सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीरोगता : ३०९
८--राहु, मंगल, सूर्य से युक्त शनि हो शुभ दृष्टि न हो तो रुधिर ताप करने वाला हो ( जा० सं० )। र
रक्त पित्त--१--मंगल सप्तम में हो तो रक्त पित्त रोग हो ( जा० पोरि० )।
२--छठे स्थान में मंगल, षष्ठेश पाप युक्त या दृष्ट हो तो रक्तपित्त पीड़ा हो ( स० चिं० ) । क
३--छठे स्थान में मंगल क्रूर नवांश में पाप दृष्ट हो तो रक्तपित्त व्याधि हो
{ स० चिं० )। 2
(४) चन्द्र के क्षेत्र में मंगल हो तो रक्त के निमित्त से हीनांग ऑर नाना प्रकार
की व्याधि से युक्त हो ( मान० ) । व
ब्रण या चिह्ल--१--पाप ग्रह अष्टम हो तो व्रण युक्त या चोट लगने के दाग या
किसी प्रकार का चिह्न उसके गुह्मस्थान में होवे तथा बांई कमर में घाव व लांछत
हो ( शंभू ) ।
शरीर में घाव--२-लग्नेश और अष्टमेश दोनों शनि, राहु या केतु से यृक्त हो
तो उनमें जो बलवान् हो उसकी दशा में शरीर में घाव होवे ( जा० ल॑० )1
३--चतुर्थ में मंगल हो तो व्रण पीड़ित या अग्नि से दग्ध हो ( शंभु० ) ।
४--पंचम मंगल हो तो अग्नि व शस्त्र से पीड़ा हो संतान बराबर मरती रहे
मनुष्य दुखित हो ( शंभु० ) ।
५--लाभ में राहु शनि हो तो तद् भावोक्त अंग में काष्ठ या पत्थर की चोट हो
या मनुष्य व्यथा युक्त रहे ( शंभु० ) ।
६-शनि युक्त चंद्र १-२ या ३ राशि में हो तो पक्षियों से स्थूल घाव हो (जा.सं.) ।
७--षष्ठेश मंगल युक्त हो तो रुधिर और शस्त्र से संतप्त देह पत्थर तथा पृथ्वी
और पवन इनके प्रहार से युक्त करता है । भूख से संतप्त, देशाटन करने में राजदर्शन
से युक्त हो । ( जा० सं० ) ।
८--लग्नेश, षष्ठेश, और चंद्र एक साथ हो मंगल भी साथ हो तो चेचक, घाव,
फोड़ा या युद्ध में शारीरिक क्लेश हो ।
९- षष्ठ में पाप ग्रह युक्त या दृष्ट हो तो ब्रणादि हो शारीरिक या मानसि
कष्ट, शत्रु, भय, मिथ्या अपवाद हो ।
१०- छठे स्थान में मंगल या सूर्य हो तो शस्त्र से चोट व्रण या प्रमेह या अग्नि
विष से उत्पन्न पीड़ा हो या हड्डी टूटने से पीड़ा हो । या रुधिर से उत्पन्न अति पीड़ा
या स्त्री के जंघा में या दाहिने पैर में चिह्न हो ( शंभु० ) ।
११- बुध के स्थान में सूर्य हो उस पर गुरु की दृष्टि हो तो शस्त्र की चोट से
शरीर विदीर्ण हो ।
१२-लग्नेश मंगल के साथ त्रिक में हो तो शस्त्र से घाव या व्रण या गठिया
वात हो ।
१३--लग्नेश बुध के घर में हो बुध से युक्त या दृष्ट हो तो गुह्य स्थान में ब्रण
हो ( जा० पारि० ) ।
घाव--१४--व्यय में शुक्र युक्त राहु हो तो अति घाव हो ( जा० सं० )।
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