सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 342, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें३३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
और शत्रु ग्रहों से दृष्ट हो तो वधिर हो ( ज्यो० शा० )।
८-र्पाप ग्रह ३,५,११ भाव में हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो कणं नाश हो
{ जा० सं० ) ।
९--मंगल शुक्र २ व १२ भाव में हो तो कणं का हरण हो ( जा० सं० ) ।
१०--बुध छठा हो शुक्र दशम हो रात्रि का अन्म हो तो बाँये कान से बड़े ऊँचे
स्वर से सुनेगा ( शंभु० ) ।
कर्ण रोग १--२ या १२ भाव में शुक्र या मंगल हो तो कर्ण पीड़ा हो या आँख
के गढ़े में विकार हो ( शंभु० ) ।
२--तीसरे घर में मंगल हो प्रेत पुरीशांश में हो तो कान का रोग हो (षष्ठ्यंश
का १२ वाँ अंश प्रेत पुरीशांश है वह बुरा है ( स० चिं० )।
३--जूतीयेश क्रूर आदि षष्ठ्यंश में हो तो कर्ण रोग हो ( जा० पारि० ) ।
४--तीसरा और ग्यारहवाँ भाव गुरु शनि और मंगल से युक्त या दृष्ट हो तो
कर्ण पीड़ा हो ( फल० )।
५--तृतीय भाव में मंगल से युक्त गुलिक, हो ( जा० पारि० ) ।
६--नृतीय भाव पाप युक्त या दृष्ट हो तो कर्ण रोग हो ( जा० पारि० ) ।
७--तृतीयेश जिसकी राशि में हो वह तथा जिसके अंश में हो वह केन्द्र में पाप
युक्त या दृष्ट हो तो कान का रोग हो ।
८--मंगल तीसरे नवांश में हो तो कर्ण रोग हो ( स० चि० ) ।
९--तृतीग्रेश और मंगल दोनों लग्न में हों तो कर्ण रोग हो ( जा० पारि० )।
१०--दितीयेश लग्नेश के साथ हो और गुलिक मांदि आदि भी साथ हों तो
कात का रोग हो ( स० चि० ) ।
११--तृतीय भाव का स्वामी जहाँ हो उस भाव का स्वामी यदि अष्टम में हो तो कर्ण रोग हो । जैसे मिथुन लग्न में तृतीयेश सूर्ये यदि दशम भाव में मीन का है जिसका स्वामी गुरु यदि अष्टम में हो तो कर्ण पीड़ा हो ( स० चि० ) ¦ कर्ण हीन--नवम भाव में नीच का शुक्र राहु युक्त हो तो कान से रहित हो (स० चि० ) ।
कान कटे १- छग्न में द्वितीयेश शनि या मंगल युक्त हो तो कान कटे । २--पषष्ठेश ओर धनेश लग्न में हों, शनि मंगल कर्म भाव में हो तो कान फरे या कटे ( स० चिं० ) !
इतरजनो का विचार--ऐसा ही विचार पितू आदि का उनके भाव को ठग्न मान कर करना । भावेश ओर उन-उन भाव के कारक ग्रहों के साथ युक्त होने से पितृ आदि का पूर्ण विच्छेद हुआ होगा ऐसा विचारना । हीनांग १--हूयं से सप्तम में मंगल, दशम में चन्द्र और हितीय में शनि होतो वह हीन शरीर का होगा ( जा० सं० ) । २-९ भाव में पाप दृष्ट मंगळ हो तो अंगहीन हो ( शंभु० ) ।