भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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पृष्ठ 320

३१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

१५-छग्न में मंगल हो सूर्य शनि से दृष्ट हो तो शस्त्र की चोट लगे (स० चि ०) ।

१६--कर्क लग्न में मंगल हो तो शस्त्र से चोट लगे ( जो० वगं० ) ।

१७--तीसरे भाव में शनि हो क्रूर दृष्ट हो तो बाहु में चिल्ल या शस्त्राघात हो ।

या छोटे भाई को पित्त से उत्पन्न गंड माला हो ( शंभुर ) ।

१८-मंगर अष्टम में पाप ग्रह से दृष्ट हो, केतु २ या ८ भाव में हो तो ब्रण या घाव हो ( जा० पारि० )।

१९--सूर्ये व मंगल दशम में हो तो पीठ की हड्डी के समीप या जांघ की जड़ में शस्त्र की चोट या अग्निदाह से ब्रण या दाग हो ( शंभु० ) ।

२०--चतुर्थ भाव पाप युक्त हो तो तीखी चोट कंधा या कुक्षि या हृदय में छगे।

२१--सूर्यं मंगल चतुर्थ में दशमेश से युक्त या दृष्ट हो या चतुर्थेश से युक्त या दृष्ट हो तो पत्थर.की चोट लगे ।

२२---चतुर्थेश शत्रु शनि से युक्त मंगल से दृष्ट हो शुभ दृष्टि न हो तो पत्थरों से पीड़ित हो ( स० चि० ) ।

२३--चतुर्थेश सूर्यं या शनि से युक्त मंगल से दृष्ट हो शुभ दृष्टि न हो तो पत्थर की चोट लगे । ः

(२४) सप्तमेश शनि हो, चतुर्थ में मंगल और शनि हो दशमेश से युक्त या दृष्ट हो तो पत्थर की चोट से मारा जावे या चट्टान से चोट लगे (स० चि० )। (२५) शुक्र की राशि का गुरु तीसरे भाव में हो कोई पाप ग्रह वक्री हो तो ११ वर्षे में पत्थर का प्रहार होवे (जा० सं०) ।

(२६) व्यय भाव में मंगल हो तो दाहिने और बायें भाग संबधी कमर में घाव हो, वाये नेत्र और बायें कर्ण में रोग हो खोटे कमं से ब्रण आदि भय हो । स्त्री की अधिक अंगता होवे (जा० सं०) । (२७) हितीय स्थान में पाप ग्रह हो तो मुख नेत्र या दक्षिण कंधे में या कर्ण में व्रण घाव या और कोई प्रहार हो (जा० सं०) ।

(२८) षष्ठेश क्रूर ग्रह होकर लग्न या अष्टम में हो तो शरीर में विस्फोट (ब्रण) आदि का चिल्ल हो (० चि०)।

(२९) ऐसा ही दशम स्थान में पाप युक्त षष्ठेश हो पाप ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो अंत में व्रण हो (स चि०) ।

ब्रण इतर लोगों को--(३०) ऐसा ही विचार मित्र आदि सभी भाव से करना अर्थात्‌ पिता आदि के लिए उसका घर उसका स्वामी और उसका कारक देखो । फिर यहाँ दिये हुए योग का विचार करो । भावेश भाव कारक ग्रह के दृष्टि योग से तथा बलाबल के अनुसार मित्र आदिको को भी व्रण कहना ।

ब्रण--(३१) छठे स्थान में सूर्य हो, षष्ठेश पाप युक्त या दृष्ट हो तो नाभि स्थान में पित्त विकार से ब्रण हो (स० चि)।