ज्वर, प्लेग, नेत्र के रोग, गुह्य
रोग, घाव; चौर फाड़ आदि ।
४--बुध--सव प्रकार का मानसिक विकार, मज्जा तन्तु का विकार, मस्तिष्क सम्बन्धी विकार, ग्रीवा या गले का रोग, गंड माला, मज्जा तन्तु की गड़बड़ी, वाणी का दोष, सिर का धूमना, मानसिक व्यथा आदि ।
५--गुर--मोटे होने, बाढ़, रक्त संचार इनमें विकार उत्पन्न करता है यक्ृत् का रोग, शरीर में रक्त संचय, दंत रोग, प्रति बंधक रोगं, फोड़े आदि । ६--शुक्र--नाक, मूत्रेन्द्रिय में, विष से उतपन्न रोग, गर्मी, वाघी, वीर्य दोष, प्रमेह, मधुप्रमेह आदि रोग ।
७-शनि--इन्द्रियों के व्यापार में जरा भी गड़बड़ी हुई तो रोग उत्पन्न करता है, अर्धाग वायु.खाँसी, क्षय रोग, शीत, दमा, संधिवात, वात रोग, बद्ध कोष्ठ, अपच, दाढ़ की पीड़ा आदि दीघ कालीन रोग ।
शरीर की नीरोगता--जानने को लग्न में बहुत अंश से उदय होने वाली राशि और कुंडली में चन्द्र व सूर्ये की स्थिति पर अवलंबित है। जोवन शक्ति प्रद राशियाँ-जीवन शक्ति देने वाली राशियाँ । उत्तम जीवन शक्ति प्रद-१, ५, ७, ९ ये लग्न, इन लग्नो में जन्म हों तो । साधारण शक्ति प्रद-२, ३, ६, ८, ११
अल्प शक्ति प्रद-४, १०, १२
आनुवंशिक रोग न हों शरीर अच्छा हो-कुंडळी में सूर्य बलवान् हो, पाप ग्रह से पीड़ित न हो ।
. आनुवंशिक रोग--यदि सूर्य निर्वळ या पाप ग्रहों से पीडित हो तो शरीर में आनुवंशिक रोग रहता है। राशि अनुसार सूर्यं पीड़ित हो तो प्रभाव १चर राशि भें रवि पीडित हो तो--अशुभ योग घटाता है--मस्तक विकार मूत्रपिंड का विकार, त्वचा के रोग हों । (२) स्थिर राशि में रवि पीडित हो तो- हृदय विकार, रक्ताभिसरण सम्बन्धी, रोग, कंठ विकार ।
- नीरोगता : २९७
( ३ ) द्विस्वमाव राशि में रवि पीडित और अशुभ दृष्टि योग पड़े तो--
फुफ्फुस सम्बन्धी रोग मज्जा तंतु का विकार हो ।
ग्रह प्रभाव से विविध रोग
ज्वर गंड रोग--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--सूर्य के साथ ।
गठिया या शस्त्राघात--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--मंगल के साथ ।
पित्त रोग--छरन में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--वुध के साथ ।
रोग नाश--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--गुरु के साथ ।
स्त्री द्वारा रोग--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--शनि के साथ ।
वायु कोप--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--शनि के साथ ।
हिंसक जीव से अपघात--लग्न में पष्ठेश और अष्टमेश दोनों--राह के साथ ।
नाभि में त्रण--लग्न में षष्ठेश और अष्टमेश दोनों--केतु के साथ ।
जलज गंड या वक़--हूग्न में षष्ठेश .और अष्टमेश दोनो--चंद्र के साथ ।
पितृ स्थान ( दशम ) आदि से भी ग्रहों की स्थिति से पिता आदि के भी इसी
प्रकार रोग विचारना ( वृ० पा० ) ।
लग्नेश भिन्न ग्रह युक्त चिह्न में होने से रोग:--
(१ ) लग्नेश सूर्य युक्त चिह्न में--ताप गंड रोग ।
(२ ) लग्नेश चंद्र युक्त चिह्न में--जल विकार से उत्पन्न गंड रोग ।
( ३ ) लग्नेश मंगल युक्त चिह्न में--हथियार का घाव जिसके पुराने पड़ने से
गांठ पड़ जाती है। -
( ४ ) लग्नेश बुघ युक्त चिह्न में“-पित्त से उत्पन्न रोग ।
(५ ) लग्नेश गुरु युक्त चिह्न में--आम के विकार से उत्पन्न रोग ।
(६ ) लग्नेश शुक्र युक्त चिह्न में--क्षय .रोग हो ।
(७ ) लग्नेश शनि युक्त चिह्न में--चोर या किसी नीच जाति से किया हुआ रोग ।
( = ) लग्नेश राहु केतु युक्त चिह्न में--चोर या किप्ती नीच जाति से किया हुओ
रोग ( जा० ल॑० ) ।
विचार यहाँ बताये अरिष्ट या दुःख का प्रमाण कम या अधिक होगा या नहीं
होगा जन्मस्थ ग्रह के भाव राशि ग्रह दृष्टि या युति के शुभाशुभ स्थिति का विचार एवं
गोचर ग्रह उनके शुभाशुभ युति दृष्टि पर अवलंबित है। शुभ योग दृष्टि से दुःख या रोग
हो अपने बल एवं स्थिति के अनुसार घटा देता है या नहीं होनेदेता । पाप योग दृष्टि
से रोग या दुःख बढ़ जाता है । गोचर में उसके शुभ या पाप योग दृष्टि से घटने बढ़ने
के समय का अनुमान होता है ।
इसी प्रकार लग्नेश षष्ठेश भिन्न-भिन्न ग्रहों से युक्त होने का फल है ।
( १) लग्नेश षष्ठेश-सूर्य युवत--ज्वर का भय ।
( २ ) लग्नेश पष्ठेश--चंद्र युकत--जल में डूबने का भय ।
. (३ ) लग्नेश षष्ठेश--मंगछ युक्त--युद्ध या स्फोटक समूह से भय ।
२९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
( ४ ) लग्नेश षष्ठेश--बुध गुक्त--पित्त के प्रमाद से भय ।
( ५ ) लग्नेश षष्ठेश--गुरुयुक्त--व्याधि रहित । ८
( ६ ) लग्नेश षष्ठेश--शुक्र युक्त--स्त्री मरण हो ।
(७ ) लग्नेश षष्ठेश- शनि युक्त-*अधो वायु का रोग ।
( ८ ) लग्नेश पष्ठेश--राहु केतु युक्त--सर्प की पीड़ा या चोर आदि का भय ।
( ९ ) लग्नेश षष्ठेश--त्रिकोण में राहु केतु युक्त--निगल रोग ( जा० पारि० )।
द्वादश भाव के अनुसार शरीर की पीड़ा का स्थान
प्रथम भाव--मुख, दांत, दाढ, गला, जीव, मस्तक ।
द्वितीय भाव--दाहिना नेत्र ।
तृतीय भाव--दाहिना कान, गर्दन, हाथ ।
चतुर्थ भाव--पेट कंधा ।
पंचम भाव--कमर के ऊपर का भाग, जंघा ।
षष्ठ भाव--गुप्तस्थान, दाहिना पाँव ।
सप्तम भाव-- पेट का मध्य भाग, नाभि ।
अष्टम भाव--गुप्त स्थान, बांया पाँव ।
नवम भाव--कमर के ऊपर का भाग ।
दशम भाव--कमर के ऊपर का भाग ।
लाभ भाव--वायाँ हाथ, कान, गर्दन ।
व्यय भांव--बांई आँख, पैर का तलवा ।
(१ ) इन भावों में यदि पाप ग्रह हो या पाप ग्रह की युति प्रतियुति योग और दृष्टि हो तो शरीर के उन्हीं भागों में अपनी कुण्डली के अनुसार रोग या पीड़ा होगी ।
( २ ) गोचर में पाप ग्रह २, ६, ८, १२ घर में हों या ग्रहों का इन स्थानों से
योगदृष्टि के द्वारा सम्बन्ध हो तो उनग्रहों की दशा या अन्तर्दशा में रोग निश्चय होगा । ( ३ ) कुण्डली में चंद्र ४७-१२ या ४,८-१२ में गोचर में हो तो रोगी को लाभ: होने की आशा नहीं रहती ।
( ४ ) कुंडली में लग्न-वैद्य । चतुर्थ भाव-औषधि । षष्ट भाव-रोग । दशम भाव जरोग साध्य होगा या असाध्य इसका ज्ञान होता है । ( ५ ) जब कुंडली में अनिष्ट कारक योग हो वह ग्रह जितने अंश में हो उतने अंश का हो ओर जब गोचर के पाप ग्रह से दृष्टि या दोष द्वारा सम्बन्ध स्थापित करे तब रोग होना सम्भव है ।
नक्षत्र अनुसार रोग की पीड़ा"
इन नक्षत्रों में रोग हो तो कितने दिनतक उस रोग की पीड़ा रहेगी यहाँ
4 अश्विनी में रोग हो--१, ९ या २५ दिन पीड़ा । ९ भरणी में रोग हो--११ या २१ दिन या १ मास या मृत्यु ।
नीरोगता : २९९.
३ कृतिका में रोग हो--९, १० या २१ दिन ।
४ रोहिणी में रोग हो--३,७,९ या १० दिन 1 ५ मृग० में रोग हो--३,५ या ९ दिन ।
६ आद्वा० में रोग हो--१० दिन या १ मास या मृत्यु ।
७ पुनवंसु में रोग हो--७ या ९ दिन या मृत्यु ।
८ पुष्य में रोग हो--७ दिन या मृत्यु ।
९ आश्लेषा में रोग हो--९, २० या ३० दिन या मृत्यु ।
१० मघा में रोग हो--२०,३० या ४५ दिन या मृत्यु ।
११ पूर्वा फा० में रोग हो--०,१५ या ३० दिन या १ वषं या मृत्यु ।
१२ उत्त० फा० में रोग हो--७, १५ या २७ दिन ।
१३ हस्त में रोग हो--७,८,९ या १५ दिन या मृत्यु ।
१४ चित्रा में रोग हो--८,११ या १५ दिन ।
१% स्वाती में रोग हो--१,२,३,४,५ या १० मास या मृत्यु ।
१६ विशाखा में रोग हो--८,१५,२० या ३० दिन ।
१७ अनुराधा में रोग हो--१० या २८ दिन ।
१८ ज्येष्ठा में रोग हो--१५,२१ या ३० दिन या मृत्यु ।
१९ मूल में रोग हो--९,१५ या २० दिन।
२० प्० षा० में रोग हो--१५,२० दिन या २,३,६ मास या मृत्यु ।
२१ ३० षा० में रोग हो--२० रात्रि, १ या १॥ मास ।
२२ श्रवण में रोग हो--१०,११,२५ या ६ दिन ।
२३ धनिष्ठा में रोग हो--१३ रात्रि या १० रात्रि, पक्ष या मास ।
२४ शत० में रोग हो--१० या १२ दिन।
२५ पूर्व भा० में रोग हो--१० रात्रि, २ या ३ मास या मृत्यु ।
२६ उ० भाद्र में रोग हो--७ या १० दिन १॥ मास या पक्ष।
२७ रेवती में रोग हो--१० या २८ दिन ।
ये नीचे बताये योग हों तो रोग बढ़ेगा ।
वार नक्षत्र दिन नक्षत्र तिथि
इतवार अनुराधा भरणी इतवार मघा १२
सोमवार आर्द्रा, उ० षा० सोम० विशाखा ११
मंगल० मघा, शत० मंगल आर्द्रा ण
बुध अश्विनी, विशाखा | बुध उ० षाढ़ा० ३
गुरु मृग०, ज्येष्ठा गुरु शत्त० ६
शुक्र आएशलेषा, श्रवण शुक्र अश्विनी ८
शनिवार हस्त, पूवं भाद्र । शनिवार पू पाढ़ा ९
इस प्रकार वार नक्षत्र और तिथि का योग हो । या यहाँ बताये दिन को उक्त
नक्षत्र पड़े ऐसे योग में रोग उत्पन्न हो तो अच्छे लक्षण नहीं हैं रोग अवश्य बढ़ेगा ।
“३०० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
जन्म नक्षत्र, जन्म राशि ओर अष्टम चन्द्र इन योगों में रोग उत्पन्न हो तो अपमृत्यु या मृत्यु हो । जन्म कुण्डली में पाप ग्रह कब मृत्यु सूचित करते हैं ओर बीमारी कोन प्रकार की होगी इन बातों को समझ लेना चाहिए । जन्म के पाप ग्रह आयु का या रोग का या शरीर विकार का बोध करते हैं। अत्येक वर्ष इस स्थिति से जान लेना चाहिए कि कौन बीमारी कव होगी और कब अच्छी होगी । जन्म काल निग्रह से जान लेना चाहिए कया विकार करेंगे । इसके विषय में पहिले बता चुके हैं ।
ज्वर--१--लग्नेश और षष्ठेश सूर्य युक्त हो तो ज्वर का भय हो (स० चि०) । २--षष्ठ या अष्टम में सूर्य हो ( फल० ) । ३--अष्टम में चंद्रमा राहु या केतु युक्त हो तो चौथिया ज्वर हो । ४--अष्टमेश चंद्र या राहु या केतु युक्त हो तो चौथिया ज्वर हो । ४--यदि कूर षष्ठ्यंश में उपरोक्त ग्रह हों तो भी चौथिया ज्वर हो (स० चि०) । ६--जन्म में मंगल और अष्टम में सूर्य हो तो दाह या ज्वर हो । ७--जन्म में लग्न या चंद्र के पास सूर्य या मंगल १-५-९ राशि या अग्नि राशि में हो तो उसकी प्रकृति उष्ण रहें सदा ज्वर की बाघा रहे । ८--तुला राशि का सूर्य की दशा में या क्षीण चंद्र की दशा में, या केन्द्र की दशा में बुध की अन्तर्दशा हो। या शनि की दशा में बुध की अंतदेशा हो तो भयंकर ज्वर हो ।
न में मंगळ और षष्ठेश अष्टम में होतो ६या १ २ वषं में ज्वर हो पू० पा० )।
सन्निपात शीतदोष--१--द्वितीय भाव में चंद्र हो तो शीत सम्बन्धी रोग और सम्निपात हो ( शंभु० ) ।
२--दुसरे में राहु चंद्र से युत हो तो निश्चय शीत दोष तथा सन्निपात हो (शंभु.) । ब्रिदोष--१--मुरु बुध शुक्र अष्टम में हो तो २१ वर्ष में त्रिदोष हो (स्वा० सं०)। बहुत पसीना--१--चन्द्रमा द्वितीय या अष्टम हो तो बहुत पसीने वाला हो ( जा० पारि० ) 1 डुगंध देह--दशम में मंगल बुध से युक्त हो तो दुगंध देह हो ( जा० पारि० )। दाह--तनुभाव में मंगल और चतुर्थ में सूयं हो तो दाह रोग हो । उष्णता से पीड़ा--यदि पाप युक्त मंगळ द्वितीयेश के साथ हो तो अति उष्णता से पीडित हो ( स० चि० )1 पित्त विकार--१--१ और ६ के स्वामी बुध युक्त हों तो पित्त रोग हो ( स० चि० ) || ु
२--पष्ठ स्थान में बुध हो तो पित्त विकार हो ( ज्यो० शा० )1 ३--सुर्य षळ स्थान में पाप दृष्ट हो ( जा० पारि० )1
नीरीगता : २०१
४--निबँल सूर्ये अष्टम में हो मंगल निर्बेल हो, पाप ग्रह द्वितीय भाव में हो ( जा० पारि० ) ।
५-सर्ये षष्ठ में. पाप ग्रह युक्त हो जिस पर पाप दृष्टि हो । अग्नि दग्ध या पित्त रोग--६-लग्न में सूर्य या मंगळ में कोई लग्नेश होकर बैठा हो वह पित्त से पीडित हो तथा अग्नि से दग्ध हो ( शंभु० ) । ७--षष्ठेश शुक्र शनि मंगल सेः पूर्ण दृष्ट हो तो पित्त रोग हो पूर्ण या पाप दृष्टि
के अनुसार विचारना ( शंभु० ) ।
वात विकार--१--गुरु लग्न में हो ओर शनि सप्तम में हो तो वात विकार हो ( जा० सं० ) ।
२--द्वितीय भाव में शनि हो पाप दृष्टि हो ( स० चि० ) ।
३--शनि तीसरे भाव में गुलिक युक्त हो और शुभ दुष्ट न हो ।
४--तृतीय जहाँ है उसका स्वामी अष्टम में हो ।
५--छ्ठे स्थान में चन्द्र क्रूर दृष्ट क्रूर नवांश गत हो ।
६--शनि तीसरे भाव में षष्ठ्यंश में शुभ दृष्टि रहित हो ।
७--१ और ६ के स्वामी शनि युक्त हों ( स० चि० ) ।
८--७,९ या ५ भाव में मंगल हो शनि लग्न में हो ।
९ क्षीण चन्द्र ओर शनि बारह बैठ हों तो बात रोग हो ( जा० भ० ) ।
१०-छग्न पाप युक्त हो लग्नेश भी पाप ग्रह युक्त हो तो अति दुष्ट कष्ट और
बात से पीडित रहे ( जा० सं० ) ।
१०-शनि की महादशा में केतु का अन्तर हो तो बात पित्त रोग हो नीच जाति
से झगड़ा व परदेश गमन हो ।
११-छठे स्थान में बुध क्रूर दृष्ट क्रूरांश गत हो तो श्लेष्म तथा बात रोग से
पीड़ित रहे ( सर्वे चि० ) ।
१२--७,९ या १ भाव में मंगल शनि व चन्द्र हो तो वात रोग हो (जा० भ०) ।
१३--५,९,७ भाव में कहीं मंगल हो । या लग्न में सूर्य और क्षीण चन्द्र तथा
शनि व्यय में हो तो वायु रोग की अधिकता रहे ( शंभु० ) ।
१४- लग्नेश लग्न में, शनि षष्ठ हो तो ४९ वर्ष में बात रोग हो ( वृ० पा० ) ।
१५--गुरु ओर द्वितीयेश निबंल हो तो बात व्याधि हो ( जा० पारि० )।
१६--शनि पाप युक्त द्वितीयेश युक्त भी हो।
वात पीड़ा--१७--छग्न में पाप युक्त चंद्रमा पाप दुष्ट हो । (शंभु०) १८-ककं
के सूर्य पर शनि की दृष्टि हो । वात रोग शनि के दोष से उत्पन्न होता है बिशेष पर ४-१० राशि के शनि के दोष से। १९--चतुर्थ में शनि हो तो वात पीड़ा (शंभु०) ।
वात रक्त---१-दशम में मंगल हो ठस पर शनि की दृष्टि हो तो वात रोग हो ।
स्नाग्र रोग--१-६ या ८ स्थान में शनि हो तो स्नायु रोग हो ( फल० ) ।
इलेष्म--१-यदि बुध षष्ठ में पाप ग्रहों से दृष्ट ओर क्र नवांश में हो तो कफ
३०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
रोग हो ( स० चि० ) २-बुध से युक्त मंगल षष्ठ स्थान में क्रूरांशक में हो उस पर
शुक्र और चंद्र की दृष्टि हो तो कफ रोग हो ( जा० पारि० ) ।
वात कफ--१-बुध सप्तम हो तो वात-कफ रोग हो ( जा० पारि० ) २-लग्न में
चंद्र व शनि एकत्र हो या अन्यत्र चंद्र पर शनि की पूर्ण दृष्टि हो तो वात कफ अर्थात्
खांसी दमा आदि हो ।
क्षय रोग--१-बुध और मंगल षष्ठ में हों इन पर चंद्र और शुक्र की दृष्टि हो .
ओर बुध नवांश में हो तो क्षय रोग हों ग्रह की धातु के अनुसार या नवाँशेष के
अनुसार रोग होता है । गुरु की दृष्टि हो तो बुरा प्रभाव दूर हो जाता है (स० चि०) ।
२-यदि गुरु षष्ठ या अष्टम भाव में हो तो क्षय रोग हो ( फल० ) ।
इ-चंद्र मा पाप ग्रहों के मध्य में हो ओर शनि सप्तम हो तो क्षय और गुल्म रोग
हो । श्वास, प्लीहा गुल्म रोग आदि हो ( जा० सं० ) ।
४-क्षीण चंद्र किसी जल राशि में पाप ग्रहों के साथ हा तो क्षय रोग या जल से
सम्बन्ध रखने वाले रोग हों ( फल० ) ! ;
५-बुध और मंगल साथ अष्टम स्थान में हों, चंद्र और शुक्र से दृष्ट हों और कोई
बुरे अंश में हो तो क्षय हो ( स० चि० )।
६-यदि शनि और मंगल षष्ठ भाव में हो सूर्य और राहु से दृष्ट हो और शुक्र
युक्त दृष्ट न हो तो क्षय और कास रोग से पीड़ित रहे ( स० चि० ) ।
७-बुध और मंगल षष्ट में क्रूर नवांशक में हो और शुक्र और चंद्र से दृष्ट हों तो
क्षय हो ( स० चि० ) ।
८-शनि और गुमिक दोनों छठे घर में सूयं मंगल और राहु से दृष्ट हों शुभ ग्रहों से युक्त दृष्ट न हों तो क्षय, श्वास कास आदि रोग हो ( स० चिं० ) । ९-चंद्रमा शनि युक्त हो मंगल से दृष्ट हो और चंद्र पर परिवेश भी हो तो क्षय हो ( वृ० जा० ) । द १०--चंद्रमा मंगळ युक्त हो लग्नेश से दृष्ट हो तो क्षय रोगी हो और उल्टी बुद्धि वाला हो ( शंभु० ) ।
११-सूर्य ११ भाव में शनि ५ भाव में, और पाप ग्रह अष्टम में हो तो क्षय रोग हो ( शंभु० ) । १२-लग्नरमें या ४, ८ भाव में सूर्य हो और दशम में शनि मंगल हो तो क्षय हो ( शंभु० )।
१३--चंद्र यदि सूर्य मंडल में अमावस्या के संधि में हो शनि से युक्त हो उस पर मंगळ की दृष्टि हो तो क्षय रोग हो और बुरा बोलने वाला हो ( प्रा० यो० ) ! 1४-पष्ठ भाव में राहु, केन्द्र में शनि, अष्टम में लग्नेश हो तो २६ वर्ष में क्षय हो ( वृ० पा० )।
1५-चंद्रमा पाप ग्रहों के बीच हो और सूर्य मकर का हो या शनि सप्तम हो तो क्षय, श्वास, प्लीहा विद्रधि रोग हो ( शंभु० ) ।
नीरोगता ४ ३०३
१६-लग्न में सूये मंगल से दृष्ट हो तो क्षय, दमा, प्लीहा या कोई गुदा का रोग हो ( स० चिं० )। ः
१७-चंद्रमा शनि युक्त हो सप्तम में २ पाप ग्रहों के बीच हो तो राजयक्ष्मा,
दमा, पीलिया आदि रोग हो ।
१८-सूर्यं चंद्र परस्पर एक दूसरे की राशि में या परस्पर अंश में हो तो क्षय और
शोष रोग हो ( शंभु० )। :
१९-या सूर्यं चंद्र एक ही राशि में हों तो भी उपरोक्त फल ( शंभु० ) ।
शोष (सूखा) रोग--१-सूर्ये और चन्द्र सिंह या ककं राशि में हों तो सुखा हो
(जा० पारि० ) ।
२-सूर्य चन्द्र परस्पर एक दुसरे के नवांश में हों ( वु० जा० ) ।
३-चन्द्रमा पाप ग्रहों के मध्य हो शनि सप्तम हो ( जा० पारि० )।
हृदय रोग--१-वृष, ककं, का चन्द्र पाप एवं शत्रु युक्त होवे ।
२-या चन्द्रमा मंगल अस्तंगत, पाप युक्त और शुद्ध हीन हो तो हृदय में शूल रहे ।
३-उपरोक्त चन्द्रमा मंगल सप्तम स्थान में हों तो भी उपरोक्त फंछ हो ।
४-चतुर्थ (हृदय स्थान) में षष्ठेश सूर्य बली हो कूर ग्रह से युक्त हो तो हृदय
रोग हो ( जा० ल॑०) ।
५-शनि व गुरु षष्ठेश होकर लग्न से चतुर्थ में क्रूर ग्रह युक्त हों तो हृदय रोग
हो ( जा० छं० )।
६-वही शनि व गुरु क्रूर ग्रहों से पीड़ित अर्थात् दृष्ट हों तो हृदय रोग ओर देह
कंप भी हो ।
७-चतुर्थ में मंगल शनि व गुरु हों कूर ग्रहों से दुष्ट हों तो हृदय रोग हो ओर
हृदय क्लेश कारक घाव हो ( जा० लं० ) ।
८-पंचम में पाप ग्रह हो ओर पंचमेश दो पाप ग्रहों के बीच हो पाप ग्रह से दृष्ट
हो तो हृदय रोग हो ( स० चिं० ) ।
९-पष्ठेश सूयं के नवांश में हो तो हृदय रोग हो ( जा० सं० ) ।
१०-चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हो चतुर्थश पाप युक्त पाप मध्य में हो तो हृदय रोग
हो ( स० चिं० ) 1 ड
११-चतुर्थं भावेश जिसके नवांशक में हो उसका स्वामी क्रूर पष्ठयंश में हो कूर
अह से दृष्ट हो तो हृदय में शूल आदि रोग हो (स० चिं० ) 1
१२-चतुर्थेश व्यय भाव में व्यय भावेश युक्त हो या नीच, शत्रु गुही, अस्तंगत
होवे तो हृदय में रोग हो ( स० चिं० ) ।
१३-राहु चतुर्थं में हो और लग्नेश पाप दुष्ट और बलहीन हो तो हृदय शूल रोग
हो ( जा० पारि० )। - क छ १४-लग्नेश शत्रु गृह में व नीच राशि में हो, मंगळ चोथे घर में हो, शनि यदि
याप ग्रहों से दृष्ट हो तो शूल रोग हो ( जा० पारि० ) । -
३०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१४-सूये चंद्रमा और मंगल शत्रु गृही हों तो शूल रोग हो ( जा० पारि० ) ।
१६-चतुर्थ और पंचम भाव में पाप ग्रह हो पाप षष्ठ्यंश से युक्त हो शुभ ग्रह
की योग दृष्टि न हो तो हृदय रोग हो ( जा० पारि० )।
१७-जन्म राशि में शनि मंगल राहु या केतु हो तो शरीर में पीड़ा, हृदय रोग,
स्त्री को कष्ट बंधु सुख में विघ्न हो ।
शूल--१-सप्तम में सूर्य मंगल शनि हो तो भगंदर बवासीर वायु और शूल रोग हो ( शंभु० ) । २-जब तीसरे भाव में ३ दुष्ट ग्रह हों तो दृढ़ शूल रोग हो ( जा० सं० ) । ३-छठ आठवें भाव में मंगल या शनि, तीसरे चौथे पाप पीड़ित सूर्य हो और चंद्रमा सूयं की राशि में हो तो शरीर में शूल रोग हो ( शंभु० ) ।
४-षष्ठ में चंद्र मंगल और सूर्य तीनों हों तो शूळ रोग बिसर्प रोग हो (स.चिं.) ।
५-षष्ठ भाव में सूर्य चंद्रमा साथ हों तो सपं शूल हो ( स० चिं० ) ।
जलोदर--१-सूर्यं चंद्र लाभ भाव में, राहु लग्न में हो तो २१ वर्ष में जलोदर रोग हो ( जा० सं० )।
२-शनि कर्के का, चंद्रमा मकर का ( जा० पारि० ) | गुल्म--१-शनि सप्तम भाव में हो तो गुल्म रोग हो ( जा० सं० ) । २-व्ययेश षष्ठ भाव में और षष्ठेश व्यय माव में हो तो २९-३० वर्ष में गुल्म हो ( वृ० पा० )। ३-शनि के गृह में क्षोण चंद्र पाप युक्त ६ या ८ भाव में हो तो थायु कुपित होकर गुल्म रोग हो ( जा० पारि० ) ।
४-छठे स्थान में शनि हो तो विशेष कर गुल्म रोग हो ( स० चिं० ) । ५-पष्ठ में शनि पाप दृष्ट होकर क्रूर नवांश में हो तो गुल्म हो (सर चिं० )। ६-लग्नेश ओर षष्ठेश चंद्र युक्त हो तो जल से गंड गुल्मादि रोग हो (स. चिं.) । ७-कक कुम्भ वृश्चिकांश का राहु या केतु युक्त हो तो गुल्म (पेट में गोले का रोग) हो ( स० चिं० )। ,
८--राहु पंचम हो तो वात गुल्म या कमि का रोग हो । शनि से भी ऐसा ही फल कहना (शंभु०) । क ९--मंगल लग्न में हे हो षष्ठेश निर्वळ हो हो तो तो गुल गुल्म और अजीण रीणं रोग हो या मुख
१०-षष्ठेश का नवांशेश सूर्य या मंगल र (० ०) | सूय या मंगळ हो तो ग्रह अनुसार उपरोक्त फ
(1 नु चंद्र के साथ ६, ८ घर में हो तो प्लीहा आदि रोग हो
२--चंद्रमा कळ में हो तो प्लीहा रोग हो (शंभु०) । ३--चंद्र षष्ठेश कूर ग्रहों से दृष्ट हो शुभ ग्रहों की दर प्ली (ताप तिल्ली) रोग हो (जा० ल॑०) शी DS रह
नीरोगता : ३०५
४--सप्तमेश या लग्नेश होकर चंद्र क्रूर ग्रहों से दृष्ट हो (जा०लं०) 1
५--शनि लग्नेश होकर कूर ग्रहों से दृष्टि योग द्वारा पीडित हो तो प्लींहा हो
और सुख हीन हो (जा० लं०) ।
६--लग्नेश होकर शनि लग्न में हो और पाप युक्त या दृष्ट द्रो तो सुख हीन हो
और प्लीहा रोग वाला हो (जा० छं०) ।
७--चंद्रमा शनि और मंगल के वीच हो और सूयं मकर का हो तो उसे प्लीहा,
गुल्म, विद्रधि या श्वास रोग हो (वृ० जा०)।
विद्रधि-१--छठे स्थान में गुरु होकर क्रूर दृष्ट, क्ररांशक गत होतो विद्रधि हो
(किसी अंग में गुमड़ा आदि रोग) (स० चि०)।
उदर रोग-१--चन्द्रमा या शुक्र ६ या ८ भाव में हो ।
२--जन्म स्थान में चंद्रमा अष्टम में शनि हो उसे पेट के रोग हों मंदाग्नि हो
तथा देह से हीन हो (छ० चं०) ।
३--सिह लग्न में चन्द्र पापयुक्त या दृष्ट हो तो पेट कां रोग हो।
४--मंगल पञ्चम में हो तो पेट का रोग हो (फल०) ।
५--तीसरे स्थान में क्रूर ग्रह हो या गुरु तीसरे स्थान में कूर ग्रह युक्त हो तो
मंदाग्नि रोग से पीडित रहे ।
६--चन्द्रमा पाप युक्त पापांशक में चतुर्थ भाव में हो तो पेट में पीडा और कफ
से फेफड़े में रोग हो (शंभु) ।
७--लग्न में षष्ठेश और लग्नेश वक्री ग्रह की राशि में हों इन पर शनि की
दृष्टि हो ।
शुक्र शनि से ८ या ६ भाव में पाप ग्रह हो तथा अष्टमेश ओर षष्ठेश सप्तम भाव
में हो तो पेट बढ़ने का रोग हो (शंभु) ।
८--छठे स्थान में शनि का कोई सम्बन्ध हो तो उदर विकार से कष्ट हो ।
९---शुक्र सहित चन्द्र छठे घर में हो तो मंदाग्नि रोग से युक्त,हीनांग (मान०) ।
१०--लग्न पाप ग्रह से युक्त हो या राहु से युक्त हो, शनि अष्टम हो तो कुक्षि
या पेट के रोग से पीडित हो (जो० पारि०)।
११--१, २, ८, १२ भाव में क्रूर ग्रह हों तो ८-१२ वर्ष में दस्त बंद होने से
पीड़ा हो (मान०) ।
१२--अष्टम घर में शनि,ळग्न में चन्द्र हो तो उदर रोग,मंदाग्नि या किसी अंण
से हीन हो (मान०) ।
अतिसार--१- शुक्र सातवे घर में हो तो मूलातिसार रोग हो (जा० पारि०) ।
२--लग्न में पाप राशि हो वहाँ शुक्र और चन्द्र हो तो अतिसार, सिर रोग
अपने व स्त्री के शरीर में कूमि रोग व अग्नि भय हो ।
पांडू रोग--१--चन्द्रमा मंगल के साथ षष्ठ भाव में हो तो वायु विकार से पांडु
रोग हो (जॉ० पारि०) ।
O २०
३०६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
पीनस--१--व्यय भाव में पाप ग्रह हो, चंद्र छठे शनि आठवें भाव में हो लग्नेश पाप ग्रह के नवांश में होःतो पीनस रोग हो (जा० पारि०) । २--शनि मंगळ सूर्य ये अशुभ स्थान में एकत्र हों तो नासिका रोग हो अनेक ज्याधि व शत्रु भय हो ।
आमवात--१--क्रूर लग्न में जन्म हो और लग्नेश कूर ग्रहों से युक्त हो तो आमवात रोग से कष्ट हो (ल० चं०) । नाभि में रोग-षष्ठेश तृतीय में हो तो नाभि में दृढ़ रोग से दुःख हो सम्पूर्ण गाँव 'को दुःख देवे (जा० ल॑०) । | माता (चेचक)--१--मंगल लग्न में हो उसे शनि व सूर्य देखते हों तो शीतला हो (जा० पारि०) । ई श्वेत कुष्ठ--१--शुक्र शनि दोनों मंगल की राशि में हों चंद्र व्यय में हो, मंगल तीसरे भाव में हो तो एवेत कुष्ठ हो ।
२--षष्ठ में मीन या मेष के नवांश में स्थित चंद्र पाप ग्रहों से दृष्ट हो तो श्वेत कुष्ठादि हो (जा० सं०) ।
३--युरु शनि दोनों अष्टम में हों चन्द्रमा षष्ठ में हो, बुध शुक्र नवप में हों तो चित्र देह हो (जा० सं०) । ; ४--चन्द्र लग्न में, सूर्य सप्तम, और शनि मंगल दूसरे या बारहवें हों तो श्वेत कुष्ठ हो (वृ० जा०) ।
५- लग्नेश अष्टम भाव में पाप युक्त या दृष्ट हो तो श्वेत कुष्ट, मंदारिनि, दाद खुजली आदि हो (शंभु ०) । ६--छग्नेश और बुध ये दोनों या मंगल और चन्द्र ये दोनों राहु या केतु से युक्त होकर कहीं हों तो श्वेत कुष्ठ साजन आदि रोग हो (जा० छ॑०) । ७--चन्द्रमा मेष या वृष राशि में मंगळ, शनि युक्त हो तो श्वेत कुष्ठ व रोगी हो (जा० लं०) ।
८-नीच में व चर राशि में शुक्र में चन्द्र का योग पाप युक्त हो तो पांडु कुष्ट हो (शंभु) ।
रक्त कुष्ट--१--सुर्य कहीं भी मंगल या शनि युक्त हो तो रक्त कुष्ठ, कृष्ण कुष्ठ (देह में लाल या काले चिट्ठे पड़े) हो ( जा० लं० )। २--शुक्र गुरु चंद्र या शनि ये चारों मीन या ककं या वृश्चिक राशि में हों तो रक्त कुष्ठ हो शरीर सुड रहित हो ( जा० ०) ' - ३--शनि के साथ चंद्र षष्ठ भाव में हो तो ४५ वर्ष में रक्त कुष्ठ हो (वृ० पा०)। कुष्ठ--१-नवम पंचम भाव में २,४,१०,८, राशि हो और पाप ग्रह युक्त या ` दृष्ट हो तो कुष्ठ हो ( जा० सं० ) |
२- चन्द्र, बुध ओर लग्नेश मङ्गल के साथ तीनों ग्रह हों तो कोढ़ हो ।
नीरोगता : ३०७
३--चन्द्र ५,१०,४,१२ राशि के नवांश में हो और शनि और मंगल से युक्त या
दृष्ट हो तो कोढ़ हो ( स० चि० )1
४---चन्द्रमा १,१०,४,१२ राशि के नवांश में शनि मंगल से युक्त या दृष्ट हो तो
कुष्ठ हो ( शंभु० ) यदि शुभ ग्रह को दृष्टि हो तो कुष्ठ न होकर अंड वृद्धि, व्रण,
बवासीर, भगन्दर आदि हो ।
५- चन्द्रमा पाप ग्रह के बीच के नवांश में हो तो कुष्ट हो ( शंभु० ) ।
६- सप्तम में बुध तथा शनि हो । र
७--चन्द्र के घर का बुध हो तो कुष्ठ या क्षय रोग हो ( मौन० ) ।
८--लग्न में मंगल, अष्टम में सूर्य, चतुर्थ में शनि हो तो कुष्ठ हो ( मान० )।
९--मंगल या बुध लग्नेश होकर चन्द्र राहु या शनि से युक्त हो तो कुष्ठ हो
( बृ० पा० ) ।
१०--धन राशि में और घन नवांशक में या पाँचवें/नवांश में चन्द्र हो शनि या
मंगल से युक्त या दृष्ट हो तो कुष्ठ हो ।
११--८,४,१० राशि त्रिकोण या लग्न में हो और पाप ग्रह से वह राशि दुष्ट
हो तो कोढ़ हो ( प्रा० यो० ) ।
१२---चन्द्रमा मंगल शनि और शुक्र जळ राशियों में पाप पीड़ित हो तो छूता
संज्ञक कुष्ठ हो ( शंभु० ) ।
१३--चतुर्थ में चन्द्र सहित राहु मंगळ दोनों हों तो २५ वर्ष में मंडल कुष्ठ
होवे ( जा० सं० )।
१४---४,५,१२ राशि कूर ग्रह युक्त हो तो अवलताकार कुष्ठ हो शरीर में मकड़ी
के समान फतकता हुआ क्लेश कारक कुष्ठ हो ( जा० लं० )।
१५---चन्द्रमा मंगल युक्त हो तो कुष्ट, ` भगन्दर, बवासीर, खुजली आदि रोगों
से पीड़ित रहे ( शंभु० ) ।
१६--शनि या मंगल से युक्त चन्द्र ४,१२,१० राशि के नवांश में हो शुभ योग
दृष्टि न हो तो कुष्ठ हो ( जा० पारि० ) ।
१७--पाप ग्रह नीच के हों उन पर पाप ग्रह की दष्टि हो या वे पाप ग्रह के
नवांश में होकर पंचम घर में हों तो कोढ़, रक्तपित्त आदि रोग हो ( प्राश यो० ) ।
१६--२,४,८,१० राशि में कोई राशि त्रिकोण में और लग्न में भी हो या पंचम
नवम से एक स्थान में और लग्न में हो वह राशि पाप युक्त या दृष्ट हो तो कुष्ठी हो
( वृ० जा० ) ।
१९--षष्ठ भाव में गुरु हो गुरु की राशि में चन्दर हो तो १९ या २२ वर्ष में
कुष्ठ हो ( बु» पा० ) ।
२०--चंद्र, बुध, लग्नेश, राहु या केतु के छठे घर में हो तो कमळ कुष्ठ हो ।
२१--छमग्नेश को छोड़कर उक्त ग्रह रन में हों तो कुष्ट हो ( स० चि० ) ।
इसी प्रकार इतरजनों का विचार--भाव कारक और भावेश से भी इसी प्रकार
३०८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
मित्र आदि भावों में हो तो स्थिर से उत्पन्न कुष्ठ ग्रह के उक्त स्थान में अवश्य होगा
( स० चिं० ) ||
श्वेत कुष्ठ--चन्द्रमा लग्नेश न हो और लग्न में राहु युक्त हो ।
कष्ण कुष्ठ--चन्द्रमा लग्नेश न हो और लग्न में शनि युक्त हो ।
रक्त कुष्ठ--चन्द्रमा लग्नेश न हो ओर लग्न में मंगल युक्त हो ।(वृ० पा०)
कुष्ठ--लग्नेश को छोड़कर अन्य पाप ग्रह लग्न में हों ।
नील कुष्ठ--लग्नेश को छोड़कर अन्य शनि ग्रह लग्न में हों ।
रक्त कुष्ठ--छग्नेश को छोड़कर अन्य सूर्य ग्रह लग्न में हों । (जा० पारि०)
एवेत कुष्ठ--लग्नेश को छोड़कर अन्य मंगल ग्रह लग्न में हों ।
विचार--उपरोक्त योगों में चन्द्र पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो कुष्ठी न होगा किन्तु खाज, दाद, खुजली आदि चमं रोग होंगे ।
दब्रु--१-सप्तम में सूर्य बुध चन्द्र हो शेष ग्रह चतुथं में हो तो दद्रु ( दाद ) रोग हो ( जा? सं० ) ।
२--चन्द्रमा स्निग्ध राशि का सप्तम में हो, चौथे नवांशक स्थित शनि से दृष्ट हो तो दाद रोग से पीड़ित रहे ( शंभु० ) ।
३--जछचर राशि स्थित चन्द्र लग्न से दूसरे स्थान में हो या शनि युक्त हो या लग्न में सूर्य हो तो दाद रोग हो ( जलचर, कर्क, मकर पराद्धे और मीन राशि ) ( जा० लं० )।
खजुली--१-मीन या मेष के नवांश में चन्द्र शुभ ग्रह से दुष्ट हो (जा० सं०) । २--जलचर राशि में चन्द्र पाप युक्त हो शनि से दृष्ट हो ( शंभु० ) । ३--तृतीय भाव में मंगळ शनि बली हों तो खजूली आदि हो ( जा० पारि० )1 रक्त रोग--१--चन्द्र बुध और लग्नेश सूर्य युक्त हो तो रक्त का रोग हो ( स० चि०)।
२--मंगल १, १२, ६,७ भाव में शनि युक्त सूर्य से दुष्ट या अस्तंगत, शत्रु गुही हो तो रुधिर का रोग हो ( स० चिं० )।
३--छठे स्थान में मंगल या शनि हो । मंगल हो तो रक्तविकार से शनि होतो अन्य विकार से रोग हो ( शंभु० ) ।
४--सप्तम में पाप युक्त सूर्य हो तो रुधिर विकार एवं वातोदर से पीड़ा हो ( शंभु० ) ।
५--लग्न में शनि, मंगल राहु और सूर्य हो तो उसे रक्त दोष हो और संताप हो ( लू० चं० ) ॥
६--चन्द्रमा ६ या ८ भाव में हो मंगल से दृष्ट हो लग्न में शनि हो तो रक्त रोग हो ( जा० पारि० ) ।
७--षष्ठेश ८ या ४ राशि के नवांश में हो शनि से दृष्ट हो तो रुधिर ओर पवन विकार पीड़ित हो ( जा० सं० ) ।
नीरोगता : ३०९
८--राहु, मंगल, सूर्य से युक्त शनि हो शुभ दृष्टि न हो तो रुधिर ताप करने वाला हो ( जा० सं० )। र
रक्त पित्त--१--मंगल सप्तम में हो तो रक्त पित्त रोग हो ( जा० पोरि० )।
२--छठे स्थान में मंगल, षष्ठेश पाप युक्त या दृष्ट हो तो रक्तपित्त पीड़ा हो ( स० चिं० ) । क
३--छठे स्थान में मंगल क्रूर नवांश में पाप दृष्ट हो तो रक्तपित्त व्याधि हो
{ स० चिं० )। 2
(४) चन्द्र के क्षेत्र में मंगल हो तो रक्त के निमित्त से हीनांग ऑर नाना प्रकार
की व्याधि से युक्त हो ( मान० ) । व
ब्रण या चिह्ल--१--पाप ग्रह अष्टम हो तो व्रण युक्त या चोट लगने के दाग या
किसी प्रकार का चिह्न उसके गुह्मस्थान में होवे तथा बांई कमर में घाव व लांछत
हो ( शंभू ) ।
शरीर में घाव--२-लग्नेश और अष्टमेश दोनों शनि, राहु या केतु से यृक्त हो
तो उनमें जो बलवान् हो उसकी दशा में शरीर में घाव होवे ( जा० ल॑० )1
३--चतुर्थ में मंगल हो तो व्रण पीड़ित या अग्नि से दग्ध हो ( शंभु० ) ।
४--पंचम मंगल हो तो अग्नि व शस्त्र से पीड़ा हो संतान बराबर मरती रहे
मनुष्य दुखित हो ( शंभु० ) ।
५--लाभ में राहु शनि हो तो तद् भावोक्त अंग में काष्ठ या पत्थर की चोट हो
या मनुष्य व्यथा युक्त रहे ( शंभु० ) ।
६-शनि युक्त चंद्र १-२ या ३ राशि में हो तो पक्षियों से स्थूल घाव हो (जा.सं.) ।
७--षष्ठेश मंगल युक्त हो तो रुधिर और शस्त्र से संतप्त देह पत्थर तथा पृथ्वी
और पवन इनके प्रहार से युक्त करता है । भूख से संतप्त, देशाटन करने में राजदर्शन
से युक्त हो । ( जा० सं० ) ।
८--लग्नेश, षष्ठेश, और चंद्र एक साथ हो मंगल भी साथ हो तो चेचक, घाव,
फोड़ा या युद्ध में शारीरिक क्लेश हो ।
९- षष्ठ में पाप ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो ब्रणादि हो शारीरिक या मानसि
कष्ट, शत्रु, भय, मिथ्या अपवाद हो ।
१०- छठे स्थान में मंगल या सूर्य हो तो शस्त्र से चोट व्रण या प्रमेह या अग्नि
विष से उत्पन्न पीड़ा हो या हड्डी टूटने से पीड़ा हो । या रुधिर से उत्पन्न अति पीड़ा
या स्त्री के जंघा में या दाहिने पैर में चिह्न हो ( शंभु० ) ।
११- बुध के स्थान में सूर्य हो उस पर गुरु की दृष्टि हो तो शस्त्र की चोट से
शरीर विदीर्ण हो ।
१२-लग्नेश मंगल के साथ त्रिक में हो तो शस्त्र से घाव या व्रण या गठिया
वात हो ।
१३--लग्नेश बुध के घर में हो बुध से युक्त या दृष्ट हो तो गुह्य स्थान में ब्रण
हो ( जा० पारि० ) ।
घाव--१४--व्यय में शुक्र युक्त राहु हो तो अति घाव हो ( जा० सं० )।
॥
३१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
१५-छग्न में मंगल हो सूर्य शनि से दृष्ट हो तो शस्त्र की चोट लगे (स० चि ०) ।
१६--कर्क लग्न में मंगल हो तो शस्त्र से चोट लगे ( जो० वगं० ) ।
१७--तीसरे भाव में शनि हो क्रूर दृष्ट हो तो बाहु में चिल्ल या शस्त्राघात हो ।
या छोटे भाई को पित्त से उत्पन्न गंड माला हो ( शंभुर ) ।
१८-मंगर अष्टम में पाप ग्रह से दृष्ट हो, केतु २ या ८ भाव में हो तो ब्रण या घाव हो ( जा० पारि० )।
१९--सूर्ये व मंगल दशम में हो तो पीठ की हड्डी के समीप या जांघ की जड़ में शस्त्र की चोट या अग्निदाह से ब्रण या दाग हो ( शंभु० ) ।
२०--चतुर्थ भाव पाप युक्त हो तो तीखी चोट कंधा या कुक्षि या हृदय में छगे।
२१--सूर्यं मंगल चतुर्थ में दशमेश से युक्त या दृष्ट हो या चतुर्थेश से युक्त या दृष्ट हो तो पत्थर.की चोट लगे ।
२२---चतुर्थेश शत्रु शनि से युक्त मंगल से दृष्ट हो शुभ दृष्टि न हो तो पत्थरों से पीड़ित हो ( स० चि० ) ।
२३--चतुर्थेश सूर्यं या शनि से युक्त मंगल से दृष्ट हो शुभ दृष्टि न हो तो पत्थर की चोट लगे । ः
(२४) सप्तमेश शनि हो, चतुर्थ में मंगल और शनि हो दशमेश से युक्त या दृष्ट हो तो पत्थर की चोट से मारा जावे या चट्टान से चोट लगे (स० चि० )। (२५) शुक्र की राशि का गुरु तीसरे भाव में हो कोई पाप ग्रह वक्री हो तो ११ वर्षे में पत्थर का प्रहार होवे (जा० सं०) ।
(२६) व्यय भाव में मंगल हो तो दाहिने और बायें भाग संबधी कमर में घाव हो, वाये नेत्र और बायें कर्ण में रोग हो खोटे कमं से ब्रण आदि भय हो । स्त्री की अधिक अंगता होवे (जा० सं०) । (२७) हितीय स्थान में पाप ग्रह हो तो मुख नेत्र या दक्षिण कंधे में या कर्ण में व्रण घाव या और कोई प्रहार हो (जा० सं०) ।
(२८) षष्ठेश क्रूर ग्रह होकर लग्न या अष्टम में हो तो शरीर में विस्फोट (ब्रण) आदि का चिल्ल हो (० चि०)।
(२९) ऐसा ही दशम स्थान में पाप युक्त षष्ठेश हो पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो अंत में व्रण हो (स चि०) ।
ब्रण इतर लोगों को--(३०) ऐसा ही विचार मित्र आदि सभी भाव से करना अर्थात् पिता आदि के लिए उसका घर उसका स्वामी और उसका कारक देखो । फिर यहाँ दिये हुए योग का विचार करो । भावेश भाव कारक ग्रह के दृष्टि योग से तथा बलाबल के अनुसार मित्र आदिको को भी व्रण कहना ।
ब्रण--(३१) छठे स्थान में सूर्य हो, षष्ठेश पाप युक्त या दृष्ट हो तो नाभि स्थान में पित्त विकार से ब्रण हो (स० चि)।
नीरोगता : ३११
. (३२ ॥ चन्द्र छर्न में हो सूर्य मंगछ दोनों सप्तम में हों तो फोड़ा आदि से कष्ट हो (जा० सं०) । (३३) गुरु अशुभ ग्रह की राशि में हो शुक्र शुभ ग्रह की राशि में हो तो ७ वर्ष में ब्रण हो (जा० सं०) ।
(३४) व्यय में सूर्य हो तो राज पुत्र और चोरों से धन हरण हो उसके चरण में चिह्न हो लाठी के प्रहार से चोट हो (जा० सं०) ।
(३५) दशम में राहु या शनि हो तो वायु दोष से पीडित रहे ऐसे योग में माता- पिता आदि के पूर्वोक्त स्थान में श्याम रंग का चिह्न (लाखन) होगा । माता पिता का वह एक ही पुत्र हो यदि दूसरे भाई भी हों तो बह अपुत्र या मृत पुत्र, रोग से पीडित, पत्थर काष्ठ की चोट से, जल में डूबने से, वृक्ष से गिरने से या
चौपाये से पीड़ा युक्त चोट हो (शंभु) ।
(३६) पष्ठेश ६, २ या ८ भाव में हो तो शरीर में ब्रण हो (वृ० पा०) ।
षष्ठ भाव में जो राशि हो उसके आश्रित बंग में व्रण हो इसी प्रकार पिता आदि
(दशम स्थानोदि) के स्वामी पष्ठेश युक्त ६, ८ भाव में हों तो पिता आदि सम्बन्धियों
के व्रण कहना (वृ० पा०) । ;
(३७) लग्नेश मंगल की या बुध की राशि में किसी भाव में हो बुध से दृष्ट हो
तो मुख में व्रण हो (वृ० पा०) । ८ ४
(३८) षष्ठेश राहु या केतु युवत लग्न में हो तो शरीर में ब्रण हो (जा० पारि०)।
(३९) वृश्चिक लग्न में मंगल गुरु शुक्र से अदृष्ट हो तो फुन्सी घाव युक्त होवे (शंभु०) । (४०) चतुर्थ भाव में शनि, मंगल के नवांश का हो और केतु युक्त हो तो उपरोक्त फल हो (शंभु) ।
ब्रण--(४१) शनि मंगल के साथ ६,७,१२ भाव में कहीं हो तो भी उपरोक्त फल हो (शभु०) । ८ (४२) षष्ठेश सूर्य पाप युक्त नवम भाव में हो, छठे शुभ ग्रह और शनि मंगल गुरु
हो तो वह पापी हो, कृष्ण रंग के विरूप व्रण हों। ऐसे ही विकृत पैर भी होंवें (शंभु) ।
(४३) ६ या ८ घर में मंगल या केतु हो तो व्रण हो (लल०) । ; (४४) ६ या ८ घर में राहु और मंगल की दृष्टि हो तो पीठ का फोड़ा (दार
बन्द) हो (फल०) ।
(४५) षष्ठेश पाप युक्त लग्न या अष्टम में हो तो ब्रण (जा० सं०) । ः रे
(४६) षष्ठेश बुध से युक्त या दृष्ट हो तो गिरने या लोह प्रहार से अंग विदीर्ण
|, 'जा० स०) । ८ दो न सी होतो i पत्थर या चौपायों से चोट पहुँचे (जा०सं०)।
(४८) षष्ठेश चन्द्रमा मंगल युक्त हो तो शस्त्र प्रहार तथा अग्नि रोग या अग्नि
दाह से संतप्त देह हो (जा० सं०) ।
३१२१: सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(४९) राहु या.शुक्र की दृष्टि हो तो जिस राशि में राहु.हो उस राशि के अंग
में व्रण हो (जा० पारि०) । र
म्ण के स्थान--(१) षष्ठेश पाप युक्त या दृष्ट होकर लग्न से अष्टम में हो तो
षष्ठेश के अनुसार यहाँ बताये स्थान में ब्रण होगा (जा० ल॑०) ।
(२) या ६, ८ भाव में षष्ठेश से युक्त जो ग्रह हो (जा० पारि०) ।
(३) या ६ भाव में जो ग्रह हो वे इन स्थानों में ब्रण करते हैं :--
सूर्य-सिर में घाव गुरु--नाभि या कटि में ब्रण
चंद्र—मुख में व्रण शुक्र--नेत्र पर व्रण
मंगल--कंठ में व्रण शनि--यांव में व्रण
बुध--हृदय में व्रण राहु केतु--ओठों में या पेट में या पीठ
र में ब्रण ।
(४) षष्ठेश या उसका कारक १, १० या ८ भाव में हो तो भी उपरोक्त स्थान
में ब्रण करते हैं (प्रा० यो०)।
हा अच्छे हों--इन उपरोक्त रोगों में शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो व्रण अच्छे हो जाते हैं ।
रोग बढ़े--यदि.उन पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो अच्छा न होकर उनमें
विकार होता है 1
कीड़े पड़ें--यदि शनि की दृष्टि हो तो व्रण में कीड़े पड़ें ।
काटना या चीरना पडे--यदि मंगल की दृष्टि हो तो ब्रण आपरेशन करना पड़े
(प्रा० यो०) । या लग्नेश षष्ठ स्थान में हो कर यदि :---
सूर्य से युक्त हो--जानवर से व्रण ।
चंद्र युक्त हो--जलचर के योग से व्रण ।
मंगल युक्त हो--शस्त्र लग कर व्रण ।
बुध युक्त हो--पित्त रोग से ।
गुरु युक्त हो--जीभ का रोग हो ।
शुक्र युक्त हो--पांडु रोग हो ।
शनि युक्त हो--चारों के उपद्रव से व्रण ।
राहु केतु युक्त हो--महामारी का उपद्रव ।
इनमें शुभ योग हो तो आरोग्य होता है । पाप योग से दुःख बढ़ता है(भा०यो०)। सिर में घाव (१) लग्न में लग्नेश ओर मंगल बुरे ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो सिर में घाव या फोडा. पत्थर या तलवार में हो । (२) लग्न में लग्नेश और शनि हो, पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हों तो सिर में चोट गिरने से, चट्टान अग्नि या शस्त्र से हो। (३) पाप ग्रह कोई या सब लनन में हो तो सिर में बड़ा कटने का निशान या कुरूपता का चिह्न हो।
नीरोंगता : ३१३
(४) यदि ये पाप ग्रह बुरी स्थिति में हैं और लग्नेश निर्बल हो. तो ये चोट के
निशान बड़े भारी होंगे जिससे स्थाई चोट या कुरूपता हो .।
(५) यदि लग्नेश अच्छे साथी युक्त, उच्च में या शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो
चोट साधारण एवं अल्प होगी नाम मात्र को सिर में चोट का चिन्ह होगा। |
ग्रहों का बलाबल और अच्छा बुरा प्रभाव विचार कर फल कहना (स०चि०) ।
माता-पिता आदि के भी व्रण विचार--उपरोक्त योगों में जिस प्रकार जातक
को ब्रण होना बताया है उसी प्रकार माता-पिता पुत्र आदि को उनके भाव को लग्न
भाव मानकर विचारने से उनके ब्रण का भी फल प्रगट होगा । जेसे--
(४५) षष्ठेश पाप युक्त लग्न या अष्टम में हो तो शरीर में घाव हो । चतुर्थ
भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर चतुर्थ या चतुर्थ से अष्टम में हो-माता की
देह में व्रण ।
दशम भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर दशम या दशम से अष्टम में हो-
पिता को ब्रण ।
पंचम भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर पंचम या पंचम से अष्टम में हो- .
पुत्र को ब्रण ।
सप्तम भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर सप्तम या सप्तम से अष्टम में
हो-स्त्री को व्रण ।
तीसरे भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर तीसरे या तीसरे से अष्टम में
हो-भाई को ब्रण ।
इत्यादि प्रकार से सबके सम्बंध में इस योग का विचार उपरोक्त प्रकार से कर
सकते हैं ।
गंड माला-(१) ६,८ भाव में मंगल शनि साथ हों उस पर शुभ दृष्टि न हो तो
गंड माला फोड़ा आदि रोग हो (शंभू) ।
मूत्र रोग-सप्तम में शनि व राहु हो तो मूत्र रोग हो ।
मूत्र कच्छ-(१) षष्ठ में जल राशि हो उसमें चन्द्र हो।
(२) या षष्ठेश जल राशि में हो और उस पर बुध की दृष्टि हो (स० चि० )।
(३) सप्तम में मंगळ पाप युवत या दृष्ट हो तो मूत्र कुच्छु रोग हो और पुरुषत्व
से हीन हो (शंभु०) । र
(४) षष्ठेश पाप युक्त नवम में हो या बष्ठेश व्ययेश युक्त कहीं हो पर शनि
दृष्ट हो तो मूत्रक्ृच्छू रोग हो (ज्यो० शा०)। ५
(५) ७,६ या ८ स्थान में बहुत पाप ग्रह क्र्रांशक में हों तो मूत्रकूच्छ रोग हां
(स० चि०) [| हि
(६) चन्द्रमा जलचर राशि में हो उसका स्वामी षष्ठ स्थान में हो उस पर जलचर राशि गत ग्रह की दृष्टि हो तो मृत्रकूच्छू हो (जा० पारि०) । प
प्रमेह--(१) पंचम स्थान में सूर्ये शनि शुक्र से युक्त हो या सूर्ये लर्न में, मंगल
३१४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
सप्तम या दशम मंगल शुक्र से युक्त या दृष्ट हो तो प्रमेह रोग हो (शंभु०) । (२) अष्टमेश अपने नवांश में होकर राहु के साथ अष्टम भाव से त्रिकोण में हो तो १८ या २२ वर्ष में प्रमेह आदि रोग या गठिया रोग हो (वृ० पा०) वीर्य विकार--लग्न में गुरु, सप्तम मंगल हो तो वीर्य विकार हो (जा० भ०) ।
उपदंश--(१) षष्ठ स्थान में शुक्र हो तो उपदंश रोग हो । (ज्यो० शा० ) 1 (२) चंद्र बुध और लग्नेश सूर्य युक्त राहु के साथ हो तो उपदंश हो यदि उप- रोक्त तीनों ग्रह सूयं के नवांश में हों दो भी वही फल हो (स० चि० )1 इन्द्रिय रोग--अष्टम में कई पाप ग्रह हों तो गुप्तांग में कई विकार हों (स०्चि०) (२) षष्ठेश बुध युक्त लग्न में हो तो शिश्न में रोग हो (स० चि०)। (३) चन्द्र ४८ या ११ राशि के नवांश में शनि युक्त हो तो भोग इन्द्रिय में रोग हो (स० चि०)।
४-छठे भाव में मंगल लग्नेश युक्त हो तो घाव से शिशन में रोग हो (जा. पारि.) । ५-शुक्र ७ या ८ घर में हो तो गुप्तांग में रोग हो ( फल० ) । ६~षष्ठेश शनि युक्त लय में हो तो किसी कठिन रोग से गुप्तेन्द्रिय में चीरफाड़ हो । शिशन कटे--१-षष्ठेश शनि युक्त लग्न में हो ओर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो शिश्न काटा जावे ( स० चि० ) | २-ष्ठेश बुध युक्त तया राहु युक्त लग्न में हो तो आप ही अपना लिंग कटा देवें ( स० चि० ) ।
३-यदि षष्ठेश मंगल सहित हो उस पर शुभ दृष्टि न हो तो किसी रोग से लिंग छेदन हो अर्थात् काटा जावे या लिग का रोग हो ( स० चि० ) । ४-सू्यं युक्त राशि लग्न में हो उस पर शुक्र या चन्द्र की दृष्टि हो और ' सूर्य ग्रहण लगता हो तो लिंग काटा जावे और वह अपयशी हो ( जा० ल॑० ) | नपुंसक--१-दशम में या अष्टम में शनि युक्त शुक्र हो शुभ दृष्टि रहित हो या शनि ६, १२ भाव में नीच का हो तो नपुंसक हो । २-विषम राशि में स्थित सूर्य, सम राशि में स्थित चंद्र हो परस्पर एक दूसरे पर दृष्टि हो।
३-विषम राशि में शनि, सम राशि में बुध हो, परस्पर दृष्टि हो । ४-विषम राशि में मंगल, सम राशि में सूर्य हो परस्पर दृष्टि हो । ५-विषम राशि में लग्न व चन्द्र दोनों हों ओर सम राशि में स्थित मंगल से दुष्ट हो।
६-विषम राशि में स्थित चन्द्र व बुध ये दोनों विषम राशि स्थित मंगल से दृष्ट हों ।
५-लग्न, शुक्र व चन्द्र ये तीनों पुरुष ग्रह राशि व नवांश में हों तो नपुंसक हो । “पाप ग्रह सप्तम स्थान में हों उन पर शुभ दृष्टि न हो तो नपुंसक हो । १-षष्ठेश ओर बुध राहु के साथ लग्नेश के सम्बन्धी हों तो नपुंसक हो ।
नीरोगता : ३१%.
१०-सप्तम में गुर के साथ राहु हो तो नपुंसक हो । ११-शुक्र से ६ या ८ स्थान में शनि हो तो नपुंसक नहीं होता किन्तु नपुंसक के समान होता है ।
अन्यमत--शुक्र से ६ या १२ स्थान में शनि हो तो उपरोक्त फल हो। इन्द्रिय सुख--यदि अष्टम भाव शुभ ग्रह युत या दृष्ट हो तो भोग इन्द्रिय के लिए बड़ा सुख होगा ।
विचार--फल कहते समय उस वात के कारक का भी विचार करना चाहिए । मान लो अष्टम में बुध और गुरु ये दो शुभ ग्रह हैं तो भोग इन्द्रिय स्वस्थ होगी परन्तु मान लो शुक्र मंगल और शनि सप्तम में है या चतुथं में है तो भोग इन्द्रिय रोगी होगी और उसका आचरण भी खराव होगा । गुप्त रोग--१-षष्ठेश वृश्चिक या ककं के नवांश में हो मंगल से दुष्ट हो तो भंग गुप्त रोग से पीड़ित रहे ( जा० सं० )1
२-चन्द्र वृश्चिक या ककं नवांश में पाप युक्त हो तो गुप्त रोग हो (वृ० जा०) । ३-गुरु छर्न से व्यय स्थान में हो तो ऐसा रोग हो जिसे वैद्य भी न जान सके ( जा० छं० ) ।
प्रगट रोग--१-शुक्र मंगल सप्तम हो उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो शरीर में बाहर से रोग प्रगट रहेगा ( वृ० जा० ) । अंड वृद्धि-१-अष्टम में मंगल युक्त शुक्र हो तो वायु विकार से अंडकोष की वृद्धि हो ।
२-मंगल की राशि में स्थित शुक्र व चन्द्र ये दोनों गुरु से दृष्ट हों तो वीयं व रक्त इन दोनों के मिश्रित विकार से अतिशय अंडकोष की वृद्धि हो ( जा० छं० ) | ३-राहु लनन में, गुलिक त्रिकोण में, मंगल ओर मांदि केन्द्र में हों तो बड़े अंडकोष हों ।
४-अष्टमेश का नवांश स्वामी राहु के साथ हो तो अंडवृद्धि हो ( स० चिं० ) । ४-तृतीय स्थान में शनि मंगल राहु हो पष्ठेश से दृष्ट हो ( जा० पारि० ) ।
६-छग्न में राहु मंगल या शनि के सांथ हो ( जा० पारि» )। ७-छग्नेश राहुं या गुलिक के साथ अष्टम में हो तो बड़े अंडकोष हों (जा पारि.)। ८-लग्नेश राहु या दुसरे पाप ग्रह युक्त अष्टम में हों तो अंड वृद्धि हो । यदि ग्रह बलवान् हो तो बुरा रोग हो, अशक्त हो तो साधारण रोग हो । अष्टम भाव गुप्तांग सूचक है ।
९-लग्नेश के नवांश स्वामी के साथ राहु आदि और मंगल हो तो अंड वृद्धि हो ।
यदि तीनों ग्रह साथ हों तो उपरोक्त फल होगा यदि उनमें एक ही ग्रह हो तो
कम फल होगा । १०-मंगळ राहु या राहु शनि के योग से अंड वृद्धि हो ( जा० पारि० ) | वृषण रोग--१-मीन लग्न में सूर्य हो मंगल से दृष्ट हो । या शुक्र घुक्त वृश्चिक