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भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 425, कुल 454 में से

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नाभस आदि योग : ४१५

३ उभय चरी योग-सब को सहने वाला, स्थिर स्वभाव वाला, अत्यन्त समृद्धियो सहित, अधिक बलवान्‌ एक सी देह वाला, अत्यन्त ऊँचा नहीं, सीधी दृष्टि, अधिक रूक्ष्मी युक्त (जा० भ०) । राजा या राजा तुल्य तथा सुखी (वृ० पा०) । बड़ा सुभय, अनेक भूत्यो को रखने वाला, भाई बंदों का रक्षक, राजा के तुल्य, नित्य उत्साह रखने चाला सदा प्रसन्न, नित्य अनेक भोगों को भोगने वाला (मान०) । शुभ युक्त-श्रेष्ठ राजाओं के सदृश, घन, सुख, शील और दया से अनुरक्त हृदय । पाप युक्त-पापी, रोगी दूसरे का कार्य करने वाला, दरिद्री (जा० पारि०) | विचार-उपरोक्त योगों में सूयं एवं योगकर्ता ग्रह या राशि अंश के अनुसार फलों में न्यून या अधिकता विचारना । ये ग्रह स्वगृही मित्रगृही या उच्च के हों तो बहुत घन और सुख युक्‍त राजा होता है ।

४-कतंरी योग--

शुभ कर्तरी--दीर्घायु, भय रहित, रोग रहित, शत्रु रहित, धनी और सुखी । पाप कर्तेरी--गरीब, अशुद्ध, दुःखी, स्त्री और सन्तान हीन, कुछ अंग से रहित, अल्पायु ( फलछ० ) ।

इस पर विचार

उपरोक्त चारों योग में जो शुभ या पाप योग कहे हैं उनमें योग कारक ग्रह शुभ हो तो शुभ योग होगा पाप ग्रह हो तो अशुभ या पाप योग होगा । जैसे सूयं से बारहवें स्थान में शुभ ग्रह हो तो शुभ वोशि, पाप ग्रह हो तो पाप वोशि होता है । यदि सूर्ये

से दूसरे स्थान में शूभ ग्रह-हो तो शुभ वेशि पाप ग्रह हो तो पाप वेशि होगा । यदि सूर्य से २,१२ दोनों स्थानों में शुभ ग्रह हो तो शुभ उभय चरी, पाप ग्रह हो तो पॉप

उभय चरी योग होगा ।

कतरी योग के शुभ पाप योग का विचार--छग्न से बारहवां ओर दूसरा घर

शुभ ग्रह से युक्त हो तो शुभ कर्तरी होगा पाप ग्रहों से युक्त हो तो पाप कर्तरी होगा । उपरोक्त शुभ योगों में सुनफा के शुभ प्रभाव के अनुप्तार एवं पाप योगों में सुनफा

के अशुभ प्रभाव के अनुसार फल होती है ।

१. शुभ योग-लग्न में केवल शुभ ग्रह हों तो शुभ योग होता है यदि लग्न में ग्रह

नहीं हो ओर द्विताय और द्वादश स्यान में शुभ ग्रह हों तो भी शुभ योग होता है।

फल-वाग्मी (वक्ता) हो, रूप शील गुण युक्त हो । ( वृ० पा० )।

अशुभ योग या पाप योग-लम्न में केवल पाप ग्रह हो तो पाप योग होता है ।

यदि लग्न में ग्रह न हो द्वितीय द्वादश भाव में पाप ग्रह हो तब भी अशुभ योग होता

है। फल कामी हो, पाप कमं करे, दूसरों का पंसा खाने वाला हो (वृ० पा०)। २. सिंहासन योग-२,६,८,१२ इन ४ स्थानों में सब ग्रह हों। फल--राज

सिहासन प्राप्त हो ।

३. ध्वज योग--सब पाप ग्रह अष्टम भाव में हों और सब शुभ ग्रह लग्न में हों । 'फछ--सुरुष नायक या राजा हो ।