सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 311, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीरीगता : २०१
४--निबँल सूर्ये अष्टम में हो मंगल निर्बेल हो, पाप ग्रह द्वितीय भाव में हो ( जा० पारि० ) ।
५-सर्ये षष्ठ में. पाप ग्रह युक्त हो जिस पर पाप दृष्टि हो । अग्नि दग्ध या पित्त रोग--६-लग्न में सूर्य या मंगळ में कोई लग्नेश होकर बैठा हो वह पित्त से पीडित हो तथा अग्नि से दग्ध हो ( शंभु० ) । ७--षष्ठेश शुक्र शनि मंगल सेः पूर्ण दृष्ट हो तो पित्त रोग हो पूर्ण या पाप दृष्टि
के अनुसार विचारना ( शंभु० ) ।
वात विकार--१--गुरु लग्न में हो ओर शनि सप्तम में हो तो वात विकार हो ( जा० सं० ) ।
२--द्वितीय भाव में शनि हो पाप दृष्टि हो ( स० चि० ) ।
३--शनि तीसरे भाव में गुलिक युक्त हो और शुभ दुष्ट न हो ।
४--तृतीय जहाँ है उसका स्वामी अष्टम में हो ।
५--छ्ठे स्थान में चन्द्र क्रूर दृष्ट क्रूर नवांश गत हो ।
६--शनि तीसरे भाव में षष्ठ्यंश में शुभ दृष्टि रहित हो ।
७--१ और ६ के स्वामी शनि युक्त हों ( स० चि० ) ।
८--७,९ या ५ भाव में मंगल हो शनि लग्न में हो ।
९ क्षीण चन्द्र ओर शनि बारह बैठ हों तो बात रोग हो ( जा० भ० ) ।
१०-छग्न पाप युक्त हो लग्नेश भी पाप ग्रह युक्त हो तो अति दुष्ट कष्ट और
बात से पीडित रहे ( जा० सं० ) ।
१०-शनि की महादशा में केतु का अन्तर हो तो बात पित्त रोग हो नीच जाति
से झगड़ा व परदेश गमन हो ।
११-छठे स्थान में बुध क्रूर दृष्ट क्रूरांश गत हो तो श्लेष्म तथा बात रोग से
पीड़ित रहे ( सर्वे चि० ) ।
१२--७,९ या १ भाव में मंगल शनि व चन्द्र हो तो वात रोग हो (जा० भ०) ।
१३--५,९,७ भाव में कहीं मंगल हो । या लग्न में सूर्य और क्षीण चन्द्र तथा
शनि व्यय में हो तो वायु रोग की अधिकता रहे ( शंभु० ) ।
१४- लग्नेश लग्न में, शनि षष्ठ हो तो ४९ वर्ष में बात रोग हो ( वृ० पा० ) ।
१५--गुरु ओर द्वितीयेश निबंल हो तो बात व्याधि हो ( जा० पारि० )।
१६--शनि पाप युक्त द्वितीयेश युक्त भी हो।
वात पीड़ा--१७--छग्न में पाप युक्त चंद्रमा पाप दुष्ट हो । (शंभु०) १८-ककं
के सूर्य पर शनि की दृष्टि हो । वात रोग शनि के दोष से उत्पन्न होता है बिशेष पर ४-१० राशि के शनि के दोष से। १९--चतुर्थ में शनि हो तो वात पीड़ा (शंभु०) ।
वात रक्त---१-दशम में मंगल हो ठस पर शनि की दृष्टि हो तो वात रोग हो ।
स्नाग्र रोग--१-६ या ८ स्थान में शनि हो तो स्नायु रोग हो ( फल० ) ।
इलेष्म--१-यदि बुध षष्ठ में पाप ग्रहों से दृष्ट ओर क्र नवांश में हो तो कफ