सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 414, कुल 454 में से
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४०४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
से शुन्य ( जा. भ. )। पाखण्डी, द्रव्यहीन, माता पिता से वर्जित, मलिन ( छ.चं. ) ।
पाखण्डी, निर्धन, समाज के बाहर, माता, पुत्र और धर्म से हीन ( वृ. पा. ) ।
७. गोल ( गोलक )--निर्धन, मलीन, अज्ञानी, निद्य, शिल्पी, आलसी, भ्रमण
करने वाला ( वृ. जा. )। विद्यावळ उदारता और सामर्थ्यं इन सबसे रहित अनेक
दुःखों को प्राप्त, सदा परदेश जाने वाला, अनेक प्राणियों से प्रीत, अन्याय से युक्त
( जा. भ. ) । विद्या धन और मान से हीन, अति दुःखी मलीन, (छ. चं.) । वलवान्
घन हीन, विद्या और ज्ञान से शून्य, मलीन और दुःखी ( वृ. पा. ) ।
३. आश्रय योग के फल
१. रज्जु--ईर्ष्यावान्, निरंतर परदेशवासी, मागं चलने में बहुत रुचि [वृ. जा.]।
श्रेष्ठ रूप, दुःख का भागी, दुष्ट कामों में निरंतर उत्साही, परदेश में विचरने वाला,
धन को प्राप्त [ जा. भ. ]। परदेश में द्रव्य का भागो, सुरूपवान्, दान में तत्पर क्रूर
' और दुष्ट स्वभाव [ छ. च. ]। भ्रमण शील, सुन्दर, परदेश जाने में सुखी, कूर, दुष्ट
स्वभाव [ वृ. पा. ]।
२. मुसलमानी, गवित, धनवान्, बहुत कायं करने वाला [ वृ. जा. ] । अनेक
ज्ञान और ध्यान युक्त, पुत्र और लक्ष्मी स राज तेज शोभा को प्राप्त, राजा का
आश्षित, हषं युक्त, हषं की उत्कर्षता से पूर्णता को प्राप्त [ जा. भ. ] । राजाओं से
पूज्य, घन से युक्त, प्रसिद्ध पुत्र वाला, राजा को प्रिय, स्थिर चित्त वाला, कर्मों से
युक्त, [ ल. चं. ]। मानी, ज्ञानी, धनी, राजमान्य, विख्यात, बहुत पुत्र वाला स्थिर
चित्त वाला [ वृ. पा. ]।
३. नर--व्यंग [ कोई अंगहीन ] दुढ़ निश्चय वाळा, धनवान् सब कार्यों में सूक्ष्म
दृष्टि [ वृ. जा. ]। निरंतर रत्नों के सहित, अपने घर में हो, राजा से प्रीत करने
बाळा, पुण्यवान् देह, सदा कीति सहित [ जा. भ. ]। स्थूल देह, निपुण, धन का
संचय करने वाला, बंधुओं का प्यारा, सुरूपवान् [ ल. चं. ]। हीन व अधिक अग
वाढा, घन संग्रह कारी, अति चतुर बंधुओं का प्रिय और सुन्दर [ वृ. पा. ]।
४. दल योग के फल
१. सरग [ माळा ]--भोगी [ अनेक अच्छे भोग वाला | [ वृ. जा. ] । पुत्र ओर
मित्रों युक्त, श्रेष्ठ आभूषण युक्त, अनेक वाहुन युक्त, स्त्रियों में क्रीड़ा करने वाला
[ जा. भ. ]। वस्त्र वाहन और भोग आदि से युक्त, कांत और मित्रों को प्रिय,
सदा, सुखी [ ल. चं. ] । नित्य वाहन वस्त्र भोग आंदिकों से सुखी, सुन्दर, बहुत स्त्री
वाला [ वृ. पा. ]।
२. सपं--नाना प्रकार के अच्छे भोग-भोगने वाला [ वृ. जा. ]। पराये अन्न का
भोगने वाला, क्रोधी, दरिद्री, निद्रा का उत्साही, बड़े वेग सहित, अमंगल कारी, खाटे
व्यवहार वाळा, पराई बड़ाई करने वाला [ जा, भ. ]। क्रूर, दरिद्री, दुःखित, सदा
, पर का अन्न खाने वाला, दीन और विषम पुरुष हो [ ल. चं. ] ।