सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
पृष्ठ 420, कुल 454 में से
संदर्भ में पढ़ें४१० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
८--नवमेश व्यय में, व्ययेश धन में निर्बल हो, तीसरे भाव में पाप ग्रह हो तो केमद्रुम योग होता है ( शंभु० ) । केमद्रुम भंग योग
जिन योगों के होने से केप्रद्रुम योग भंग हो जाता है ।
१--सूय्य से चन्द्रमा केन्द्र में हो--यह अधम योग है।
२-ूर्य से चन्द्रमा पणफर में हो--मध्यम योग है ।
३--सूर्य से चन्द्रमा आपोक्लिम में हो--उत्तम श्रेष्ठ ।
इन योगों में नम्रता, धन, ज्ञान, बुद्धि, निपुणता चतुरता उपरोक्त प्रकार से होती
है अर्थात् (१) अधम में-उपरोक्त अधम अर्थात् न्यून होती है । (२) मध्यम में सम
होती है अर्थात् कम व अधिक होती है । (३) उत्तम में उपरोक्त धन आदि की प्राप्ति
उत्तम अर्थात् अधिक होती है ।
१--जन्म में चन्द्रमा को सव ग्रह देखते हों तो केमद्रुम योग का नाश होकर
दीर्घायु, चक्रवर्ती और धनवान् होता है ( जा० भ० ).।
२-सभी ग्रह चारों केन्द्रों में हों तो केमद्रुम नाश योग होता है इससे केमद्रुम के
दुष्ट फल को दूर कर श्रेष्ठ फल देता है ( जा० भ० )।
३--पुर्ण चन्द्र शुभ ग्रहको राशि में हो या बुध गुरु शुक्र इनमें से किसी से
युक्त हो तो केमद्रुम का फल नष्ट कर पुत्र धन सौर्य और मंगल की सिद्धि देता है
( जा० सं० ) ।
४--जन्म लन्न से चन्द्र केन्द्र भाव में हो या चन्द्र भौमादि ग्रहों में से किसी से युक्त द्वो तो केमद्रुम नहीं होता ( स० ० ) ।
५--जन्म में मंगळ सहित गुरु तुळा राशि में, सूर्य कन्या राशि में, मेष में चन्द्रमा
हो और बाकी के कोई ग्रह उसको नहीं देखते हों तो केमद्रुम योग नाश कर उसे राजा बना देना है ( फल० ) ।
६--लग्न से केन्द्र में सूर्य चन्द्र छोड़कर ओर कोई ग्रह हो, चन्द्र के साथ भी कोई ह॒ हो तो केमद्रुम भंग हो जाता है ( वृ० जा० )। ७--चन्द्रमा केन्द्र में हो और भोमादिक ५ ग्रहों में से किसी से युक्त हो तो केमद्रुम भंग हो जाता है ( प्रा० यो० ) । पु ८-<कैमद्रुम के लक्षण होने पर भी यदि चन्द्रमा या शुक्र केळ में हो गुरु से दृष्ट हो तो यह केमद्रुम योग नहीं होता ( जा. पा० ) 1 क चन्द्रमा शुभ ग्रह से युक्त हो या शुभ ग्रहों के मध्य-में हो उसे गुरु देखता हो तो केमद्रुम योग भंग हो जाता है ( जा० पा० )। १०-चन्द्रमा अति मित्र के घर में, अपनी उच्च राशि में, स्वगृह या स्वनवांश में हो उसे गुरु देखता हो द्रु० योग भंग हो जाता है ( जा० पा० ) । 110 पूण चन्द्र लग्न में हो शुभ ग्रह से युक्त हो या दशम भाव में उच्च का हो इसे गुरु देखता हो तो के० दरु० भंग हो जाता है ( जा० पारि० ) ।