सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें३२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
६-तीसरे भाव में मंगल पाप ग्रह से दृष्ट हो ते गले में पित्त से राग हो और
भुजा में घाव से चिह्नित हा (जा० सं०) ।
७-तृतीय भाव में शत्रु ग्रह युक्त पाप ग्रह हो तो गले में बात प्रकोप हो, भुजा
में व्यया और जुआड़ी हो.। ग्रहों के बलाबल विचार कर कहे ( जा० सं० ) ।
८-राहु और द्वितीयेश दोनों तृतीयेश से युक्त हो तो गला में कष्ट हो (जा.पा.)
९-तीसरे भाव में नीच का ग्रह शत्रु गृही या अस्त हो पाप ग्रह से दृष्ट हो तो
विष प्रयोग से या विष खाने से गले में रोग हो इस के अभाव में धन का नाश हो
( जा० पारि० ) ! : रमणीक कंठ-तृतीय घर बली हो या गुरु और बुध से युक्त या दृष्ट हो या तीसरे
भाव के केन्द्र में गुरु या बुध हो तो रमणीक कंठ स्वर हो' ( जा० पारि० )।
मुख रोग १-द्वितीय भाव में शुभ या पाप ग्रह शत्रुगृही या शत्रु ग्रह युक्त हो तो
मुख रोग हो ( शंभु० ) ।
२-द्वितीय भाव में मंगल हो तो सूयं से दृष्ट हो तो मुंह मे स्पशं रोग हो ।
( जा० पारि० ) |
३-१, २, ७ या ८ भाव में सूर्यं या मंगल हो इन्हीं दोनों मे से एक दूसरे को
देखते हों तो मुख में आज्य स्पशे रोग, अग्नि भय, मसूरिका रोग हो ( जा०पारि०)।
४-गुरु या शुक्र दोनों में से कोई षष्ठेश होकर लग्न में हो और कूर ग्रहों से दृष्ट हो तो मुख में सूजन हो ( जो० लं० )।
५-बुध, राहु था केतु के साथ द्वितीयेश छठे घर में हो या जहाँ राहु है उस
राशि का स्वामी द्वितीयेश के सांथ हो तो तालु, जबड़ा या मुख में रोग हो । राहु जहाँ
है उसके स्वामी को दशा में जब उनमें से किसी ग्रह की अंतर्दशा हो तब रोग होगा ।
(स० चि० )।
दुमुख १-धन स्थान ( मुख स्थान ) में पाप ग्रह हो तो दुमुंख हो ।
२-धन भाव गत पाप ग्रह को पाप ग्रह की दृष्टि हो तो क्रोधान्दित मुखवाला हो |
( जा० पारि० ) ।
सुन्दर मुख१-धन भाव में शुभ ग्रह यदि उच्चादि वर्ग मे हो तो सुन्दर मुख हो । ( जा० पारि० ) । र
२-धनेश उच्च में या अपने मित्र के वर्ग में हो शुभ ग्रह से दृष्ट हो तो सुमुख होगा ।
३-घनेश केन्द्र में हो तो हँस मुख सौंदर्य युक्त हो ( जा० पारि० )1 दंत रोग १-द्वितीयेश राहु छठे भाव में हो या राहु जिस राशि में हो उसके स्वामी से युक्त हो तो उसकी दशा अंतर्दशा में दातों का रोग हो दांत गिर जार्वे । द्वितीयेश, षष्ठेश या राहु की दशा अंतदंशा में हो ।
२-षष्ठेश द्वितीयेश से युक्त जिस भाव में हो उसका स्वामी जिसके नवांश में हो वह पष्ठेश से युक्त होवे तो दांत रोग हो या दांत गिर जावे ( स० चि० )।