भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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३३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

और शत्रु ग्रहों से दृष्ट हो तो वधिर हो ( ज्यो० शा० )।

८-र्‍पाप ग्रह ३,५,११ भाव में हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो कणं नाश हो

{ जा० सं० ) ।

९--मंगल शुक्र २ व १२ भाव में हो तो कणं का हरण हो ( जा० सं० ) ।

१०--बुध छठा हो शुक्र दशम हो रात्रि का अन्म हो तो बाँये कान से बड़े ऊँचे

स्वर से सुनेगा ( शंभु० ) ।

कर्ण रोग १--२ या १२ भाव में शुक्र या मंगल हो तो कर्ण पीड़ा हो या आँख

के गढ़े में विकार हो ( शंभु० ) ।

२--तीसरे घर में मंगल हो प्रेत पुरीशांश में हो तो कान का रोग हो (षष्ठ्यंश

का १२ वाँ अंश प्रेत पुरीशांश है वह बुरा है ( स० चिं० )।

३--जूतीयेश क्रूर आदि षष्ठ्यंश में हो तो कर्ण रोग हो ( जा० पारि० ) ।

४--तीसरा और ग्यारहवाँ भाव गुरु शनि और मंगल से युक्त या दृष्ट हो तो

कर्ण पीड़ा हो ( फल० )।

५--तृतीय भाव में मंगल से युक्त गुलिक, हो ( जा० पारि० ) ।

६--नृतीय भाव पाप युक्त या दृष्ट हो तो कर्ण रोग हो ( जा० पारि० ) ।

७--तृतीयेश जिसकी राशि में हो वह तथा जिसके अंश में हो वह केन्द्र में पाप

युक्त या दृष्ट हो तो कान का रोग हो ।

८--मंगल तीसरे नवांश में हो तो कर्ण रोग हो ( स० चि० ) ।

९--तृतीग्रेश और मंगल दोनों लग्न में हों तो कर्ण रोग हो ( जा० पारि० )।

१०--दितीयेश लग्नेश के साथ हो और गुलिक मांदि आदि भी साथ हों तो

कात का रोग हो ( स० चि० ) ।

११--तृतीय भाव का स्वामी जहाँ हो उस भाव का स्वामी यदि अष्टम में हो तो कर्ण रोग हो । जैसे मिथुन लग्न में तृतीयेश सूर्ये यदि दशम भाव में मीन का है जिसका स्वामी गुरु यदि अष्टम में हो तो कर्ण पीड़ा हो ( स० चि० ) ¦ कर्ण हीन--नवम भाव में नीच का शुक्र राहु युक्त हो तो कान से रहित हो (स० चि० ) ।

कान कटे १- छग्न में द्वितीयेश शनि या मंगल युक्त हो तो कान कटे । २--पषष्ठेश ओर धनेश लग्न में हों, शनि मंगल कर्म भाव में हो तो कान फरे या कटे ( स० चिं० ) !

इतरजनो का विचार--ऐसा ही विचार पितू आदि का उनके भाव को ठग्न मान कर करना । भावेश ओर उन-उन भाव के कारक ग्रहों के साथ युक्त होने से पितृ आदि का पूर्ण विच्छेद हुआ होगा ऐसा विचारना । हीनांग १--हूयं से सप्तम में मंगल, दशम में चन्द्र और हितीय में शनि होतो वह हीन शरीर का होगा ( जा० सं० ) । २-९ भाव में पाप दृष्ट मंगळ हो तो अंगहीन हो ( शंभु० ) ।