सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंनीरोगता : ३११
. (३२ ॥ चन्द्र छर्न में हो सूर्य मंगछ दोनों सप्तम में हों तो फोड़ा आदि से कष्ट हो (जा० सं०) । (३३) गुरु अशुभ ग्रह की राशि में हो शुक्र शुभ ग्रह की राशि में हो तो ७ वर्ष में ब्रण हो (जा० सं०) ।
(३४) व्यय में सूर्य हो तो राज पुत्र और चोरों से धन हरण हो उसके चरण में चिह्न हो लाठी के प्रहार से चोट हो (जा० सं०) ।
(३५) दशम में राहु या शनि हो तो वायु दोष से पीडित रहे ऐसे योग में माता- पिता आदि के पूर्वोक्त स्थान में श्याम रंग का चिह्न (लाखन) होगा । माता पिता का वह एक ही पुत्र हो यदि दूसरे भाई भी हों तो बह अपुत्र या मृत पुत्र, रोग से पीडित, पत्थर काष्ठ की चोट से, जल में डूबने से, वृक्ष से गिरने से या
चौपाये से पीड़ा युक्त चोट हो (शंभु) ।
(३६) पष्ठेश ६, २ या ८ भाव में हो तो शरीर में ब्रण हो (वृ० पा०) ।
षष्ठ भाव में जो राशि हो उसके आश्रित बंग में व्रण हो इसी प्रकार पिता आदि
(दशम स्थानोदि) के स्वामी पष्ठेश युक्त ६, ८ भाव में हों तो पिता आदि सम्बन्धियों
के व्रण कहना (वृ० पा०) । ;
(३७) लग्नेश मंगल की या बुध की राशि में किसी भाव में हो बुध से दृष्ट हो
तो मुख में व्रण हो (वृ० पा०) । ८ ४
(३८) षष्ठेश राहु या केतु युवत लग्न में हो तो शरीर में ब्रण हो (जा० पारि०)।
(३९) वृश्चिक लग्न में मंगल गुरु शुक्र से अदृष्ट हो तो फुन्सी घाव युक्त होवे (शंभु०) । (४०) चतुर्थ भाव में शनि, मंगल के नवांश का हो और केतु युक्त हो तो उपरोक्त फल हो (शंभु) ।
ब्रण--(४१) शनि मंगल के साथ ६,७,१२ भाव में कहीं हो तो भी उपरोक्त फल हो (शभु०) । ८ (४२) षष्ठेश सूर्य पाप युक्त नवम भाव में हो, छठे शुभ ग्रह और शनि मंगल गुरु
हो तो वह पापी हो, कृष्ण रंग के विरूप व्रण हों। ऐसे ही विकृत पैर भी होंवें (शंभु) ।
(४३) ६ या ८ घर में मंगल या केतु हो तो व्रण हो (लल०) । ; (४४) ६ या ८ घर में राहु और मंगल की दृष्टि हो तो पीठ का फोड़ा (दार
बन्द) हो (फल०) ।
(४५) षष्ठेश पाप युक्त लग्न या अष्टम में हो तो ब्रण (जा० सं०) । ः रे
(४६) षष्ठेश बुध से युक्त या दृष्ट हो तो गिरने या लोह प्रहार से अंग विदीर्ण
|, 'जा० स०) । ८ दो न सी होतो i पत्थर या चौपायों से चोट पहुँचे (जा०सं०)।
(४८) षष्ठेश चन्द्रमा मंगल युक्त हो तो शस्त्र प्रहार तथा अग्नि रोग या अग्नि
दाह से संतप्त देह हो (जा० सं०) ।