सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 312, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें३०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
रोग हो ( स० चि० ) २-बुध से युक्त मंगल षष्ठ स्थान में क्रूरांशक में हो उस पर
शुक्र और चंद्र की दृष्टि हो तो कफ रोग हो ( जा० पारि० ) ।
वात कफ--१-बुध सप्तम हो तो वात-कफ रोग हो ( जा० पारि० ) २-लग्न में
चंद्र व शनि एकत्र हो या अन्यत्र चंद्र पर शनि की पूर्ण दृष्टि हो तो वात कफ अर्थात्
खांसी दमा आदि हो ।
क्षय रोग--१-बुध और मंगल षष्ठ में हों इन पर चंद्र और शुक्र की दृष्टि हो .
ओर बुध नवांश में हो तो क्षय रोग हों ग्रह की धातु के अनुसार या नवाँशेष के
अनुसार रोग होता है । गुरु की दृष्टि हो तो बुरा प्रभाव दूर हो जाता है (स० चि०) ।
२-यदि गुरु षष्ठ या अष्टम भाव में हो तो क्षय रोग हो ( फल० ) ।
इ-चंद्र मा पाप ग्रहों के मध्य में हो ओर शनि सप्तम हो तो क्षय और गुल्म रोग
हो । श्वास, प्लीहा गुल्म रोग आदि हो ( जा० सं० ) ।
४-क्षीण चंद्र किसी जल राशि में पाप ग्रहों के साथ हा तो क्षय रोग या जल से
सम्बन्ध रखने वाले रोग हों ( फल० ) ! ;
५-बुध और मंगल साथ अष्टम स्थान में हों, चंद्र और शुक्र से दृष्ट हों और कोई
बुरे अंश में हो तो क्षय हो ( स० चि० )।
६-यदि शनि और मंगल षष्ठ भाव में हो सूर्य और राहु से दृष्ट हो और शुक्र
युक्त दृष्ट न हो तो क्षय और कास रोग से पीड़ित रहे ( स० चि० ) ।
७-बुध और मंगल षष्ट में क्रूर नवांशक में हो और शुक्र और चंद्र से दृष्ट हों तो
क्षय हो ( स० चि० ) ।
८-शनि और गुमिक दोनों छठे घर में सूयं मंगल और राहु से दृष्ट हों शुभ ग्रहों से युक्त दृष्ट न हों तो क्षय, श्वास कास आदि रोग हो ( स० चिं० ) । ९-चंद्रमा शनि युक्त हो मंगल से दृष्ट हो और चंद्र पर परिवेश भी हो तो क्षय हो ( वृ० जा० ) । द १०--चंद्रमा मंगळ युक्त हो लग्नेश से दृष्ट हो तो क्षय रोगी हो और उल्टी बुद्धि वाला हो ( शंभु० ) ।
११-सूर्य ११ भाव में शनि ५ भाव में, और पाप ग्रह अष्टम में हो तो क्षय रोग हो ( शंभु० ) । १२-लग्नरमें या ४, ८ भाव में सूर्य हो और दशम में शनि मंगल हो तो क्षय हो ( शंभु० )।
१३--चंद्र यदि सूर्य मंडल में अमावस्या के संधि में हो शनि से युक्त हो उस पर मंगळ की दृष्टि हो तो क्षय रोग हो और बुरा बोलने वाला हो ( प्रा० यो० ) ! 1४-पष्ठ भाव में राहु, केन्द्र में शनि, अष्टम में लग्नेश हो तो २६ वर्ष में क्षय हो ( वृ० पा० )।
1५-चंद्रमा पाप ग्रहों के बीच हो और सूर्य मकर का हो या शनि सप्तम हो तो क्षय, श्वास, प्लीहा विद्रधि रोग हो ( शंभु० ) ।