भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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नीरोगता : ३३१

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ग्रह वाम नेत्र का नाश करे और अष्टमस्थ ग्रह दक्षिण नेत्र का नाश करे (जा. पारि.) ।

७--सूर्य व्यय में हो तो दाहिनी आँख से, चन्द्र व्यय में हो तो बाई आँख से

काना हो ( जा० पारि० )।

८--व्यय में मंगल हो तो बाम नेत्र से, शनि हो तो दक्षिण नेत्र से काना हो

( स० चि० )।

९--जन्म लग्न मीन राशि के होरा में सूयं हो तो दाहिने नेत्र से काना हो

चन्द्रमा मीन राशि के होरा में हो तो बामनेत्र से काना ( कान० )

१०--चन्द्रमा शुक्र सहित व्यय भाव में हो या सप्तम में हो तो वाम नेत्र से हीन

हो ( स० चि० ) ।

११--लग्न में मंगळ या चंद्र हो गुरु या शुक्र से दृष्ट हो तो काना हो (जा. लं.)

१२--लग्न से सप्तम स्थान स्थित मंगल को सिंह राशि में स्थित चन्द्र देखे या

ककं राशि में स्थित सूर्यं देखे और नवमेश १,८,५,१० इन राशियों में कहीं हो तो

काना हो ( जा० ल॑० ) । 9

१३-व्यय में मंगल हो तो वाम नेत्र और वाम कर्ण में रोग हो, खोटे कर्म से

ब्रणादि हो, कमर घाव तथा स्त्री की अधिक अंगता शो ( जा० सं० ) ।

नेत्र में चिन्ह--१--षष्ठेश या चंद्र कूर ग्रह युक्त होक़र अदृश्याद्ध॑ में हो तो नेत्र

में कोई विशेष चिन्ह हो ( जा० ल॑० ) 1

२- सूर्य के आगे बुघ गया हो तो नेत्र में चिन्ह हो ( जा० ल॑० ) ।

३--चन्द्रमा और मंगल दोनों एक ही नवांश में हों तो नेत्र में कोई छोटा सा

चिन्ह हो ( जा० ल॑०) ।

ये योग कारक ग्रहों के बल के अनुसार भी विचारना । सातवें स्थान के भोग्यांश

से लेकर लग्न के भुक्तांश तक ६ भाव को अदृश्याद्ध कहते हैं ।

बधिर १--सप्तम में शनि मंगल, लग्न में राहु, बुध हो तो दोनों कान से बहिरा

हो, अतिसार की पीड़ा, हाथ पैर में पसीना आना या शीत रोग हो ( शंभु० ) ।

` २--पाप ग्रह ९,११,३ और ५ भाव में हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो उनमें

जो बलवान्‌ हो उसके धातु के विचार से बहिरा हो ( वृ० जा० )।

३--शनि सूयं व चन्द्र ये ३,५,९,११ भाव में हों शुभ ग्रह युत दुष्ट न हो तो

बहिरा हो या कर्ण रोगी हो ( जा० भ० ) 1 र

४--पष्ठेश शुक्र लग्न में हो चन्द्रमा एवं पाप ग्रह की उस पर दृष्टि हो तो

दाहिना कान विरूप या वधिर हो ( शंभु० ) ।

५---चन्द्रमा और पाप ग्रह ऋक्ष सन्धि में हो शुभ ग्रह को दृष्टि न हो तो जड़

( बधिर ) हो ( जा० पा० ) ।

६-- द्वितीय किंवा द्वादश भाव में शुक्र या मंगल हो या १,२,४ लग्न में चन्द्र हो

तो कणं रोग, वधिरत्व, पंगुपना आदि विचारना ।

७ - सूर्यं मंगळ चन्द्र में से कोई ४,६,८,१२ स्थानों में से किसी स्थान में हो