भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 454 में से

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पृष्ठ 340

३३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

अंश में हों तो शनि १५ अंश में मंगल ८ अंश में हो तब कहेंगे कि क्र ग्रहों के मध्य में है ।

३०--सूर्य या चन्द्र से सातवें स्थान में मंगल पृष्ठोदय राशि में हो । उपरोक्त तीनों योगों में कोई हों तो वह नेत्र से अंधा दुष्ट कर्म कर्ता, पराये घर में रहने वाला या पर स्त्री यामी और शरीर का पतला होता है । इन तीनों योगों में चन्द्र वली हो तो अच्छे विचार वाला हो ( जा० ले० )। ३१--तुला लग्न में सूये हो तो अंधत्व और दरिद्र हो ( ज्यो» शा० )। ३२--लग्नमें सिंह का शुक्र व शनि हो तो नेत्र हानि हो ( जा० सं० ) । ३३--दशम या छठे भाव के स्वामी लग्न में, शुक्र और धनेश से युक्त हो तो राजा के कोप से नेत्र उखाड़े जावें ( स० चिं० ) । ३४--उपरोक्त योग में १० और ६ भाव के स्वामी नीचांशक से या पाप युक्त हो तो भी वही फल ( स० चि० )1 ; . ३५--१० और ६ भाव के स्वामी जिन ग्रहों के नवांश में यदि दृष्ट स्थान में लग्नेश से युक्त हो तथा शुक्र और २,१२ भावेशों से युक्त होकर द्वादश स्थान में हो शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तो नेत्र में प्रमाद हो ( स० चि० ) । ३६--लग्नेश, षष्ठेश की राशि के नवांश स्वामी के साथ हो दशमेश, दुष्ट स्थान में हो, द्वितीयेश १२ वें भाव में शुभ दृष्टि रहित हो तो नेत्र हानि हो ( सऽचि० )। ३७--यदि १०,६,२ भाव के स्वामी लग्न में हो या वे नीच नवांश में पाप युक्त हों तो राजा से उसकी आँख नष्ट हो ( स० चि० )1 द्वितीयेश ओर दशमेश का योग अच्छा है परन्तु जव वे पष्ठेश के साथ रहते हैं तो नेत्र का भय होता है । यदि वे रवामी पापयुक्त होकर नीच नवांश में हों तो भी नेत्र को भय होता है । तब आँख निकालने का दण्ड नहीं होता परन्तु किसो अधिकारी वर्ग के व्यवहार से नेत्र हानि हो सकती है । ३८--शक्षेत्री चन्द्र ३ पाप ग्रह युवत हो शुभ दृष्टि हीन हो तो नेत्र नाश हो ( जा० सं० ) ।

३९--नवमेश यदि शुभ ग्रह है तो जातक अदृष्टि हो ( ज्यो शा० ) । काना १--सूर्‍्य चन्द्रमा में से एक छठे दूसरा व्यय स्थान में हो शुभ दृष्टि रहित हो एक आँख से काना हो उसक्री स्त्री भी कानी हो ( स० चि० ) | २-पंचम भाव में यदि अस्त का मंगल या शुक्र हो तो काना हो (जा० सं०) । ३--धन भाव में पाप युक्त शुक्र हो तो काना हो या भेद दृष्टि हो ( शंभु० ) । ४-ऱसूर्य लग्न या सप्तम भाव में हो शनि से दृष्ट हो या शनि सूर्य के साथ हो तो दाहिनी आँख नष्ट हो ।

५--यंदि लग्नस्य या सप्तमस्थ सूर्य, राहु और मगल से युक्त हो तो बाई आँख . उच्ट हो।

— पृथे और चन्द्रमा बारहव हों, ६,८,१२ भाव में पाप ग्रह हों तो षष्ठ स्थानी

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