सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 318, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें३०८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
मित्र आदि भावों में हो तो स्थिर से उत्पन्न कुष्ठ ग्रह के उक्त स्थान में अवश्य होगा
( स० चिं० ) ||
श्वेत कुष्ठ--चन्द्रमा लग्नेश न हो और लग्न में राहु युक्त हो ।
कष्ण कुष्ठ--चन्द्रमा लग्नेश न हो और लग्न में शनि युक्त हो ।
रक्त कुष्ठ--चन्द्रमा लग्नेश न हो ओर लग्न में मंगल युक्त हो ।(वृ० पा०)
कुष्ठ--लग्नेश को छोड़कर अन्य पाप ग्रह लग्न में हों ।
नील कुष्ठ--लग्नेश को छोड़कर अन्य शनि ग्रह लग्न में हों ।
रक्त कुष्ठ--छग्नेश को छोड़कर अन्य सूर्य ग्रह लग्न में हों । (जा० पारि०)
एवेत कुष्ठ--लग्नेश को छोड़कर अन्य मंगल ग्रह लग्न में हों ।
विचार--उपरोक्त योगों में चन्द्र पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो कुष्ठी न होगा किन्तु खाज, दाद, खुजली आदि चमं रोग होंगे ।
दब्रु--१-सप्तम में सूर्य बुध चन्द्र हो शेष ग्रह चतुथं में हो तो दद्रु ( दाद ) रोग हो ( जा? सं० ) ।
२--चन्द्रमा स्निग्ध राशि का सप्तम में हो, चौथे नवांशक स्थित शनि से दृष्ट हो तो दाद रोग से पीड़ित रहे ( शंभु० ) ।
३--जछचर राशि स्थित चन्द्र लग्न से दूसरे स्थान में हो या शनि युक्त हो या लग्न में सूर्य हो तो दाद रोग हो ( जलचर, कर्क, मकर पराद्धे और मीन राशि ) ( जा० लं० )।
खजुली--१-मीन या मेष के नवांश में चन्द्र शुभ ग्रह से दुष्ट हो (जा० सं०) । २--जलचर राशि में चन्द्र पाप युक्त हो शनि से दृष्ट हो ( शंभु० ) । ३--तृतीय भाव में मंगळ शनि बली हों तो खजूली आदि हो ( जा० पारि० )1 रक्त रोग--१--चन्द्र बुध और लग्नेश सूर्य युक्त हो तो रक्त का रोग हो ( स० चि०)।
२--मंगल १, १२, ६,७ भाव में शनि युक्त सूर्य से दुष्ट या अस्तंगत, शत्रु गुही हो तो रुधिर का रोग हो ( स० चिं० )।
३--छठे स्थान में मंगल या शनि हो । मंगल हो तो रक्तविकार से शनि होतो अन्य विकार से रोग हो ( शंभु० ) ।
४--सप्तम में पाप युक्त सूर्य हो तो रुधिर विकार एवं वातोदर से पीड़ा हो ( शंभु० ) ।
५--लग्न में शनि, मंगल राहु और सूर्य हो तो उसे रक्त दोष हो और संताप हो ( लू० चं० ) ॥
६--चन्द्रमा ६ या ८ भाव में हो मंगल से दृष्ट हो लग्न में शनि हो तो रक्त रोग हो ( जा० पारि० ) ।
७--षष्ठेश ८ या ४ राशि के नवांश में हो शनि से दृष्ट हो तो रुधिर ओर पवन विकार पीड़ित हो ( जा० सं० ) ।