सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनीरोगता ४ ३०३
१६-लग्न में सूये मंगल से दृष्ट हो तो क्षय, दमा, प्लीहा या कोई गुदा का रोग हो ( स० चिं० )। ः
१७-चंद्रमा शनि युक्त हो सप्तम में २ पाप ग्रहों के बीच हो तो राजयक्ष्मा,
दमा, पीलिया आदि रोग हो ।
१८-सूर्यं चंद्र परस्पर एक दूसरे की राशि में या परस्पर अंश में हो तो क्षय और
शोष रोग हो ( शंभु० )। :
१९-या सूर्यं चंद्र एक ही राशि में हों तो भी उपरोक्त फल ( शंभु० ) ।
शोष (सूखा) रोग--१-सूर्ये और चन्द्र सिंह या ककं राशि में हों तो सुखा हो
(जा० पारि० ) ।
२-सूर्य चन्द्र परस्पर एक दुसरे के नवांश में हों ( वु० जा० ) ।
३-चन्द्रमा पाप ग्रहों के मध्य हो शनि सप्तम हो ( जा० पारि० )।
हृदय रोग--१-वृष, ककं, का चन्द्र पाप एवं शत्रु युक्त होवे ।
२-या चन्द्रमा मंगल अस्तंगत, पाप युक्त और शुद्ध हीन हो तो हृदय में शूल रहे ।
३-उपरोक्त चन्द्रमा मंगल सप्तम स्थान में हों तो भी उपरोक्त फंछ हो ।
४-चतुर्थ (हृदय स्थान) में षष्ठेश सूर्य बली हो कूर ग्रह से युक्त हो तो हृदय
रोग हो ( जा० ल॑०) ।
५-शनि व गुरु षष्ठेश होकर लग्न से चतुर्थ में क्रूर ग्रह युक्त हों तो हृदय रोग
हो ( जा० छं० )।
६-वही शनि व गुरु क्रूर ग्रहों से पीड़ित अर्थात् दृष्ट हों तो हृदय रोग ओर देह
कंप भी हो ।
७-चतुर्थ में मंगल शनि व गुरु हों कूर ग्रहों से दुष्ट हों तो हृदय रोग हो ओर
हृदय क्लेश कारक घाव हो ( जा० लं० ) ।
८-पंचम में पाप ग्रह हो ओर पंचमेश दो पाप ग्रहों के बीच हो पाप ग्रह से दृष्ट
हो तो हृदय रोग हो ( स० चिं० ) ।
९-पष्ठेश सूयं के नवांश में हो तो हृदय रोग हो ( जा० सं० ) ।
१०-चतुर्थ भाव में पाप ग्रह हो चतुर्थश पाप युक्त पाप मध्य में हो तो हृदय रोग
हो ( स० चिं० ) 1 ड
११-चतुर्थं भावेश जिसके नवांशक में हो उसका स्वामी क्रूर पष्ठयंश में हो कूर
अह से दृष्ट हो तो हृदय में शूल आदि रोग हो (स० चिं० ) 1
१२-चतुर्थेश व्यय भाव में व्यय भावेश युक्त हो या नीच, शत्रु गुही, अस्तंगत
होवे तो हृदय में रोग हो ( स० चिं० ) ।
१३-राहु चतुर्थं में हो और लग्नेश पाप दुष्ट और बलहीन हो तो हृदय शूल रोग
हो ( जा० पारि० )। - क छ १४-लग्नेश शत्रु गृह में व नीच राशि में हो, मंगळ चोथे घर में हो, शनि यदि
याप ग्रहों से दृष्ट हो तो शूल रोग हो ( जा० पारि० ) । -