भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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३२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

विचारना । उनके भाव को लग्न मान कर योग का विचार करना ।

९--यदि द्वितीयेश गुरु के साथ ८या १२ स्थान में हो तो गूँगा हो (स० चि०) ।

यहाँ यह शंका होती है कि ८ स्थान में गुरु और द्वितीयंश होने से द्वितीय स्थान पर

पूर्ण दृष्टि पड़ती है तो इसका वाणी पर कितना बुरा प्रभाव पड़ेगा विचारणीय है ।

गुरु यह वाणी का स्वामी है अष्टम स्थान में पड़ने से उसका प्रभाव कम हो जाता है।

१०-यदि उपरोक्त योग में चन्द्र पर शुभ ग्रह की दृष्टि हो तो बहुत दिनों में

बाळक बोल्ने लगेगा ( जा० पारि० ) ।

जिह्वा रोग १--द्वितीयेश और लग्नेश बलहीन क्रूरांशक गत हो तो जिह्वा वायु

पीडित हो ।

२-द्वितीयेश निर्वेछ पाप दृष्ट हो तो जीभ अस्थिर अर्थात चलायमान हो

( स° चि०) 1

सुन्दर नेत्र १--नेत्र २ ओर १२ भाव से विचारना । दूसरा भाव दाहिना नेत्र है १२वाँ भाव बाँया नेत्र है। नेत्र का कारक सूर्य है ।

२--बारहवे भाव का स्वामी शुभ युक्त होकर शुभ नवांश या शुभ षष्ठचंश में हो और शुभ ग्रह से युक्त या दृष्ट हो तो नेत्र अच्छे होंगे ( स० चि० ) । ३-१-२ स्थान में बलवान्‌ गुरु चन्द्र क्रूर ग्रहों की दृष्टि न हो तो नेत्र सुन्दर हों ( ज्यो० शा० )।

४--हितीयेश शुभ ग्रह युक्त या दुष्ट हो तो नेत्र पूर्ण व बली होंगे (स० चि०) । ५--द्वितीयेश दुष्ट स्थान में नहीं हो ओर द्वितीय स्थान में शुक्र हो तो सुन्दर नेत्र हों ( स० चिं० ) ।

इ--लग्नेश लग्न में हो तो सुन्दर नेत्र हो ज्ञानी मंत्री या राजा हो सम्पदा युक्त हो ( जा० ०) | FE ७--लग्नेश गुरु व शुक्र युक्त केन्द्र मों हो । ८--छग्नेश उच्च में व मित्र क्षेत्री, शुभ ग्रह क्षेत्री होकर शुभ ग्रह से दृष्ट हो । ९--बली सूर्य दशम में हो तो नेत्र सुन्दर हो ( जा० सं० ) । १०--धनेश शुभ ग्रहों से युक्त या दुष्ट हो या शुभाश में हो तो सुन्दर नेत्र हो ( जा० पारि० ) 1

११-नेत्र स्थान में शुभ ग्रह हो द्वितीयेश शुभ ग्रह युक्त हो या कारक शुभ ग्रह युक्त हो लग्नेश से भी युक्त दृष्टि हो तो बड़ी दृष्टि वाला हो (स० चि०) | १२--द्वितीयेश पर पाप ग्रह का प्रभाव न हो केन्द्र में. हो ओर शुक्र ( नेत्र स्वामी ) लाभ स्थान या केन्द्र में हो पाप ग्रहों को द नेत्र हे र i अ ह्‌ ह दृष्टि न हो तो नेत्र निरोग रहे

नेत्र दोष १--दुसरे या बारहवें चन्द्र हो तो नेत्रों में दोष हो ( शंभु० ) । २--शुक्र पंचमेश ओर षष्टेश के साथ लन में हो ता राजा के कोप से नेत्र विकार हो ( जा० पारि० ) ।