भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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४०२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

सुत ओर स्त्री वाला, बन्धुओं से बाहर, निर्धनी, नीच और दुखित (ल. चं.) । पुत्र

स्त्री, धन से हीन, निदेय, अपने परिजन से व्यक्त दुःखी, नोचों का सेवक (वृ. पा.) ।

१४. नौका--यशस्वी, कभी दुःखी, कमी सुखी, कुपण (वु. जा.) । प्रसिद्ध लोभी

ओर भोग सौख्य से रहित, क्लेश पाने वाळा, निरंतर चंचल चित्त, चोरी से उत्पन्न

धान्य से जीविका (जा. भ.) । ऐश्वयंवान्‌, बहुत आयु वाला, प्रसिद्ध यशी, कूपण,

मलिन, क्षुब्ध और चंचल (ल. चं.) । जलोत्पन्त मोती आदि से जीविका, बहुत आशा

करने वाला, विख्यात, दुष्ट, कंजूस, मलिन, लोभी (वृ. पा.) ।

१५. कूट--झूठ बोलने वाला, बंधन स्थान का रक्षा करने वाला (वृ. जा.) । वन

में वास करने वाला, पहलवान्‌, भीलों से प्रीत करने वाला, धनहीन, निदित कर्म करने

वाला, धर्म अधर्म के ज्ञान रहित, कपटी (जा. भ.) । मिथ्या बोलने वाला, मूर्ख, कूर,

कपटी, बंधुओं का पालन करने वालो, दरिद्री और पर्वत में वास करने वाला

(छ. चं.) । मिथ्या भाषी, जेल का अधिकारी, धन हीन, शठ, क्रूर दुर्ग स्थान में रहने

वाला ( वृ. पा. ) ।

१६. छत्र--अपने जनों को सुख देने वाला, बुढ़ापे में सुखी ( वृ. जा. ) । चतुर

राजाओं का कार्य करने वाळा, दयाव!न्‌ बाळगने और बुढ़ापे में सव सौख्य को प्राप्त,

श्रेष्ठ छत्र और चामर को प्राप्त करने वाला (जा. भ.)। उत्तम वुद्धि, दयालु, बडी,

आयु, भाइयों का आश्रयी, बाल्यावस्था में सुखी ( ल. चं. ) । अपने कुटुम्वियों का

पोषक, दयालु, अनेक राजाओं को मान्य, श्रेष्ठ बुद्धि, आदि अंत वयस में सुखी,

दीर्घायु ( वृ. पा. ) ।

१७. चाप (घनुष)--संग्राम में शूर, वाध्य व वृद्धावस्था में सुखी ( वृ. जा. )

बालपन ओर बुढ़ापे में सौख्य पाने वाला, बनों और पतों में रहने वाला, बड़ा अभि-

सानी, गर्वे की उन्मत्तता से आपत्ति को प्राप्त, धनुषधारी ( जा. भ. ) । मध्यावस्था

में भाग्यहीन, गुप्त काम को नोकर रखने वाला, वन में रत, झूठ ही कलंक लगाने

वालो, चोर, कामुक ( ल. चं. ) । मिथ्यावादी, जेल का अधिकारी, चोर, धूतं, बन

बिहार प्रिय, भाग्यहीन ओर वयस के मध्य में सुबी ( वृ. पा. ) ।

१५. अद्ध चन्द्र ( अद्धं शशि)--पुमग, सर्वजन प्रिय, दर्शनीय वस्तुओं मे श्रेष्ठ,

सेना, आमरण, धन वस्त्रादि सहित, मनुष्यों के उत्सव के अर्थ चन्द्रमा समान होता है

( जा. भ. ) । बली, राजा को प्रिय, कांत, सुवण और रत्नों से अलंकृत, सेनापति,

सौभाग्यवान्‌ (ल. चं.) । सेनापति, सुन्दर राज मान्य, बलवान्‌, सुवणं रत्न आदि धन

से युक्त ( वृ. पा. ) ।

१९. समुद्र--राजा तुल्य ऐश्वर्यवान्‌ और भोगवान्‌ ( वृ. जा. ) । दानी धे्यवात्‌,

सुन्दर, शीलवान, दयावान्‌, राजा से सोख्य प्राप्त, धन्यवाद के योग्य ( जा. भ. ) ।

बहुत द्रव्य वाळा, रत्नों से युक्त, पुत्रवान्‌, भोगवान्‌, जनों को प्रिय, स्थिर चित्त तथा

सुबी (ल. चं. ) । बहुत रत्न आदि धन से पूर्ण, भोगी, लोकप्रिय, सुपुत्रवान्‌, स्थिर

न भौर सुशील ( वृ. जा. ) ।