भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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नीरोंगता : ३१३

(४) यदि ये पाप ग्रह बुरी स्थिति में हैं और लग्नेश निर्बल हो. तो ये चोट के

निशान बड़े भारी होंगे जिससे स्थाई चोट या कुरूपता हो .।

(५) यदि लग्नेश अच्छे साथी युक्त, उच्च में या शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो

चोट साधारण एवं अल्प होगी नाम मात्र को सिर में चोट का चिन्ह होगा। |

ग्रहों का बलाबल और अच्छा बुरा प्रभाव विचार कर फल कहना (स०चि०) ।

माता-पिता आदि के भी व्रण विचार--उपरोक्त योगों में जिस प्रकार जातक

को ब्रण होना बताया है उसी प्रकार माता-पिता पुत्र आदि को उनके भाव को लग्न

भाव मानकर विचारने से उनके ब्रण का भी फल प्रगट होगा । जेसे--

(४५) षष्ठेश पाप युक्त लग्न या अष्टम में हो तो शरीर में घाव हो । चतुर्थ

भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर चतुर्थ या चतुर्थ से अष्टम में हो-माता की

देह में व्रण ।

दशम भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर दशम या दशम से अष्टम में हो-

पिता को ब्रण ।

पंचम भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर पंचम या पंचम से अष्टम में हो- .

पुत्र को ब्रण ।

सप्तम भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर सप्तम या सप्तम से अष्टम में

हो-स्त्री को व्रण ।

तीसरे भाव से छठे का स्वामी पाप युक्त होकर तीसरे या तीसरे से अष्टम में

हो-भाई को ब्रण ।

इत्यादि प्रकार से सबके सम्बंध में इस योग का विचार उपरोक्त प्रकार से कर

सकते हैं ।

गंड माला-(१) ६,८ भाव में मंगल शनि साथ हों उस पर शुभ दृष्टि न हो तो

गंड माला फोड़ा आदि रोग हो (शंभू) ।

मूत्र रोग-सप्तम में शनि व राहु हो तो मूत्र रोग हो ।

मूत्र कच्छ-(१) षष्ठ में जल राशि हो उसमें चन्द्र हो।

(२) या षष्ठेश जल राशि में हो और उस पर बुध की दृष्टि हो (स० चि० )।

(३) सप्तम में मंगळ पाप युवत या दृष्ट हो तो मूत्र कुच्छु रोग हो और पुरुषत्व

से हीन हो (शंभु०) । र

(४) षष्ठेश पाप युक्त नवम में हो या बष्ठेश व्ययेश युक्त कहीं हो पर शनि

दृष्ट हो तो मूत्रक्ृच्छू रोग हो (ज्यो० शा०)। ५

(५) ७,६ या ८ स्थान में बहुत पाप ग्रह क्र्रांशक में हों तो मूत्रकूच्छ रोग हां

(स० चि०) [| हि

(६) चन्द्रमा जलचर राशि में हो उसका स्वामी षष्ठ स्थान में हो उस पर जल￾चर राशि गत ग्रह की दृष्टि हो तो मृत्रकूच्छू हो (जा० पारि०) । प

प्रमेह--(१) पंचम स्थान में सूर्ये शनि शुक्र से युक्त हो या सूर्ये लर्न में, मंगल