भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 413, कुल 454 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 413

नाभस आदि योग : ४०३

२०, चक्र--तपोज्ञानादि से राजाओं से प्रणाम करने योग्य ( वृ. जा. ) । लक्मी- चान्‌, रूप वाला, बड़ा प्रतापी, बारम्बार भेंट (नजर) लेने वाला, उस राजा का यश समग्र धरती पर होता है ( जा. भ. ) । सम्पूर्ण राजा जिसके चरण कमलों को सेवा 22 का) महाराजा हो ( ज. चं. ) । अनेक राजाओं से वंदित चक्रवर्ती राजा हो वृ. पा. )।

२. संख्या योग का फल

१. वीणा (वल्ली)--सूक्ष्म दृष्टि, वारीकी से विचार करने वाला, नाच और गीत प्रिय ( वृ. जा. ) । धन युक्त, . शास्त्र के पार जाने वाला, बहुत जनों का पालन करने वाळा, अनेक सौख्य सहित, चतुर, गान विद्या में निपुण ( जा. भ. ) । नृत्य, गीत का प्रिय, नेता, बहुत नौकरों वाखा, धनी, सुखी, कार्यों में निपुण ( ल. चं. ) । गीत, नृत्य और वाद्य में प्रम, सुखी, धनी, नेता, वहुत नौकरों वाला ( वृ. पा. ) । २. दाम ( दामिनी )--उदार, परोपकार में तत्पर, पशुपालक, ग्रामाधिपति ( वृ. जा. ) । आनम्द को प्राप्त, पुत्रों से युक्त, धैरयवान्‌, विद्वान्‌, आभूषण और कोष से संतोष को प्राप्त, विराजमान, शील से युक्त, उदार बुद्धि, श्रेष्ठ ( जा. भ. ) । उपकारी धनी, मुखं, पशु, पुत्र और समृद्धियों से युक्त, रत्नों से परिपूर्ण ( च. च. )। परोपकारी, नीति से घनोपाजंक, महा ऐश्वर्यवान्‌, विख्यात, पुग्न रत्न आदि से युक्त विद्वान्‌ ( वृ. पा. ) ।

३. पाश--असन्मागं से धन संग्रह, इसके वंधु भृत्य भी ऐसे ही कर्ता होते हैं ( वृ. जा. ) । दीन के समान, वुराई करने में तत्पर, बंधन से दुःख, बहुत बोलने वाला, कपट युक्‍त, क्रोधी, अनेक अनर्थ करने वाला वन में प्रीति (जा. भ. ) । कार्य में निपुण, प्रपंची, बहुत वोलने वाला, भाइयों की सेवा करने वाला, विशीळ, बहुत भक्षण करने वाला, दासों से युक्त ( ल, चं. ) । वंधन भागी, कायं में दक्ष, प्रपंची, बहुत चोळने वाला, अधिक परिवार वाला ( वृ. पा. ) 1 ४. केदार--कृषि कर्ता, बहुतों का उपकार कर्ता ( वृ. जा. ) । सत्य युक्त, धन- वान्‌, नञ्ज, खेती में प्रीति, आदर से उपकार करने वाला, धैर्यवान्‌, श्रेष्ठ आचरण ( जा. भ, ) । सत्य युक्त, धनवान्‌, नम्र, खेती में उत्कंठा, उपकार करने में आदर रखने वाला, धेर्यवान्‌, विशेषतः धीर मनुष्यों कसे आचार वाला ( मान. ) । बहुतों का उपकारी खेती, करने वाला, सत्यवक्ता, सुखी, चंचल, धनवान्‌ ( वृ. पा. ) । ५. शुल--शुर, रण में अंग में चोट, अत्यन्त धन की इच्छा करने वाला, दरिद्री ( वृ. जा. ) । युद्ध और विवाद में तत्पर, वडा शूर वीर, क्रूर स्वभाव, कठोर चित्त, धनहीन, संसारी मनुष्यों को शुळ के समान होता है ( जा. भ. ) । तीक्ष्ण,

आलसी, निधंनी, हिस्र, शुर, बाहर निकाला हुआ, संग्राम में लब्ध शब्द वाला (ल.चं.) ।

तीक्ष्ण स्वभाव, आळसी, निर्धन, हिसक, समाज के बाहर, शूर, युद्ध नें विजयी (वृ.पा.) । ६. युग--धन रहित, पाखंडो, (तीनों मार्ग से वहिष्कृत) ( वृ. जा. )। पाखण्ड

में पूरी प्रीति, लज्जा रहित, धमे कर्म रहित, पुत्र और धन से हीन, अयोग्य, ज्ञान

Pe कसी