सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनाभस आदि योग : ४०९
श--जु० गु०-मं० शु० श० ५--मं० शु० श०-बु० गु० ४ ग्रह योग-१०+२०-३० ६--बु० शु०-मं० गु० श० ६--मं० गु० श०-बु० शु० योग-१८० भेद ७--यु० श०-मं० गु० शु० ७--मं० गु० शु०-बु० श० ८--गु० शु०-मं० बु० श० ८-_पं० बु० श०-गु० शु० ६--गु० श०-मं० बु० शु ९--मं० वु० शु०-गु० श० थे ०--शु० श०-मं० वु० गु० १०--मं० बु० गु०-शु० श० १. केमद्रुम योग--चन्द्र से २,१२ इन दोनों स्थानों में कोई ग्रह न हो अर्थात् ये . दोनों स्यान ग्रह रहित हों तो केमद्रुम योग होता है ।
अन्यमत--चन्द्र से ४,१० स्थानों में से किसो में ग्रह न हो या चन्द्र जिस नवांश पर हो उससे २,१२ दोनों स्थानों में कोई ग्रह न हो तो केमद्रुम योग होता है। चन्द्र के दोनों ओर सूर्य को छोड़कर और कोई ग्रह न हो अर्थात् चन्द्र से २,१२ घर में सूय हो तो कोई हानि नहीं परन्तु सूय के अतिरिक्त और कोई ग्रह नहीं होगा । सुरफा, अनफा और दुर्धरा योग न हो तब यह केमद्रुम योग होता है इसमें निदित और दरिद्र का जम्म होता है इससे राजयोग भी नष्ट हो जाते हैं। अन्य प्रकार के केमद्रुम योग
१--चन्द्र के साथ या उससे २,१२ स्थान में या लग्न से केन्द्र में सूर्यं को छोड़ कर अन्य कोई ग्रह नहीं हो तो केमद्रुम योग होता है । यह योग अन्य योगों के फल जाश कर अपना फळ देता है इसे पहिले देखना चाहिए इसमें दरिद्र होता है (वृ० पा०)। रछ में या सप्तम में चन्द्र हो उसे गुरु न देखता हो तो केमद्रुम योग होता है ( जा० पारिन )।
३--ग्रह अष्टकवगं में अल्प शुभ रेखा के हों और निवल हों तो केमद्रुम योग का 'फल देने वाला होता है ( जा० पारि० ) ।
४-चन्द्रमा पाप ग्रहों से युक्त हो पाप ग्रह की राशि में हो या पाप नवांश में हो रात्रि के जन्म में दशमेश से दृष्ट हो निर्बल हो तो केमब्रुम योग होता है ( जा० पारि० ) ।
५--चन्द्रमा खळ ग्रह से युक्त नीचांशक में हो भाग्येश उसे देखता हो या रात्रि में क्षीण चन्द्रमा नीचगत हो उस समय उत्पन्न होने वाले का केमद्रुम योग होता है ( जा० पारि० ) ।
६-“आत्म कारक नवांश या लगन या पद से द्वितीय और अष्टम भाव में तुल्य पाप ग्रह हो तो केमद्रुम योग होता है। यदि चन्द्रमा की उप पर दृष्टि हो तो विशेष अशुभ होता है ( वृ० जा० ) ।
७--कारक से जन्म लग्न से या जन्म पद से द्वितीय ओर अष्टम स्थान में पाप गहु बराबर हो अर्थात् पाप ग्रह की तुल्यता हो तो केमद्रुम योग होता है यदि उस पर चन्द्र की दृष्टि झो तो पूर्ण केमद्रुम योग होता है ( जॅमिनि ) ।