भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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४१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

४. कारिका योग--७, १० या ११ भाव में सब ग्रह हों अर्थात या तो सप्तम में

सब ग्रह हों या १० भाव में सब ग्रह हों या लाभ में सब ग्रह हों। फल-नोच वंश में

होकर भी राजा होता है। यदि राजवंश में उत्पन्न हुआ हो तो राजा होने में क्‍या

शंका है ।

५, एकावली योग--लग्न से या अन्य भाव से क्रम से समस्त ग्रह हों । फल---

महाराजा हो ।

६. चतुः सागर योग--चारों केन्द्रों में सब शुभ और पाप ग्रह हों । फल--सब

अरिष्ट दूर कर धन देता है। राजयोग होता है । बहुत रत्नों से यकत, हाथी घोड़ा

धनों से परिपूर्ण पृथ्वीपति होता है । (ल० चं०) अन्य मत-१,४,७,१० इन्हीं राशियों

में सब शुभ और पाप ग्रह हों तो भी यह योग होता है (मान०) ।

७. अमर योग--मेष व सिंह का सूर्य केन्द्र या त्रिकोण में हो ओर चन्द्र वृष याः

ककं राशि ८ या १२ भाव में हो और दोनों पर क्रमशः गुरु शुक्र इनकी दृष्टि हो

` (जा० सं०) । फल-सब कष्ट का नाश करता है।

अत्यमत-सब पाप ग्रह या सब शुभ ग्रह चारों केन्द्रों में हों । सब कर ग्रह केन्द्र

में हों तो-पृथ्वीपति हो । सब शुभ ग्रह केन्द्र में हों तो-लक्ष्मीपति हो (मान०) |

८, हँस योग--छरन से १, ५, ७, ९ इन्हीं घरों में सव शुभ या पाप ग्रह हों ॥

फल-वंश. का पालन करने वाला हो । अन्य प्रकार-१, ७, ८५ ९, १०, ११ इन्हीं

राशियों में सब ग्रह हों तो पदार्थों से परिपूर्ण राज पूज्य और राजा के अमान हो

( जा० सं० )। अन्यमत-१, ५, ७, ८, ९, ११ इन्हीं स्थानों में सब गृह हों तो उप￾रोक्त फल हो (मान०) ।

९. राजहंस--१, ३, ५, ७, ९, ११ इन राशियों में सब प्रह हों। फल--राज्य

स्थात और सुख प्राप्त हो (जा. सं.) । अन्यमत-१, ३, ५, ७ ९ इन राशियों में

सब ग्रह हों तो उपरोक्त फल हो (मान.)

१०. दरिद्र विधायक योग--सूर्यादि सब ग्रह वाई ओर को वामावतं के ही क्रम

से ७ स्थानों में स्थित हों तो यह योग होता है इसमें अन्य मत का विचार नहीं करना।

फल-दरिद्री हो ।

११. नन्दा योग--३ घरों में २, २ ग्रह हों और ३ घरों में १, १ ग्रह हो फल- दीर्घायु ओर सुख भोगी हो (मान.) । अन्यमत--२, २ राशियों में २ ग्रह होंबें और

३ स्थानों में १, १ ग्रह हों तो उपरोक्त फल (जा० सं०) ।

१२. दाता योग--छूग्न में गुरु, चतुर्थ में शुक्र, सप्तम में बुध, दशम में मंगल हो

ये चारों ग्रह चारों केन्द्र में हों । फल--उत्तम हो ।

१३. चिल्ह पुच्छक योग--योगाधियोग ।

(१) सिंहांसन और डमरु योग में यदि लग्न में ७,१०,१ राशि पड़ जावे तो यह चि० पु० योग होता है ।

(२) राजहंस योग में लग्न में ४,१०,११,३ राशि हो तो उपरोक्त योग होता है)