सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ेंनाभस आदि योग; ३९३
मतांतर
कुछ विद्वानों का कहना है कि १,७ आव में शुभ ग्रह और ४,१० भाव में पाप ग्रह हों तो वच्ञ योग होता है। परन्तु सूर्य से चौथे स्थान अन्तर पर चुघ शुक्र आना असभव है । सब ग्रह केन्द्र में होने
से तो कमल योग होता है। यहाँ पाप और शुभ ग्रह का पृथक कारण हो गया है । चारों केन्द्र में इस प्रकार पाप-शुभ ग्रह के अनुसार ग्रह आना असंभव है इससे उपरोक्त हल योग पृथक-पृथक दो प्रकार से चताये हैं ।
७. यव योग--वह वज्र योग का उल्टा है अर्थात सब पाप ग्रह लग्न और सप्तम में हों या सब शुभ ग्रह चतुर्थ ओर दशम में हों ।
सतांतर--
यहाँ भी विद्वानों का कहना है कि १,७ भाव में पापग्रह और ४,१० भाव
में शुभ ग्रह हों तो वस्न योग होता है ।
यहाँ भी उपरोक्त विचार होता है कि सूर्य
से शुक्र बुध चौथेभाव में नहीं जा सकते
इस प्रकार तो कमल योग होता है । परन्तु 2
शुभ ओर पापग्रहों के विचार से यहाँ भी दो उपरोक्त प्रकार से योग बताये हुँ ।
८. कमल योग--चारों केन्द्र में शुभ-पाप ९. वापी योग--यह कमल योग का सभी ग्रह हों और पणफर आपोक्लिम उल्टा है । अर्यात. सभी ग्रह केन्द्र के में ग्रह न हों अर्थात् सब केन्द्र में ही हों बाहर हों। केन्द्र मे कोई ग्रह न हो केन्द्र के बाहर ग्रह न हों इसमें शुम-पाप के इसके भी २ भेद हैं ! क्रम का कोई विचार नहीं है, जैसा यहां (१)सब ग्रह २,५,८,११(पणफर) में ।
बताया है 1 (२)सब ग्रह ३,६,९,१२(अपो क्लिम) में।