सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 308, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें२९८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
( ४ ) लग्नेश षष्ठेश--बुध गुक्त--पित्त के प्रमाद से भय ।
( ५ ) लग्नेश षष्ठेश--गुरुयुक्त--व्याधि रहित । ८
( ६ ) लग्नेश षष्ठेश--शुक्र युक्त--स्त्री मरण हो ।
(७ ) लग्नेश षष्ठेश- शनि युक्त-*अधो वायु का रोग ।
( ८ ) लग्नेश पष्ठेश--राहु केतु युक्त--सर्प की पीड़ा या चोर आदि का भय ।
( ९ ) लग्नेश षष्ठेश--त्रिकोण में राहु केतु युक्त--निगल रोग ( जा० पारि० )।
द्वादश भाव के अनुसार शरीर की पीड़ा का स्थान
प्रथम भाव--मुख, दांत, दाढ, गला, जीव, मस्तक ।
द्वितीय भाव--दाहिना नेत्र ।
तृतीय भाव--दाहिना कान, गर्दन, हाथ ।
चतुर्थ भाव--पेट कंधा ।
पंचम भाव--कमर के ऊपर का भाग, जंघा ।
षष्ठ भाव--गुप्तस्थान, दाहिना पाँव ।
सप्तम भाव-- पेट का मध्य भाग, नाभि ।
अष्टम भाव--गुप्त स्थान, बांया पाँव ।
नवम भाव--कमर के ऊपर का भाग ।
दशम भाव--कमर के ऊपर का भाग ।
लाभ भाव--वायाँ हाथ, कान, गर्दन ।
व्यय भांव--बांई आँख, पैर का तलवा ।
(१ ) इन भावों में यदि पाप ग्रह हो या पाप ग्रह की युति प्रतियुति योग और दृष्टि हो तो शरीर के उन्हीं भागों में अपनी कुण्डली के अनुसार रोग या पीड़ा होगी ।
( २ ) गोचर में पाप ग्रह २, ६, ८, १२ घर में हों या ग्रहों का इन स्थानों से
योगदृष्टि के द्वारा सम्बन्ध हो तो उनग्रहों की दशा या अन्तर्दशा में रोग निश्चय होगा । ( ३ ) कुण्डली में चंद्र ४७-१२ या ४,८-१२ में गोचर में हो तो रोगी को लाभ: होने की आशा नहीं रहती ।
( ४ ) कुंडली में लग्न-वैद्य । चतुर्थ भाव-औषधि । षष्ट भाव-रोग । दशम भाव जरोग साध्य होगा या असाध्य इसका ज्ञान होता है । ( ५ ) जब कुंडली में अनिष्ट कारक योग हो वह ग्रह जितने अंश में हो उतने अंश का हो ओर जब गोचर के पाप ग्रह से दृष्टि या दोष द्वारा सम्बन्ध स्थापित करे तब रोग होना सम्भव है ।
नक्षत्र अनुसार रोग की पीड़ा"
इन नक्षत्रों में रोग हो तो कितने दिनतक उस रोग की पीड़ा रहेगी यहाँ
4 अश्विनी में रोग हो--१, ९ या २५ दिन पीड़ा । ९ भरणी में रोग हो--११ या २१ दिन या १ मास या मृत्यु ।