सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 317, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीरोगता : ३०७
३--चन्द्र ५,१०,४,१२ राशि के नवांश में हो और शनि और मंगल से युक्त या
दृष्ट हो तो कोढ़ हो ( स० चि० )1
४---चन्द्रमा १,१०,४,१२ राशि के नवांश में शनि मंगल से युक्त या दृष्ट हो तो
कुष्ठ हो ( शंभु० ) यदि शुभ ग्रह को दृष्टि हो तो कुष्ठ न होकर अंड वृद्धि, व्रण,
बवासीर, भगन्दर आदि हो ।
५- चन्द्रमा पाप ग्रह के बीच के नवांश में हो तो कुष्ट हो ( शंभु० ) ।
६- सप्तम में बुध तथा शनि हो । र
७--चन्द्र के घर का बुध हो तो कुष्ठ या क्षय रोग हो ( मौन० ) ।
८--लग्न में मंगल, अष्टम में सूर्य, चतुर्थ में शनि हो तो कुष्ठ हो ( मान० )।
९--मंगल या बुध लग्नेश होकर चन्द्र राहु या शनि से युक्त हो तो कुष्ठ हो
( बृ० पा० ) ।
१०--धन राशि में और घन नवांशक में या पाँचवें/नवांश में चन्द्र हो शनि या
मंगल से युक्त या दृष्ट हो तो कुष्ठ हो ।
११--८,४,१० राशि त्रिकोण या लग्न में हो और पाप ग्रह से वह राशि दुष्ट
हो तो कोढ़ हो ( प्रा० यो० ) ।
१२---चन्द्रमा मंगल शनि और शुक्र जळ राशियों में पाप पीड़ित हो तो छूता
संज्ञक कुष्ठ हो ( शंभु० ) ।
१३--चतुर्थ में चन्द्र सहित राहु मंगळ दोनों हों तो २५ वर्ष में मंडल कुष्ठ
होवे ( जा० सं० )।
१४---४,५,१२ राशि कूर ग्रह युक्त हो तो अवलताकार कुष्ठ हो शरीर में मकड़ी
के समान फतकता हुआ क्लेश कारक कुष्ठ हो ( जा० लं० )।
१५---चन्द्रमा मंगल युक्त हो तो कुष्ट, ` भगन्दर, बवासीर, खुजली आदि रोगों
से पीड़ित रहे ( शंभु० ) ।
१६--शनि या मंगल से युक्त चन्द्र ४,१२,१० राशि के नवांश में हो शुभ योग
दृष्टि न हो तो कुष्ठ हो ( जा० पारि० ) ।
१७--पाप ग्रह नीच के हों उन पर पाप ग्रह की दष्टि हो या वे पाप ग्रह के
नवांश में होकर पंचम घर में हों तो कोढ़, रक्तपित्त आदि रोग हो ( प्राश यो० ) ।
१६--२,४,८,१० राशि में कोई राशि त्रिकोण में और लग्न में भी हो या पंचम
नवम से एक स्थान में और लग्न में हो वह राशि पाप युक्त या दृष्ट हो तो कुष्ठी हो
( वृ० जा० ) ।
१९--षष्ठ भाव में गुरु हो गुरु की राशि में चन्दर हो तो १९ या २२ वर्ष में
कुष्ठ हो ( बु» पा० ) ।
२०--चंद्र, बुध, लग्नेश, राहु या केतु के छठे घर में हो तो कमळ कुष्ठ हो ।
२१--छमग्नेश को छोड़कर उक्त ग्रह रन में हों तो कुष्ट हो ( स० चि० ) ।
इसी प्रकार इतरजनों का विचार--भाव कारक और भावेश से भी इसी प्रकार