सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
नाभस आदि योग : ४१५
३ उभय चरी योग-सब को सहने वाला, स्थिर स्वभाव वाला, अत्यन्त समृद्धियो सहित, अधिक बलवान् एक सी देह वाला, अत्यन्त ऊँचा नहीं, सीधी दृष्टि, अधिक रूक्ष्मी युक्त (जा० भ०) । राजा या राजा तुल्य तथा सुखी (वृ० पा०) । बड़ा सुभय, अनेक भूत्यो को रखने वाला, भाई बंदों का रक्षक, राजा के तुल्य, नित्य उत्साह रखने चाला सदा प्रसन्न, नित्य अनेक भोगों को भोगने वाला (मान०) । शुभ युक्त-श्रेष्ठ राजाओं के सदृश, घन, सुख, शील और दया से अनुरक्त हृदय । पाप युक्त-पापी, रोगी दूसरे का कार्य करने वाला, दरिद्री (जा० पारि०) | विचार-उपरोक्त योगों में सूयं एवं योगकर्ता ग्रह या राशि अंश के अनुसार फलों में न्यून या अधिकता विचारना । ये ग्रह स्वगृही मित्रगृही या उच्च के हों तो बहुत घन और सुख युक्त राजा होता है ।
४-कतंरी योग--
शुभ कर्तरी--दीर्घायु, भय रहित, रोग रहित, शत्रु रहित, धनी और सुखी । पाप कर्तेरी--गरीब, अशुद्ध, दुःखी, स्त्री और सन्तान हीन, कुछ अंग से रहित, अल्पायु ( फलछ० ) ।
इस पर विचार
उपरोक्त चारों योग में जो शुभ या पाप योग कहे हैं उनमें योग कारक ग्रह शुभ हो तो शुभ योग होगा पाप ग्रह हो तो अशुभ या पाप योग होगा । जैसे सूयं से बारहवें स्थान में शुभ ग्रह हो तो शुभ वोशि, पाप ग्रह हो तो पाप वोशि होता है । यदि सूर्ये
से दूसरे स्थान में शूभ ग्रह-हो तो शुभ वेशि पाप ग्रह हो तो पाप वेशि होगा । यदि सूर्य से २,१२ दोनों स्थानों में शुभ ग्रह हो तो शुभ उभय चरी, पाप ग्रह हो तो पॉप
उभय चरी योग होगा ।
कतरी योग के शुभ पाप योग का विचार--छग्न से बारहवां ओर दूसरा घर
शुभ ग्रह से युक्त हो तो शुभ कर्तरी होगा पाप ग्रहों से युक्त हो तो पाप कर्तरी होगा । उपरोक्त शुभ योगों में सुनफा के शुभ प्रभाव के अनुप्तार एवं पाप योगों में सुनफा
के अशुभ प्रभाव के अनुसार फल होती है ।
१. शुभ योग-लग्न में केवल शुभ ग्रह हों तो शुभ योग होता है यदि लग्न में ग्रह
नहीं हो ओर द्विताय और द्वादश स्यान में शुभ ग्रह हों तो भी शुभ योग होता है।
फल-वाग्मी (वक्ता) हो, रूप शील गुण युक्त हो । ( वृ० पा० )।
अशुभ योग या पाप योग-लम्न में केवल पाप ग्रह हो तो पाप योग होता है ।
यदि लग्न में ग्रह न हो द्वितीय द्वादश भाव में पाप ग्रह हो तब भी अशुभ योग होता
है। फल कामी हो, पाप कमं करे, दूसरों का पंसा खाने वाला हो (वृ० पा०)। २. सिंहासन योग-२,६,८,१२ इन ४ स्थानों में सब ग्रह हों। फल--राज
सिहासन प्राप्त हो ।
३. ध्वज योग--सब पाप ग्रह अष्टम भाव में हों और सब शुभ ग्रह लग्न में हों । 'फछ--सुरुष नायक या राजा हो ।
४१६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
४. कारिका योग--७, १० या ११ भाव में सब ग्रह हों अर्थात या तो सप्तम में
सब ग्रह हों या १० भाव में सब ग्रह हों या लाभ में सब ग्रह हों। फल-नोच वंश में
होकर भी राजा होता है। यदि राजवंश में उत्पन्न हुआ हो तो राजा होने में क्या
शंका है ।
५, एकावली योग--लग्न से या अन्य भाव से क्रम से समस्त ग्रह हों । फल---
महाराजा हो ।
६. चतुः सागर योग--चारों केन्द्रों में सब शुभ और पाप ग्रह हों । फल--सब
अरिष्ट दूर कर धन देता है। राजयोग होता है । बहुत रत्नों से यकत, हाथी घोड़ा
धनों से परिपूर्ण पृथ्वीपति होता है । (ल० चं०) अन्य मत-१,४,७,१० इन्हीं राशियों
में सब शुभ और पाप ग्रह हों तो भी यह योग होता है (मान०) ।
७. अमर योग--मेष व सिंह का सूर्य केन्द्र या त्रिकोण में हो ओर चन्द्र वृष याः
ककं राशि ८ या १२ भाव में हो और दोनों पर क्रमशः गुरु शुक्र इनकी दृष्टि हो
` (जा० सं०) । फल-सब कष्ट का नाश करता है।
अत्यमत-सब पाप ग्रह या सब शुभ ग्रह चारों केन्द्रों में हों । सब कर ग्रह केन्द्र
में हों तो-पृथ्वीपति हो । सब शुभ ग्रह केन्द्र में हों तो-लक्ष्मीपति हो (मान०) |
८, हँस योग--छरन से १, ५, ७, ९ इन्हीं घरों में सव शुभ या पाप ग्रह हों ॥
फल-वंश. का पालन करने वाला हो । अन्य प्रकार-१, ७, ८५ ९, १०, ११ इन्हीं
राशियों में सब ग्रह हों तो पदार्थों से परिपूर्ण राज पूज्य और राजा के अमान हो
( जा० सं० )। अन्यमत-१, ५, ७, ८, ९, ११ इन्हीं स्थानों में सब गृह हों तो उपरोक्त फल हो (मान०) ।
९. राजहंस--१, ३, ५, ७, ९, ११ इन राशियों में सब प्रह हों। फल--राज्य
स्थात और सुख प्राप्त हो (जा. सं.) । अन्यमत-१, ३, ५, ७ ९ इन राशियों में
सब ग्रह हों तो उपरोक्त फल हो (मान.)
१०. दरिद्र विधायक योग--सूर्यादि सब ग्रह वाई ओर को वामावतं के ही क्रम
से ७ स्थानों में स्थित हों तो यह योग होता है इसमें अन्य मत का विचार नहीं करना।
फल-दरिद्री हो ।
११. नन्दा योग--३ घरों में २, २ ग्रह हों और ३ घरों में १, १ ग्रह हो फल- दीर्घायु ओर सुख भोगी हो (मान.) । अन्यमत--२, २ राशियों में २ ग्रह होंबें और
३ स्थानों में १, १ ग्रह हों तो उपरोक्त फल (जा० सं०) ।
१२. दाता योग--छूग्न में गुरु, चतुर्थ में शुक्र, सप्तम में बुध, दशम में मंगल हो
ये चारों ग्रह चारों केन्द्र में हों । फल--उत्तम हो ।
१३. चिल्ह पुच्छक योग--योगाधियोग ।
(१) सिंहांसन और डमरु योग में यदि लग्न में ७,१०,१ राशि पड़ जावे तो यह चि० पु० योग होता है ।
(२) राजहंस योग में लग्न में ४,१०,११,३ राशि हो तो उपरोक्त योग होता है)
नाभस आदि योगः: ४१७
(३) ध्वज योग में मकर या ककं लग्न हो । द्र (४) चतुःसागर योग में २,६,८ या १२ राशि लग्न में हो तो उपरोक्त योग होता है । र उपरोक्त योगों में चिल्ह पुच्छक उनके फल को दुगुना कर देता हे । ओर महाफल को देने वाला होता है । इसी से इसे योगाधियोग कहते हैं । किसी का मत है कि यहे लग्न में भी हो जाता है।
कुम्भ ळग्न को छोड़कर अन्य लग्न में यह योग पड़े तो वह राजा का मन्त्री, गो, भसे, घोड़ा, हाथी से युक्त, नीति जानने वाळा अनेक पुत्रों से युक्त होता है। १४. ललाटिका योग_-चन्द्र से अष्टम भाव में चन्द्र की राशि में सूरये, मंगल, शुक्र, शनि हो ओर केमद्रुम योग सम्पूर्ण हो तो यह योग होता है । फल--जन्म से लेकर चित्रकारी में प्रसिद्ध, शिल्पकार्य में चतुर, अकुशल आकार वाला, वह जन्मान्तर में भी विविध धन की राशि को नहीं त्यागता (जा० स०)। अन्यमत--अष्टम स्थान में चन्द्र हो ओर चन्द्र के घर कक में सूर्य, शुक्र, शनि हों, पूर्णतः केमद्रुम योग हो तभी यह योग होता LD फल--जिसकी कुण्डली में कारक ग्रह हो और ललाटिका योग आ पड़े तो वह खूब प्रसिद्धि पाने वाला, शिल्प आदि कर्म में चतुर, कुशल की आकृति के समान आकृति वाला अनेक पुत्र संतान वाला, अनेक प्रकार लक्ष्मी युक्त हो लक्ष्मी उसे जन्मान्तर में भी नहीं छोड़ती (मान०) ।
१५. महापातक योग-पाप ग्रह सहित चन्द्र राहु से युक्त हो और गुरु की दृष्टि हो तो यह योग होता है ।
फळ--वह इन्द्र के समान भी हो तो महापातकी होता है । १६. वलीवदंहन्ता योग--लग्न को मंगल न देखता हो और सूर्य लग्न को देखता हो और गुरु, शुक्र लग्न को न देखते हों तो गह योग होता है । फल--बैल के हेतु से मृत्यु पाताहै। ` . १७. मदन योग -दशमेश शुक्र युक्त लग्न में हो, लाभेश उच्च गत धन स्थान में हो फल-- दिव्यगुण से युक्त राज मंत्री, विलासिनी प्रिय हो २० वर्ष के अनन्तर स्वगं में इन्द्र पद पावे ।
१८. वृक्षहंता योग--छग्न में शनि सूर्यं दोनों का योग हो और राहु की दृष्टि हो उसका वृक्ष पर मरण होता है चाहे शक्र के समान भी हो (जा० सं०) । अन्यमत- कु'डली में मदन योग हो ओर.लग्न को राहु देखता हो तो वह वृक्ष से गिरकर मरे चाहे इन्द्र के बराबर क्यों न हो (मान०) ।
१९. हठहंता योग-चन्द्रमा लग्न से ग्यारहवें स्थान में हो और कर्क में सूर्ये हो
उसका हठ से मरण होता है इसमें पञ्चरात्रि अवधि विशेषकर समझना ।
२०. कणंच्छेद रोग--छग्न में सूर्य शुक्र दोनों हों चन्द्रमा पर शनि की दृष्टि हो और कोई शुभ ग्रह चन्द्र को न देखते हों तो उसका कर्णच्छेद योग होता हे ।
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४१८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
२१. नासाच्छेद योग--शुक्र षष्ठ भाव में हो ओर मंगल लग्न में हो तो नासाच्छे-
दन करने वाला होता है ।
२२. पाद खंज योग--शनि शुक्र से युक्त हो या शुक्र गुरु दोनों एकत्र हों और
कोई शुभ ग्रह उसे न देखता हो तो वह पैर से लंगडा हो ।
२३. सर्प हंता योग--लग्न से सप्तम घर में शनि सूर्य और राहु तीनों हों तो
उसे सोने में सपं काटता है जिससे मृत्यु हो ।
२४. व्याघ्र हृत योग- गुरु के स्थान में बुध हो और शनि के स्थान में मंगल हो
तो २५ वर्षे में वन में सिह से हत होता है ।
२५. असिघात योग- शुक्र के घर में चन्द्र हो या चन्द्र के स्थान ककं में शनि
हो तो २८ वषं में तलवार लगने से मृत्यु हो ।
२६. ब्रह्वाघात--सूयं के साथ मंगल हो और गुरु युक्त शनि हो तो २८ वर्ष में
ब्रह्मघाती हो (जा० सं०) । अन्यमत--सूर्य के साथ मंगल हो या गुरु के साथ शनि
हो तो उपरोक्त फल हो (मान०) ।
२७. पद विच्छेद योग--लग्न में मंगल हो और शनि सूर्य राहु इनसे दुष्टं हो
तो इन्द्र के समान ही क्यों न हो किसी प्राप्त हुए ऊँचे अधिकार के पद से च्युत हो
जाता है।
२०. अथेच्छातो मृत्यु योग--केन्द्र में मंगल, सप्तम घर में राहु हो तो जब अंतः
करण से मरण की इच्छा करे उसी समय मृत्यु हो ।
२९. अल्प मृत्यु योग--छूग्न से सप्तम में चन्द्र हो और पाप ग्रह अष्टमं में हो
तथा शुभ ग्रह लग्न में हो ओर लग्न में सूर्य हो तो बालक एक वर्ष के भीतर मर जावे
( मान० ) । अन्यमत--छग्न से सप्तम में चन्द्र हो, पाप ग्रह अष्टम नवम और लग्न
में हो तो १ वर्ष के अन्त में बालक का मरण हो ( जा० सं० ) ।
३०--पंच अपत्य नाश योग--( संतान नाश योग ) सूर्य के स्थान सिंह में चन्द्र
गुरु स्वस्थानी हो तथा लग्न के विचार से चतु हो सागर योग भी हो तो यह योग
होता है । यह योग संतान नाश करने वाला है ।
३१--दोला योग--सब ग्रह १२, १,,९ इन्हीं ३ घर में हो तो राज्य देने वाला
होता है ( मान० ) । अन्यमत--१२, १, ९ इन राशियों में सब ग्रह हों तो यह योग
राज्य दायक है ( जा० सं० ) ।
३२. केन्द्री गुरु फल--पाप ग्रह से हीन होकर गुरु केन्द्र में हो अर्थात् और कोई
भी पाप ग्रह केन्द्र में न हो केवल गुरु हो । फल--सन्मान, मान गुण इनका पात्र और
सत असत की परीक्षा करने वाला, कलाओं का निधि चतुर, गाने बजाने में कुशल,
मंत्रियों का स्वामी, राज सभा में पंडित होता है ।
३३. कुसुम योग-ळग्न में गुरु सप्तम में चन्द्र, चन्द्र से अष्टम में सूर्य हो तो
भूमिपाल वंघुरक्षक हो, २० वर्ष के भीतर ग्राम अधिकारी हो । ३४. नाग योग--दक्षमेश किसी राशि के अंश चन्द्र में हो और उस राशि का
नाड आदि योग : ४१२९
स्वामी दशम में लम्नेश से युक्त हो तो १६ वर्ष के भीवर सळ विद्या सम्पन्न विनय संयुक्त राजप्रिय हो विशेष घन अर्जन करे । ३५. नांभि योग--नवम में गुरु हो गुरु स्थित राशि से एकादश चर में नवमेश शुभ ग्रह या चंद्र से युक्त हो तो- विद्यावान्, सुखयोगी, राज पूजित, अभिमान युक्त ये सब २१ वर्ष के भीतर हो, २३ वर्ष के भीतर हजारों रुपया संपादित हो... ३६. भेरी योग--लग्नेश द्वितीय भाव में उच्च का हो वह दगमेश मे दृष्ट हो तो ३६ वर्ष के भीतर भेरी मृदंग आदि से आनन्द प्राप्त हो अश्व गज आदि का अधिपति हो । अन्य भेरी योग प्रकार-(१ ) नवमेश वळी हो १२,१,२ और ७ भाव में सव ग्रह हों । (२) या नवमेश बली हा और शुक्र गुरु और लग्नेश केन्द्र में हो तो घन स्त्री पुत्र युक्त राजा हो कीति गुण युक्त आचारवान् सुखी भोगी हो ( वृ० पा० ) 1 अन्य-(१) दशमेश वली हो १२,१,२,७ भाव में सव ग्रह हों तो भेरी योग होता है । फल-दीर्घायु, रोग भय से रहित, राजा, बहुत धन भूमि पुत्र स्त्री से युक्त, प्रसिद्ध आचारवानू, पुणं सुखी पराक्रम से युक्त महानुभाव, प्रत्येक कार्य में निपुण, कुलीन (जाऽ पारि०)। ३७. वसुमीन योग--नवम स्थान व नवमेश से नवम स्थान में दशमेश उच्च का हो तो २४ वर्ष के भीतर राजाओं से नमस्कृत युक्तकर्मकृत् जनाधिपति हो । ३८. पर्वंत योग--लग्नेश जिस राशि पर हो उसका स्वामी केन्द्र त्रिकोण में स्वक्षेत्री या मूल त्रिकोण का हो तो ३० वर्ष के भीतर ग्रामाधिपति जन भूषित, रोग रहित हो । अन्य--यदि राशि के स्वामी में लग्न का स्वामी हो और काहल योग के प्रकार से हो तो भी पर्वत योग होता है--इनसे स्थिर धन और सुख स्थिर कार्य कर्ता पृथ्वीपति हो । अभ्यमत--सप्तम और अष्टम भाव में कोई ग्रह न हो (फल०) अथवा ग्रह हो तो शुभ हो तथा सब शुभ ग्रह केन्द्र में हों तो पर्वत योग होता है। फल-- भाग्यवान् वक्ता शास्त्रज्ञ हास्यप्रिय, यशस्वी, तेजस्वी, ग्राम का प्रधान-मुखिया हो ( वृ० पा० ) |
३९. काहल योग--छऱ्नेश स्थिर राशि का स्वामी होकर चन्द्र से केन्द्र में हो और वली हो, वलीग्रहों से दृष्ट हो तो--वह भाग्यवान्, कामी, भोगी, १२ वर्ष के भीतर महान् पंडित व राजा हो । अन्य--राशि का स्वामी लग्नेश युक्त जहाँ हो उस राशि का स्वामी उच्च या स्वगृही कोण या केन्द्र में हो तो काहुल योग होता है—वह अच्छी उन्नति करे. सुमति प्रसन्न दयालु और क्षमाशील हो । अन्य०--(१ ) लग्नेश बली हो चतुर्थेश और गुरु परस्पर केन्द्र और नवमेश एक साथ में कोई अपने उच्च या स्वराशि में हों तो दोनों प्रकार से काहल योग होता है । फल--बली, साहसी, धूतं चतुर ओर कुछ गाँव का मालिक हो (वृ० पा०) । अन्य०-- (१) नवमेश और लग्नेश वलवान् हो तो काहल योग होता है । (२) चतुर्थेश अपने उच्च या स्वस्थानी हो दशमेश से युक्त या दृष्ट हो तो भी काहल योग होता है। फल--ओर कुछ गाँवों का
स्वामी होता है ( जा० पारि० ) 1
४०. श्री योग--धन ओर भाग्य स्थान इन स्वामियों से युक्त हों और गुरु की
४२० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
दृष्टि हो तो २२ वर्ष के भीतर वुद्धि प्रधान, राज्य, संतति युक्त हो शत्रु को जीतने
चाला हो ।
४१. श्रीनाथ योग- -सप्तमेश केन्द्र में हो, दशमेश उच्च में होकर नवमेश के साथ
हो । फल- इन्द्र के समान राजा हो ।
४२. मृदंग योग-लग्नेश शुक्र से युक्त परमोच्च स्थान में हो और परमोच्च
स्थानाधिपति केन्द्र में हो तो राजा, ग्रामाधिपति; वाहनाधिपति व सुख युक्त हो । अन्यलग्नेश वली हो और अपने उच्च या गृह में होकर अन्य ग्रह केन्द्र में हों तो मृदंग योग
होता है । फल--सुखी, राजा, या राजा के तुल्य हो ( वृ० पा० । अन्य--उच्चगत
ग्रह का नवांश पति केन्द्र या त्रिकोण में हो और अपने उच्चगृही या स्वगृह में होकर
बलवान् हो लग्नेश भी बली हो तो मृदंग योग होतो है ।फल--कल्याण रूप, राजा के
सदृश यश ( जा० पारि० ) ।
४३. शारद योग--१-दशमेश पंचम में, बुध केन्द्र में, सूर्य स्वगृही हो, २-या चन्द्र
से ५,९ भाव में गुरु व बुध हो, ११ भाव में मंगल हो तो शारद योग होता है । फल
राजमान्य तपस्वी धर्मात्मा ( वृ० पा० ) ।
अन्य--१-दशमेश पंचम में हो, बुध केन्द्र में, सूर्य स्वगृही हो या, २-चन्द्रमा से
त्रिकोण में गुरु, बुध से त्रिकोण में मंगल, बुध से लाभ में शुभ ग्रह हो तो शारद योग
होता है । फल-र्स्त्री पुत्र बंधु सुख गुण में अनुरक्त, राजा का प्रिय, गुरु ब्राह्मण देवभक्त विद्या विना ही, कामुक तप तथा बल युक्त स्वधमं में लीन ( जा० पारि० )1
४४-सुख योग--धन; भाग्य लाभ स्थानेश कोई एक चन्द्र के केन्द्र में हो तो १६
वषं के भीतर सुखी राजा हो ।
४५-साम्राञ्य योग-नवमेश अंश चक्र में जिस राशि पर हो उस राशि का स्वामी
गुरु से युक्त धन राशि में हो ( गुरु धन राशि का भाग्येश हो ) तो निसंदेह राजा हो।
४६-दुर्गेश योग-राहु स्थित अंश राशि का स्वामी पंचम नवम दा उच्च का हो
और मंगळ षडयन्त्र युक्त हो नवमेश सप्तम स्थान में हो तो वन भूमि का अधिपति हो ।
४७-अर्थ योग-द्वितीयेश और चतुर्थेश नवम में हो नवमेश बलवान् होकर द्वितीय
स्थान में हो, लग्नेश उच्चगत लाभ में हो तो कोटी का घन पति हो ।
४८-न्रिकूट योग-लग्न चर राशि हो उसमें गुरु हो, स्थिर राशि में शुक्र हो
ढिस्वभाव राशि में बुध हो तो दुगं का अधिपति हो ।
४९-चामर योग-चतुर्थेश उच्च में हो, उच्च स्थानेश भाग्य स्थान में हो और
लग्नेश से युक्त हो तो राज पूजित, देश अधीश्वर, विद्वान् ग्रंथकर्ता, सभा वांदकारी,
सुख सम्पन्न, गौरवशाली हो । अन्य १-छग्नेश उच्च का होकर केन्द्र में हो उस पर
शुभ ग्रह की दृष्टि हो या, २-शुभ ग्रह ९,१० या ७ भाव में हो । फल--राजा या
राज मान्य, दीर्घायु, पंडित, वक्ता, सब कलाओं का ज्ञाता ( वृ० पा० ) । अन्य
१-लग्नेश उच्च का होकर केन्द्र में हो गुरु से दृष्ट हो या २,१,७,९,१० भाव में २
शुभ ग्रह हों तो चामर योग होता हे । फछ--टोज पुज्य, विद्रा, कदा, बॉडत, राजा, सर्वज्ञ, वेद शास्त्र अधिकारी, ७० वर्ष आयु ( जा० दा |!
५०-शिव योग-पंचमेश नवम मॅ, नवमेश दश
राजेश के केन्द्र में बुध हो-तो मिष्ठान्न भोजी, व्राह्मण सं
पाठक, पुर्णायु ।
५२-गौरी योग-राज्येश स्थित अंश राशि का स्वामी राज्य स्थाद में हो लग्नेश
से युक्त गुरु हो तो ३६-वर्ष के उपरांत दाता, कीतिमान्, भूमि सवानी भोगी
संतति होता दै । अन्य--नवमेश चन्द्र हो वह स्त्रगृही या उच्च का केन्द्र या त्रिकोण
में हो उस पर गुरु की दृष्टि हो तो गौरी योग होता है । फल-- सुन्दर अंग, इलाघित,
राजा का मित्र, पुत्र अच्छे आचरण के हों, कमळ सदृश मुख, विरोधियों
सवसे स्तुति प्राप्त ( फल० ) ।
५३-लक्ष्मी योग-भाग्येश स्थित अंश राशि का स्वामी भाग्य स्थान में हो,
उच्चगत पंचमेश से . युक्त हो तो आप्तं, कीतिमान्, घनवान्, लक्ष्मीवान्, राजा हो
अन्य-नवमेश.शुक्र हो वह स्वगृही या उच्च का होकर त्रिकोण या केन्द्र में हो तो लक्ष्मी
योग होता है । फल--लक्ष्मी का पात्र अच्छे वाहन पर वेठे या यात्रा करे, राजाओं
में श्रेष्ठ, अपने जनों को आनन्द देने वाला, दाता ( फल० ) । अन्य--लग्नेश बलवान्
हो भाग्येश फल त्रिकोण या उच्च या स्वगृही होकर केन्द्र में हो तो लक्ष्मी योग होता
है । फल--सुन्दर गुणी, राजा बहु पुत्र, धनी यशस्वी, धर्मात्मा हो ( वृ० पा० ) ।
अन्य--भाग्येश परमोच्च या फल त्रिकोण में होकर केन्द्र में हो और लग्नेश
बलवान् हो तो लक्ष्मी योग होता है ।
फल--सुन्दर' गुण वाळा, बहुत देश का स्वामी, विद्या अर कीति से यक्त
कामदेव सदृश सुन्दर, दश दिशाओं में राजाओं से पूजित, श्रेष्ठ राजा, बहुत स्त्री तथा
पुत्र युक्त हो ( जा० पारि० ) ।
५४-भारती योग-२, ५, १०, स्थान का स्वामी उच्च में नवमेश युक्त हो ।
ऋरछू--त्रिछोक में विख्यात, सर्वज्ञ, दान प्रिय, उत्तम स्त्रियों का भोग कर्ता मुदु शरीर
कमल नेत्र, ब्रोह्मण भक्त कवि अल्पाहारी ये सब ४८ वर्ष में प्राप्त हो ।
भ५-कलानिधि-३,११ भाव का स्वामी सप्तम स्थान में हो सप्तमेश द्वादश भाव
में उच्च का हो, द्वादशेश गुर युक्त नवम स्थान में हो । तो मद्दामनस्वी, राज्याधिपति,
यशस्त्री मानी, ५० वर्ष से अधिक आयु ।
अन्य-ख्रुध शुक्र रो युक्त या दृष्ट गुरु २,५ भाव में हो या बुध शुक्र के राशिस्थ हो ।
फरू--गुणी, राज मान्य, निरोग, सुखी, धनी, विद्यावान् ( बुक पा० ) । De
५६-देवेन्द्र योग-~जन्म लग्न स्थिर हो उसका स्वामी लाभ में हो २,१० भाव
के स्वामियो का परसुणर परिवर्तन हो लग्नेश बलवान् होकर लग्न में हो तो साँदयंवान,
४२२ : सांचत्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
नारी प्रिय, की तिमान्, दुर्ग का अधिकारी, बलाधिप, बल शौयेवान् ६० वर्ष से
अधिक आयु ।
५७-विभावसु योग-मंगल स्वगृही व दशम स्थान में हो सूर्य उच्च का द्वितीय भाव में हो गुरु औरं चंद्र नवम स्थान में हों तो १२ वर्ष पर्यंत वंश प्रदीप, धनवान्, राजप्रिय भूमि स्वामी होता है ।
५८-नालक योग-भाग्येश स्थित नवांशेश लग्न में उच्चगत हो तो १२ वर्ष के
बाद राजा हो ।
५९-इन्द्र योग-पंचमेश लग्नेश का परस्पर परिवतंन हो, चंद्र पंचम स्थान में
हो तो सदा स्तुत, कीर्तिवान्, विशेष पराक्रमी, राजाधिराज भोगवान् हो ।
अन्य०-चन्द्र से तीसरे मंगल, मंगल से सातवें शनि, और शनि से सातवें शुक्र हो,
शुक्र से सातवे गुरु हो तो इन्द्र योग होता है।
फल-विख्यात “शील वालो, गुणवान्, राजा हो या राजा के तुल्य धनी हो, वाचाल,
अनेक प्रकार से धन भूषण यश रूप प्रताप से युक्त हो ( जा० पारि० ) ।
६०-रवियोग-सूर्यं दशम स्थान में हो और दशमेश सूर्य सहित तृतीय भाव में
हो तो शास्त्राथं प्रक्रिया का सम्पन्न ज्ञाता, यथेष्ट काम युक्त भूमंडल का स्वामी,
स्वल्पाहारी, कमल सम नेत्र, राजाओं में वंदनीय होता है ।
६१-भास्कर योग--सूर्य से दूसरे बुध, बुध से ग्यारहवें चन्द्र, चन्द्र से त्रिकोण में गुरु हो ।
फल-पराक्रमी, प्रभु के सदृश, शास्त्रार्थविद्, रूपवान्, गांधवं विद्या का ज्ञाता, धनी, गणितज्ञ, धीर, समर्थ ।
६२-पारिजात-छग्नेश जिस राशि में हो उस राशि. का स्वामी जिस राशि में हो उसका स्वामी या उसका नवांशेश यदि केन्द्र या त्रिकोण में हो या अपनी उच्च
राशि में हो ।
फल-प्रष्य "गैर अंत्य अवस्था में सौख्य युक्त, राजाओं से पूजित, युद्ध प्रिय, हाथी घोड़ों से युक्त, अपने कमं धमं में रत और दयालु राजा । ६३-गजयोग-लग्नेश स्थित राशि से नवम राशि का स्वाप्ती ११ वें स्थान में चन्द्र युक्त इस भावेश से दृष्ट हो तो अश्वगज आदि वाहन २० वर्ष अनन्तर होते हैं । ६४-गंगा प्रवाह योग-षष्ठ में गुरु शुक्र हों, बुध सप्तम मकर राशि में हो, ५,७, ११ स्थानों में क्रमशः चन्द्र सूयं शनि हों तो तेजस्वी, धनवान्, अनेक भार्या पुत्रादि युक्त राजा, दिद्यावान्, विनोदी, गोष्ठी प्रिय, जितेन्द्रिय, यूर्णायुष्क: विनय सम्पन्न । ६५-अमरक योग-सप्तमेश, नवशेश बलवान् हो, परिवर्तन इनफा हो तो आजान बाहु, पद्म पत्र नेत्र, व्यायाधिकार निपुण, कलत्र सौख्यवान्, ५० वर्ष के अनन्तर सुखों का अनुभव होता है ।
६६-कामिनी योग-गुरु द्विताय, शुक्र चतुर्थ, चन्द्र सप्तम, मंगल लाभ भाव में हो तो नगर गामाधिपत्य, भोग प्राप्त, प्रतापी हो ।
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नाभस आदि योग : ४२३
६७-नालीक योग-पंचमेश नवम में, चन्द्र छाभेश से युक्त धन में हो तो राजा- धिराज, राज मान्य, षोड़श विद्या दान कर्ता, ५० वर्ष से अधिक जीवे । ६८-भद्र योग-गुरु चन्द्र दशम में हों, धनेश लाभ में हो और लग्नेश शुभ गूहों से युक्त हो तो मानस ज्ञान और सब कार्य में समर्थ, धनवान् हो 1
६९-नुप योग लग्नेश स्थित अश राशि का स्वामी, चन्द्र स्थित राशि युक्त हो राजयोग से दृष्ट हो तो आलोचन शक्ति युक्त मंडळाधिपति, धेयंवान्, सैन्याधिपति ' प्रसिद्ध तथा सुखी होता है ।
७०-धूम्र योग--मंगल स्थित अंश राशि का स्वामी त्रिकोण में शुक्र गुरु हो, ` दशभ में उच्च का शनि हो तो सुखी, सुख दाता, धैर्य गुण सम्पन्न, धनवान् राज पूज्य हो ।
७१-मृतयोग-अष्टमेश स्थित अंश राशि का स्वामी शुभ स्थान में शुभ ग्रह युक्त
हो, नवमेश उच्च स्थान में हो तो कर्ण समान दाता, धर्मात्मा, धनवान्, बलवान् हो
यह १९ वर्ष तक जीता है।
७२-गन्धर्वं योग-सप्तम से त्रिकोण में दशमेश हो, बली सूर्य उच्च में हो नवम
स्थान में चन्द्र हो, लग्नेश गुरु युक्त हो तो गन्धर्व विद्या, नंपुण्य, बलवान्, कीतिमान्,
भोगी हो ६५ वषं तक जीता है!
७३-चण्ड योग-लग्न में उच्च का ग्रह हो वह मंगल से दुष्ट हो और नवमेश
तृतीय स्थान में हों तो सेनाधिपति, वाहनाध्यक्ष, बलवान् ६० वषं तक जीवित रहे।
७४-नागेन्द्र योग-भाग्येश गुरु से दृष्ट होकर सप्तमेश स्थित राशि से नवम
राशि पर हो तो सुन्दर विद्वान् ६ वर्ष बाद यावत् जीवन सुखी रहे।
७५-मुकुट योग-नवमेश स्थित राशि से नवम स्थान में गुरु हो गुरु से नवम
स्थान पर शुभ ग्रह हो, दशम में शनि हो तो दुर्गाधीश, राजा कोल भिल्ल का स्वामी
दुर्मार्गी हो ।
७६-चित्र योग-धनेश नवम स्थान में, नवमेश लाभ में, लाभेश परमोच्च में हो
तो बुद्धिमान्, शास्त्र निपुण, कुशील हो, राजवंशज हो तो राजा हो ।
७७-वृष्टि योग-क्र्मं भावांश पति की मध्य स्थिति, चन्द्र उच्च स्थान में हो ।
जन्म रात्रि समय हो, लग्न में चर राशि हो तो व्यापारी, धनवान्, समर्थ २७ वर्ष के
बाद सुखी हो ।
७८-चन्द्रिका योग-षष्ठेश सहित नवमेश भाग्येश के अंश में सूर्यं से युक्त हो,
लग्न स्थिर हो षष्ठेश से दुष्ट हो तो शोर्यवान्, दाता, धनाध्यक्ष, कीतिमान्, मंत्री
१०० वर्ष तक आयु ।
9९-भूप योग-राहु स्थित अंश राशि का जो स्वामी हो उसके त्रिकोण स्थान में
उसका स्वामी हो इस पर मंगल की दृष्टि हो तो--शत्रु नाश कर्ता, सेनाधिपति,
राजेश्वर हो ३४ वर्ष के अनंतर राज्य भार वाही हो ।
८०-नासीर योग-ळग्नेश और गुरु चतुर्थ स्थान में, चन्द्र सप्तमेश के साथ एक
४२४ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
राशि में हो, छग्नेश शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तो अन्नदान में रत, भोगवान्, स्थूल काय, ३३ वर्ष अनंतर शभ फल हो ।
८१-कऊन्तुक योग-दशमेश नवम में, धनेश लग्न में, द्वितीय और दशम पर शुभ अह की दृष्टि हो तो--चातुर्य युक्त वाणी, शत्रु नाश कर्ता, दान, धर्म, धन युक्त समर्थ
१०० वर्षे आयु । ८२-चन्द्रिका योग-मंगल पञ्चम स्थान में, भाग्येश स्थित राशि का स्वामी
भाग्य स्थान से पंचम हो तो अनेक स्त्रियों से रमण कर्ता, स्त्री संतति पुत्र शोक से
दुःख अनुभावक, सम वय में सुख का अनुशीलन होता है ।
८३ रसातल योग-व्ययेश परमोच्च भाग में हो शुक्र चतुर्थेश से दृष्ट होकर व्यय
स्थान में हो तो भूमि धन का रक्षणकर्ता राजा हो ।
८४-युग्म योग-चतुर्थेश नवम में शुभ ग्रहों स युक्त हो गुरु से दृष्ट हो तो जीवनभर सुखी रहे राजलक्ष्मी युक्त रहे ।
८५. अंगुल योग--पञ्चमेश स्थित अंश राशि का स्वामी उच्च स्थान में बुध
और दशमेश युक्त हो तो वस्त्र आभरण सहित गौ भूमि धन युक्त मध्यायु हो ।
८६. भव्य योग--दशम में चन्द्र हो, चन्द्र स्थित अंश राशि का स्वामी उच्च
स्थान में भाग्येश, धनेश से युक्त हो तो धन ऐश्वर्य संयुक्त, प्राज्ञ सुगुणवानू विद्या
निपुण हो । ८७. योगि योग--भाग्येश त्र्यंश में राज्येश हो, राज स्थान में गुरु हो तो सुखदाता, राज सभा में माननीय, स्त्रियों को प्रिय ४२ वर्ष से अधिक आयु । ८५८. गारुड़ योग--चन्द्र स्थित अंश राशि का स्वामी उच्च में हो शुक्ल पल में दिन का जन्म हो तो सज्जन पूजित, मृदुभाषी, शत्रु नाश कर्ता, वल्वान् ३४ वर्ष में विषय युक्त हो ता है ।
८९. देव योग--लग्तेश के त्र्यंश में भाग्येश हो और इतके नतांश का स्वामी भो साथ हो और जन्म दिन का हो तो ऐश्वर्यवान्, कोति युक्त; सुबुद्धि बलवान् हो ३२ वर्ष के पश्चात् फल हो ।
९०. धर्मे योग--गुरु शुक्र नवम भाव में लाभेश युवत हों धनेश से दृष्ट हो तो सेनापति, धनवान्, युद्धाभिलाषी, दाता, धार्मिक होता है । ९१. क्रोध योग-पञ्चमेश राहु युक्त हो मंगल से दृष्ट हो, लाभेश के अंश में हो ती पाप कमे, धन आगम, दान परायण, साहसिक घरोध दपं, भयान्वित होता है । ९२, अंग योग-केन्द्र त्रिकोण के स्वाभियों का त्रिशांशेश शुभ ग्रह हो तो-जोवन अर सुखी 'रहे । ओ त्रिशाशेश-मंगल हो तो-क्रोधी, शनि-क्रर स्वभाव । गुरु-पुराण फलश्वोता । बुध-जञानवान् । शुक्रःत्यागी ।
९३. मारत योग-राहु ३,६ या ११ भाव में हो और लग्न शुभ ग्रह से दृष्ट हो- तो इसमें भावोकत पाप फल नहीं होता । न 7
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नाभसं आदि योग : ४२५
अन्य-शुक्र से कोण में गुरु हो, गुरु से पांचवें चन्द्र से केन्द्र में सूयं हो तो मरुत योग होता है ।
फल-वाचाल विशाल हृदय, स्थूल, उदर-शास्त्र का ज्ञाता, धन सम्पन्न, क्रय-विक्रय में निपुण, राजा या राजा के सदृश धनी हो (जा० पारि०) ।
९४. थोमत योग-भाग्येश, राज्येश का परस्पर परिवर्तन हो और गुरु की दृष्टि
हो और लग्नेश से युक्त हो तो श्रीमान्, कार्यो में निपुण, भोक्ता, दाता, चिरायु हो ।
९५. दश योग-लग्न से ६,७ स्थानों में सब ग्रह वल युक्त हों तो प्रभू, धनवान् कीतिमान्, भोगवान् होता है
९६. इष्ट पाल योग-जन्म में सव ग्रह आपोक्लिम (३,६,९,१२) में हो तो राज्य
देने वाला होता है सुखी और पुण्यवान् हो ।
९७. अमोघ योग-सव शुभ ग्रह स्वोच्च या मूल त्रिकोण में हों तो राज सम्बन्धी
धन प्राप्त हो ।
९८. क्षेम योग-१,८,६,१० भाव के स्वामी स्वक्षेत्री हों तो कुट॒म्व क्षेत्र में
आसक्त हो, ऐश्वर्यवान् हो ।
९९. केशरी योग-चन्द्र के केन्द्र में गुर हो तो सिंह समान सव शत्रुओं का नाश
कर्ता, सभा में ढिठाई से बोलने वाळा, राजस वृत्ति का, दीघं जीवी, अति यशस्वी,
अति वुद्धिमान् अपनी शक्ति से सव से जय प्राप्त करे ।
१००. आय योग-लर्नेश, गुरु, शुक्र ये ३ ग्रह केन्द्र में हों तो दीर्घाय् हो ।
१०१. उत्तम योग-सूयं से आपोविलम में चन्द्रमा बलवान् होकर बैठा हो तो
नीति कुशल, धनवान्, ज्ञानवान् कायं निपुण हो ।
१०२. धनाकर्षण योग-लग्नेश लाभ में लाभेश नवम मे, नवमेश सप्तम में, सप्तमेश पञ्चम में, पञ्चमेश द्वितीय में द्वितीयेशे लग्न में हो तो धन का आकर्षण
करता है।
१०३. मत्स्थ योग-लग्न और नवम में शुभ ग्रह, पञ्चम में शुभ अशुभ दानो हॉ
तथा ४,५ में पाप ग्रह हो तो काळ ज्ञाता, दयालु, गुण वुद्धि बळ रूप यशा विद्या और
तपस्या में युक्त ।
अन्य-लग्न से नवम पाप ग्रह, पञ्चम भाव पाप और शुभ युक्त, ४ या ८ भाव
में पाप ग्रह हो तो मत्स्य योग होता है उपरोबत फल (जा० पारि०) ।
१०४. उपचय योग-३,-,१०,११ स्थानों में सव शुभ प्रह हों तो जातक बहुत
धनवान् हो, दिन दिन वृद्धि हो, सौन्दर्य गुण युवत, मानयुक्त, कीतिवःन्, सुखी हो ।
१०४ अ. वसुमती योग-लग्न या चन्द्र से सव शुभ ग्रह उपचय में हों तो सदा |
अपने घर में रहे उसके पास बहुत धन रहे (फल० ) ।
१०५. कुछ बद्धेन -योग-सव शुभ ग्रह सूय चन्द्र स पञ्चम में हों तो आयुष्मान्
यारोग्यदान्, धनवान्, पुत्र पौत्रादि संयुक्त होता है ।
१०६. नौ योग-गुरु वलवान् होकर धनेश सहित मूल त्रिकोण में हो लग्नेश
४२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
उच्च में हो तो--उत्तम वंश जात, भूपति, घनवान् बलवान् हो ।
१०७. जल योग-सूर्य चन्द्रमा शानि केन्द्र मे हो या ९ या १२ भाव में हों और
अन्य ग्रह निर्बेल हों तो ऐश्वयं, ज्ञान, धन से हीन, पराया अन्न चाहने वाळा, चपल
अति दु:खी लोभी शीत प्रकृति होता है । १
५०८. काल सपं योग-राहु केतु जिस घर में हों उसके भीतर सब ग्रह हों एक
भी ग्रह बाहर न हो ।
फल---गरीब हो, दीर्घ जीवन न हो । यदि ३,४ ग्रह उच्च में हों और काल सर्प
योग हो तो गरीब तो न होगा परन्तु अधिक उन्नति शील न होगा । किसी की कुंडली
में काल सपं योग हो परन्तु केमद्रुम योगन हो ओर राजयोग हो जो केन्द्र और
त्रिकोण स्वामियों के योग से बने हों तो उन्नतिशील होगा ।
१०९. गज केशरी योग-चन्द्र से गुरु सातवें घर में हो ।
फल- आदरणीय, धनवान, दयालु उन्नतिशील बिना कोई पाप ग्रह के किसी
प्रकार के सम्बन्ध हुए यह योग हो तो उपरोक्त फल होता है । यदि पाप ग्रह का योग
वृद्धि हो तो उपरोक्त पूर्ण फल नहीं होगा ।
अन्य-लग्न या चन्द्र से गुरु केन्द्र में हो ओर शुभ ग्रह मात्र से युत या दृष्ट हो
तथा अस्त नीच शत्रु गृही न हो तब गज केशारी योग होता है ।
फल--तेजस्वी, धनवान्, मेधावी, गुण सम्पन्न, राजप्रिय हो (वृ० पा०) ।
अन्य-चन्द्र से गुरु केन्द्र में हो शुभ ग्रह से चन्द्र दृष्ट हो । शुभ ग्रह अस्त या नीच
के न हों तो गज केशरी योग होता है। फल-उपरोक्त (जा० पारि०) ।
११०. चन्द्र मंगल योग--चन्द्र से मंगल सातवें घर में हो अन्यमत से चन्द्र मंगल
एक साथ होतों ।
फल--कई शुभ उत्सव उसके घर में हों कीति मिले सुखी जीवन व्यतीत करे ।
१११. अमला योग या अमळ कीति योग-छम्न या चन्द्र से दशम स्थान में
शुभ ग्रह हो ।
फल--राजमाभ्य, भोगी, दानी, बंधुओं का प्रिय, परोपकारी, धर्मात्मा गुणी, आचारवान्, सौभाग्यवान्, धनी मृदु स्वभाव, भाषण के योग्य । ११२. महाभाग्य योग-मुरुष का दिन में जन्म लग्न और सूर्ये चन्द्र में विषम राशि या स्त्री का रात्रि में जन्म लग्न और सूर्य चन्द्र में सम राशि हो तव यह योग होता है। फल---सबको आनन्द देने वाळा, दानी, विख्यात, पृथ्वी क' राज करने वाला शुद्ध आचरण ५० वर्ष आयु । स्त्री इस योग में उत्पन्न हो तो धनी हो, पति दीघं जीवी हो पुत्र पौत्र भी दीघं जीवी हों भाग्यशाली अच्छे चरित्र वाली हो । ११३. सरस्वती योग-शुक्र गुरु और बुध त्रिकोण या दूसरे घर में हों गुरु भी
उच्च का स्वगृही या भिन्न गृही हो और वली हो तो वडा भारी बुद्धिमान् हो नाटक कविता करने या गद्य पद्य में अळंकार शास्त्र में निपुण हो, प्रवन्ध रचना शात्त्रार्थ करने में पारंगत, त्रिलोक में कीति फेले, बहुत धनी हो स्त्री और सन्तान युक्त भाग्य
नाभस आदि योग : ४२७
वान्, उन्नतशील और राजाओं में श्रेष्ठ, सबसे पूजित हो (फल०) । ११४. श्रीकंठ्योग-लग्नेश सूर्यं और चन्द्र केन्द्र वौर त्रिकोण में होकर उच्च स्वगृही या मित्र गृही हो तो रुद्राक्ष माळा से सुशोभित विभूति शरीर में लेपन करे महात्मा, सदा शिव की अराधना करने वाला, सदा सुनियम पालन करने वाळा, शिव व्रत में दीक्षित, साधुजनों का उपकार करने वाला, दूसरों के घर्म या विश्वास पर द्वेष भाव से रहित, बलवान् हो ।
११५. श्रीनाथ योग-शुक्र नवमेश हो, बुध केन्द्र या त्रिकोण में उच्च का स्वगृही
या मित्र गृही हो तो घनी, सरल वाक्य, चतुर, निपुण, शरीर में नारायण का चिह्न
शंख चक्र आदि चिह्नित, सदा गुणी, ईश्वर का नाम जिसमें हो ऐसे सुन्दर पद्य कहने
वाला, ईश्वर का पूजक, अच्छी स्त्री पुत्र युक्त, सबको प्रिय अति सुभग ।
अन्य-दशमेश दशम में स्वोच्च का हो या दशमेश नवमेश युक्त हो ।
फल- इन्द्र के समान राजा (वृ० पा०) ।
११६. विरिञ्च योग-यदि गुरु पञ्चमेश ओर शनि केन्द्र और त्रिकोण में होकर
उच्च स्वगृही या मित्र गृही हो ब्रह्म ज्ञान पराया, अतिशय बुद्धिमान्, दूसरे पवित्र
लेखों के अतिरिक्त वेदों का प्राधान्य देने वाला अर्थात् वैदिक मागं पर चलने वाला,
सब अच्छे गुणों से भूषित, सदा प्रसन्न, प्रख्यात, बहुत शिष्य हों, भाषण में सीम्य,
बहुत धन स्त्री और संतान युक्त ब्रह्म तेज से प्रकाशवान्, राजाओं से वंदित दीर्घायु
जितेन्द्रिय हो ।
११७. कुल पांस योग-(दरिद्र योग) केन्द्र में शुभाशुभ ग्रह हों, लग्नेश पर चन्द्र
की दृष्टि न हो या शुभ ग्रह पचमांशक में हों तो कुल को मरिन करता है विदेश
वासी, अपने घर से भ्रष्ट, पुत्र स्त्री रहित, दोषों के समूह से पीडित हो ।
११८. मालिका योग-लग्न से लगातार ५ घर में ५ ग्रह हों ।
षड् ग्रह योग-लग्न से लगातार ६ घर में ६ ग्रह हों ।। तो राजयोग होता है ।
सप्त ग्रह योग-लम्न से लगातार ७ घर में ७ ग्रह हों ( विना कोई शंकाके लाभ
अष्ट ग्रह योग-लग्न से लगातार ८ घर में ८ ग्रह हों | होता है ।
नव ग्रह योग-लग्न से लगातार ९ घर में ९ ग्रह हों |
११९. मालिकायोग -अन्यमत--किसी भी भाव से ७ भावों में ७ ग्रह हो तो उस
भाव सम्बन्धी मालिका योग होता है। यनि लग्न से लगातार ७ घर में ७ ग्रह हों तो
लग्न मालिका योग होगा । लग्न मालिका का फल-राजा अनेक हाथी घोड़े का स्वामी
घन आदि ७ भावों में हो तो-धनवान् पिता की भक्ति ओर गुणवान् मनुष्यों में
चक्रवर्ती हो ।
विक्रम मालिका-पराक्रमी राजा धनी और रोगी 1
सुखादि मालिका-बहुत देशों में भाग्यवान् बड़ादानी, राजा ।
पुत्रादि मालिका--यज्ञ करने वाला राजा वा कीतिमान् ।
षष्ट गृह मालिका--कभी धन सुख प्राप्त हो कभी दरिद्र हो ।
४२८ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
सप्तम गृह मालिका- बहुत स्त्रियों का स्वामी और राजा ।
अष्टम गृह मालिका--दीर्घायु, दरिद्र, श्रेष्ठ और स्त्री से निश्चिन्त ।
घमं गृह मालिका--गुण निधान यज्ञ कर्ता तपस्वी समर्थ ।
कर्म गृह मालिका--राज्य स्त्री मणि का स्वामी सवं क्रिया में दक्ष ।
व्यय भाव मालिका--बहुत खचे करने वाला सर्वेत्र पुज्य ।
१२०. राजयोग--९ और १० भाव के स्वामी शुभ भाव में हों । फल-राजाो हो
हाथी घोड़े आदि भूषित भेरी शंख नाद युक्त छत्र धारण भाट मागध आदि से वंदित
प्रसिद्ध पुरुष कई प्रकार के उपहार से सेवित ।
१२१-शंख योग--केन्द्र या कोण के स्वामी शुभ भाव में हों। फल-कई सुन्दर
'स्त्रियो के साथ सब प्रकार का भोग भोगे सम्पत्ति से पूर्ण हो ।
अन्यमत-- (१) लग्नेश बली हो और पंचमेश और षष्ठेश परस्पर केन्द्र में हों
या भाग्येश बली हो । (२) या लग्नेश और दशमेश चर राशि में हों । फल“-दयालु,
पुण्यवान्, बुद्धिमान्, सुकर्मी, चिरजीवी । ( वु० पा० ) ।
अन्य० = (१) पंचमेश षष्ठेश परस्पर केन्द्र में हों लानेश बलवान् हो ।
(२) लग्नेश दशमेश चर राशि में हों भाग्येश बली हो ।
, फल--योग शील, दयालु, स्त्रीवान्, पुत्रवान, क्षेत्रवान्, पुण्य कर्मी, शास्त्र ज्ञान
द्वारा आचार और साधु क्रिया करने वाला, ८० वषं आयु ( जा० पारि० ) ।
१२२-प्रतमाँश योग--सब ग्रह अस्त नीच और शत्रु के अंश में हों तो फलभय दुःख ओर मृत्यु कर्ता है ।
१२३-गरलांश योग- लगन में सूर्यं और चन्द्र हो, सूर्य ग्रहण का समय हो
अमावस्या का चन्द्र (कुहू) और अमावस्या की संधि में जन्मा हो, और जब विष घटी हो तो कंद, शोक, ज्ञात या अज्ञात रूप से पेचीदे रोग हों जीवन को भय हो। १२४-बुधादित्य योग--बुध ओर सूयं साथ हो, धर्मात्मा, पण्डित, धनवान्, बहु पुत्रबान्, भृत्यों सहित तथा जितेन्द्रिय । पिछले जो १. आकृति, २. संख्या ३. आश्रय और ४. दल योग बतलाये हैं उन्हीं नाम के और भी भिन्न योग है जो नीचे दिये हुँ १२५-गदा--(१) आकृति योग का १ योग से भिन्न । चन्द्र द्वितीय स्थान में “गुरु शुक्र से युक्त हो नवमेश से दृष्ट हो । फल- लोक प्रधान, गुणाढच, सुभट ५२ वर्ष तक सुख अनुभव करे ।
अन्य ०--सभी पाप ग्रह आठवें भाव में हों चन्द्रमा शुक्र केन्द्र में हों तो-वह मनुष्य पागल या बुद्धि भ्रंश या मृगी वाला हो संतप्त रहे ( स० चि० )1
१२६-शकट योग--( १ आकृति योग के दूसरे योग से भिन्न ) गुरु से चन्द्र बारहवं, आठवें और छठे घर में कहीं हो परन्तु लग्न से केन्द्र में चन्द्र हो तो शकट योग नहीं होता । फल-अभाग्पवान् और जो एक बार हानि हो चुकी हो उसे फिर से प्राप्त करे पृथ्वी में साधारण और महत्त्वहीन हो अर्थात मानसिक दुःख प्राप्त हो तो “डालने योग्य न हो अत्यन्त दुःखी हो ( फल० )1
नाहव आदि योग : ४२९
अन्य ०--चन्द्र से छठे आठवें गुरु हो ळग्न से केन्द्र में न दो टी कट योग होता:
है । फल-राज्य कुल का भी दरिद्री हो अनेक कष्ट और प्रयाद दे नित्य यंतत्त रहे,
राजा का अप्रिय हो ( जा० पारि० ) ।
१२७-पद्म योग--( १ आकृति योग के द्वे योग से सिन्द ) छग्त दे, चन्द्र
से नवम स्थान में शुक्र से युक्त लाभेश हो तो १५ वर्ष के भीतर राज पूछित भोगी पुण्यवान् हो । <
१२६-दंड योग--( १ आकूति योग के १३वें से भिन्न ) ३,४६.९१२ इन
राशियों पर सब ग्रह हों । फल-राज पद मिले, बड़ा पुष्पवान् पृथ्वीएदि, तेजोमय,
सिंह के समान पराक्रम् वाला बड़े बड़े घनी लोगों से सेवित हो ( मान ) 1
अन्य०--तृतीय स्थानेश उच्च का हो गुद तृतीय स्थान में हो मुकर से दृष्ट हों तों
गौधन भूमि से समृद्ध ग्रामाधिपत्य हो ( ज्यो० शा० ) ।
१२९-छत्र योग--( १ आकृति योग के १६वें योग के अतिरिक्त, अन्य प्रकार
का ) १.२,७,१२ भाव में सब ग्रह हों तो अपने वंश में श्रेष्ठ होता है, राजा होता है ।
१३०-चाप योग-( १ आकृति योग के १७वें योग से भिन्न प्रकार का ) कुम्भ
में शुक्र, मेष में मंगल, और स्वगृही गुरु हो तो राजा होता है ( मान० ) 1
अन्य०-चतुर्थेश दशमेश का परस्पर परिवर्तन हो लग्नेश उच्च में हो तो = वर्ष
के भीतर राज कोषाध्यक्ष हो महापराक्रमी कुल पूजित हो ( ज्यो० झा० ) 1
१३१-चक्र योग-( १ आकृति योग के २०वें योग से भिन्न ) दशम में राहु,
दशमेश लग्न में, लग्नेश नवम में हो तो २० ग्राम का अधिपति, सेनाधिपति हो, जन
स्तुति को प्राप्त हो ।
१३२-विद्युत ( दामिनी.) ( २ संख्या के योग के दूसरे योग से भिन्न ) लग्नेश
के केन्द्र में उच्च का लाभेश शुक्र युक्त हो तो त्याग, भोग में आसक्त, घनाध्यक्ष प्रभु हो।
१३३-केदार ( २ संख्यायोग के चोथा योग से भिन्त ) सब ग्रह मेषादि द्वादश
राशियों में क्रम से किसी चर राशि में हों तो-व्यापारवान्, सुखवान्, वित्तवान् हो ।
१३४-गोल योग ( २ संख्या योग के सातवें योग से भिस्त ) पूर्ण चन्द्र गुरु शुक्र
से युक्त हो, नवम स्थान में बुध लग्नांश में हो तो विद्या विनय सम्पन्न ग्रामाधिकारी
चिरायु मिष्ठान्न भोजी हो ।
१३५-रज्जु योग-( ३ आश्रय योग के पहिले योग से भिन्त ) नवमेश के द्वादशांश में पंचमेश पूर्ण चन्द्र से युक्त हो तो-विशाळ नेत्र, धनवान्, मानवान्, कोतिमान्,
पूत्रवान्, मध्य आयु का हो ।
१३६-मुसल योग ( ३ आश्रय योग के दूसरे योग से भिन्न ) दशम राहु हो,
दशमेश उच्च में हो शनि से दृष्ठ हो तो विशाल नेत्र, निर्मल मुख, मंत्री, व्यापार से
धनाजंन ।
१३७-माला योग ( ४ दल योग के पहले योग से भिन्त ) २, ९, ११ भाव के
स्वामी क्रम से ९, ११, २ स्थान में हो तो ३३ वर्ष बाद मंत्री घनाधिपति बराधिपः
कीतिमान् होता है ।
Riess ses ear
४३० : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
अन्य ०-शुभ माला-सव ग्रह॒ प्रचरित क्रम से ५, ६, ७ घर में हों तो जनाधिकारी
( गवनंर डायरेक्टर आदि ), राजा से सम्मानित, योगी, दाता, दूसरे के कार्य करने
में सहायक, अपने सम्बन्धियों से प्रेम, अच्छी स्त्री और पुत्र हो, धीर हो ( फल० ) ।
अशुभ माला-सब ग्रह प्रचलित क्रमसे ८, ६या १२ घर में हों तो कुमार्गी,
दुःखी, दूसरों को त्रास देने वाला, कृतघ्न, डरपोक, ब्राह्मणों का अभक्त, लोक से
शापित, कलह प्रिय होता है ( फल० ) 1
१३८-खड्भ योग-नवमेश धन भाव में हो, धनेश नवम में हो, लग्नेश केन्द्र या कोण
में हो तो खग या खड्ग योग होता है। फल-वेद के अर्थ झो जानने वाला, सभी
"शास्त्र तथा ज्योतिष और तंत्रों के तत्व को जानने वाला, बुद्धि प्रताप बल पराक्रम से
सुखी रहे । मत्सरता विरहित, अपने पराक्रम में श्रेष्ठ, कार्य कुशल, कृतज्ञ ।
१३९-वंशावतार-शुक्र और गुरु केन्द्र में हों, शनि उच्च का होकर केन्द्र में हो,
चर लग्न में जन्म हो । फल-पुण्य चरित्र वाला, तीर्थ सेवी, कलाविद, काम में आसक्त,
सामयिक, जितेन्द्रिय, वेद तत्त्व ज्ञाता, वेद शास्त्र का अधिकारी, राज्य श्री वाला ।
१४०-कूमं योग-शुभ ग्रह ५, ६, ७, भाव में और पाप ग्रह ३, ११, १ भाव में
अपने उच्च में हों । फल-राजा, धीर, धर्मात्मा, गुणी, यशस्वी, उपकारी, नेता,
सुखी ( वृ० पा० ) ।
अन्य०-शुभ ग्रह स्वगृही उच्च या मित्रांशक का ५, ६, ७ घर में हो और पाप
ग्रह लाभ या लग्न में मित्र गृही या उच्च का हो तो कूर्म योग होता है (जा० पा०)।
फल-विख्यात कीति, राज सुख भोगी, धर्मात्मा, सुत गुणी, धैयंवान्, सुखी, वक्ता
परोपकारी, मनुष्यों का नायक ( राजा ) ( जा० पा० )।
१४१-कुसुम योग ( ३३ कुसुम योग से भिन्न ) स्थिर राशि लग्न में हो, शुक्र केन्द्र मै और चन्द्रमा त्रिकोण में शुभ ग्रह युत हो और शनि दशम में हो । फल-राजा या राजा के तुल्य, दाता, भोगी, सुखी, कुल में श्रेष्ठ, गुणी विद्वान् ( वृ० पा० ) | अन्य० स्थिर लग्न हो शुक्र केन्द्र में हो चन्द्रमा शुभ युक्त त्रिकोण या पांचवे भाव में हो और शनि दशम में हो ।
फल-दानी, राजा से पूजित, भोगी, उत्तम कुल में उत्पन्न राजाओं में मुख्य, समस्त लोको में यशस्वी प्रतापी राजा ( जा० पा० )।
१४२-कल्पद्रुम-लग्नेश तथा लग्नेश जिस राशि में हो उसका स्वामी फिर वह जिस राशि में हो उसका स्वामी और उसका नवांशपति ये सब यदि केन्द्र त्रिकोण में या अपने २ उच्च में हों । फल-पब सम्पत्ति से युक्त राजा, धर्मात्मा, बली, युद्ध-प्रिय और दयालु ।
१४३-बुध योग-छग्न में गुरु, गुरु से केन्द्र में चन्द्र, चन्द्र से दूसरे राहु हो, पराक्रम से तीसरे स्थान में सूर्य और मंगल हो तो बुध योग होता है। फछ-राज श्री से युक्त, विशेष वली, बड़ा नामी, शास्त्र ज्ञाता, व्यापार में चतुर, वृद्धिमान, शत्रु रहित । १४४-लग्च अघियोग-छग्न से ६, ७ और ५ स्थान में शुभ ग्रह हो पाप ग्रह से
नाभस भादि योग : ४३१
युक्त या दृष्ट न हो, चतुर्थ में भी पाप ग्रह न हो तो लग्नाधि योग होता है। फल- बहुत शास्त्रों का रचने वाला, विद्या से विनीत, बहुत बल का अधिकारी, मुख्य,
निष्कपट, महात्मा, लोक में यश वित्त गुण से युक्त ( जा० पा० )।
अन्य०-लग्न से ७, ८ भाव में शुभ ग्रह हो उस पर पापग्रह की दृष्टि या योग न
हो तो लग्नाधियोग होता है । फल-बड़ा ही विद्वान्, महात्मा ओर सुखी (वृ० पा०) |
१४५-(१) हरि योग-छग्नेश से २, ८, १२ घर में शुभ ग्रह हों ( जा० पा० )।
अन्य-द्वितीयेश से २, ८, १२ घर में शुभ ग्रह हो ( जा० पा० ) ।
(२) हर योग-प्तमेश से ४, ९, ८ घर में शुभ ग्रह हो ( वृ० पा० ) |
अन्य०-सप्तमेश से ४, ९, ८ घर में यथा संभव गुरु चन्द्र वुध हो (जा० पा०)।
(३) ब्रह्म योग-लाभेश से ४, १०, ११ घर में शुभ ग्रह हो (वृ- पा०) ।
अन्य०-छग्नेश से ४, १०, ११ घर में सूर्य शुक्र मंगल हो ( जा० पा० )।
तो इन तीनों योगों में उत्पन्न सुखी विद्वान्, धन पुत्रादि से युक्त हो (वृ० पा०) ।
अन्य-सभी शास्त्रों का ज्ञाता सत्यवादी, सफल, सुख भोगी, प्रिय वादी, काम
शील, शत्रुजित्, उपकार कर्ता, पुण्य कर्मी ( जा० पा० ) ।
१४६-दन्य, खल और महायोग-छग्न से आरम्भ होकर १२ भाव तक भावेशों
की जोड़ी से होने वाले ६,६ योग बनते हैँ ।
१-दन्य योग-इसमें ६,८,१२ भाव के स्वामियों से ३० योग बनते हैं ।
१-वारहवें भाव का स्वामी शेष किसी भी ११ भावों में हो परन्तु द्वादशेश
जहाँ हो उस भाव का स्वामी १२ वें भाव में हो । ११ भेद
२--षष्ठेश शेप १० किसी भाव में (१,२,३,४,५,७,८,९,१० या ११) भाव
में हो और उसका स्वामी छठे भाव में हो । १० भेद
३--अष्टमेश शेष ९ भावों में से किसी में हो (१,२,३,४,५,७,९,१०,११)
भाव में से किसी में हो और उस भाव का स्वामी ८ बें भाव में हो। ९ भेद
योग ३०
२--खल योग
१--तीसरे भाव का स्वामी शेष १,२,४,५,७,९,१० ओर ११ इन ८ भाव
में से कहीं हों और उस भाव का स्वामी तीसरे भाव में हो । ८ भेद
योग ८
३-महायोग
१--लग्तेश शेष २,४,५,७,९,१० या ११ इन ७ भाव में कहीं हो ओर
उस भाव का स्वामी लग्न में हो । ७ भेद
२--दूसरे भाव का स्वामी शेष ६ घर ( ४,५,७,९,१० या १) भाव) में
हो और उसका स्वामी दूसरे भाव में हो । ६ भेद
३--चतुर्थेश शेष ५ घर ( ५,७,९,१० या ११ भाव ) में से किसी में हो
और उसका स्वामी चतुर्थं में हो । ५ भेद
४३२ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
४--पंचमेश शेष ४ घर ( ७,९, १०, या ११ भाव ) में से किसी में हो
ओर उसका स्वामी पंचम भाव में हो । ४ भेद
५-सप्तमेश शेष ३ घर ( ९, १० या ११ भाव ) में से किसी में हो और
उस भाव का स्वामी सप्तम में हो । ३ भेद
६-नवमेश शेष २ घर ( १० या ११ भाव ) में से किसी घर में हो परन्तु
उसका स्वामी (जहाँ नवमेश है) ९ भाव में हो। | हि
७-दशमेश ११ वें भाव में हो और उसका स्वामी अर्थात्: ग्यारहवें भाव
का स्वामी दशम भाव में हो | १,
फल:-- सव मिलाकर योग हो गये ६६
१-दैन्य-मूखं, दूसरों की बुराई करने वाला, दुष्ट कृत्य करने वाला, अपने शत्रुओं
से दुःखित, ऋरोक्ति बोलने वाला, चंचल मन, सब कार्यो में बाधा ।
२-खल-कभी क्रोधी दुवंचन बोलने वाला, कभी नम्र भाषी, कभी सब प्रकार
की उन्नति प्राप्त करे कभी बहुत दुःख आपत्ति,दरिद्रतो या इसी प्रकार के कष्ट भोगे ।
३-महायो ग-देवी के आशीर्वाद से युक्त, ध॑न का «वामी, विचित्र रंग की वस्तु
धारण करे, सुवर्ण अलंकार से विभूषित, राजा से बहु मान्य, कीमती उपहार प्राप्त हो
और कुछ भी अधिकार उसे प्राप्त हो, वाहन, घन और संतान प्राप्त हो ।
१४७-चामर आदि १२ योग ।
ये योग पूर्व कथित योगों से भिन्न हैं।
' लग्न में १२ भाव के १२ योग बनते हैं ।
वह भाव शुभ ग्रह युक्त या दृष्ट हो या अपने उच्च या स्वक्षेत्र में हो तब ये
क्रमानुसार १२ भाव के १२ योग बनते हैं ।
१२ योग--
(१) चामर, (२) घेनु, (३) शौर्य, (८) जलधि, (५) छत्र, (६) अस्त्र, (७)काम,
(ऽ) आसुर, (९) भाग्य, (१०) ख्याति, (११) सुपारिजात, (१२) मुसल । इनके फल--
(१) चामर-शुक्ल चन्द्र के अनुसार प्रतिदिन महत्व बढे, शीलवान्, प्रसिद्ध, जनपति, दीर्घजीवी, श्री देवी का निधि हो ।
(२) घेनु-अच्छा भोजन, पानी प्राप्त, धनी, सब बात में अच्छी प्रकार से विद्या प्राप्त, कुटुम्ब से विभूषित, बहुत सुवणं, रत्न, धन अन्नादि से पूर्ण कुवेर देव समान प्रकाशित हो ।
(३) शौयं-भाइयो से जो स्वतः कीतिलाभ कर चुके हों, प्रशंसित और विक्रम
ऐसा प्राप्त हो जिससे दूसरे प्रशंसा करें और वह श्रीराम के समान प्रकाशित हो जिसे राज कार्य निरत ओर अति यशस्वी, प्रत्येक मनुष्यों का प्यारा हो । (४) जलधि-( अम्बुधि )-अन्न, घन, यौ से धनी, बंधु से पूर्ण, सुन्दर घर अच्छी स्त्री, रत्न कपड़े और आभुषण प्राप्त हों । आदरणीय और उच्च पद प्राप्त हो,
दाद आदि बॉय : ४३३
सुख स्थिर और अंत तक रहे । हाथी, घोड़ा आदि वाढून पर बात करे, राजा से
सम्मानित, ब्राह्मण ओर देव॑ के लिए भक्ति, सड़क पर कुओँ, दाळाव आदि बतवने में
उत्सुकता पूवंक अपने को लगावे ।
(५) छत्र-अच्छी स्त्री, ओर संतान प्राप्त, सुखी, बरी, प्रसिद्ध, दुन्दर भाषा,
“विद्वानू, राजा का मंत्री, तीक्ष्ण बुद्धि, आदरणीय 1
(६) अस्त्र-अपने बड़े बळी शत्रु को बलपूर्वक दमन करें, अपने बर्ताव में छूर ओर
अभिमानी, अंग में ब्रण के चिल्ल, शरीर बलिष्ठ, विवादकारी ( झगडा ) ।
(७) काम -दूसरे की स्त्री की ओर दृष्टि भी न डाले, अच्छी स्त्रो, संतान ओर
बंधु युक्त, अपने स्वतः के गुण से अने पिता से अधिक्र प्रकाशित ओर उच्च पद को
प्राप्त ।
(८) आसुर--दूसरे का काम विगाड़े, चुगल खोर, अपने स्वतः के कार्य में अपने
कार्य बनोने में लगा हुआ, दरिद्री परन्तु जिद्दी, नीच कोय कर्ता, अपने स्वत: उपद्रवी
काम करने में दुःखी रहें ।
(९) भाग्य--पालकी में चले,साथ अच्छे वाजे ब॒जते रहें ऊपर चौरी डोलती रहे,
कभी अंत न होने वाला द्रव्य प्राप्त, प्रसिद्ध पुरुषों से वंदित, धर्म मागं में स्थित, मित्र
देवताओं और ब्राह्मणों की पूजा कर उचित रीति से प्रसन्न करे, अपना आचार पालन
करे, सव कुल का छोकाचार पालन करे सुहूद न हो ।
(१०) ख्पाति--राजा हो छोगों से अनुमोदित आचरण करके अरनो प्रजा को
रक्षा करे, धन, संतान, स्त्री से भाग्यवान्, विशाल ख्याति प्राप्त करे, ओर उन्नति
शील हो ।
(११) पारिजात--नित्य मंगल कार्यों के वीच रहे, राजा हो, जमा किए हुए घव
का स्वामी हो, बहुत कुटुम्ब हो, सत्कथा श्रवण करे, विद्वान् हो, कुछ न कुछ शुभ कार्य
करता रहे ।
(१२) कुशल- बहुत कष्ट से उपाजित द्रव्य का स्वामी हो, अनादर हो उसका
धन स्थिर न रहे, अपना घन उचित कायं में बचें करे.। अपनी अन्त को दशा में कुछ
निश्चय पूर्वेक स्वर्ग प्राप्त हो, वह उजड्ड,अविच[रणीय, चंचल चित्त का हो 1
(१४८) अब आदि १२ योग
यदि १२ भावों के स्वामी लग्न से विचारने पर लग्न के आगे ६,५,१२ वें घर में
हों या यदि भाव पाप युक्त या पाप दृष्ट हो तो लग्न से १२ भाव तक विचारने से
१२ योग बनते हैँ
१--अब योग, २-निःस्व, ३ पृति, ४--कुह, ९ पामर, ६--दषं, ७--
दुष्कृति, ८--सरल, ९--निर्भाग्य, १ ०-दुर्योग, ११-३रिद्र योग, १ २-विप्रल योग ।
फल--
(१) अव योग- अप्रसिद्ध हो, अतिदरिद्री, अल्पजीवी, दुष्ट लोग उपे तुच्छ दृष्टि
से देखें, दुष्ट आचरण, कुरूप, स्वतः डमाडोल स्थिति ।
(] २-
४३४ ; सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
(२) निःस्व योग--सुवचन शून्य हो, बन्ध्या स्त्री मिले, बुरे साथियों के बीच रहे,
बुरे दांत, आँख हों, बुद्धि से हीन, अल्प संतान, विद्या रहित, शक्ति रहित, उसके शत्रु
उसका धन लूट लेवें । j
(३) मृति योग--शत्रू उसे जीत लेवें, भाइयों से रहित, लज्जा रहित, धन और
शक्ति हीन, श्रम से जो अनुचित कार्यों के करने से उत्पन्न हो, थका हुआ, उत्तेजित
मनोवृत्ति का हो ।
(४) कुहृ--मातृ, वाहन, भित्र, सुख, भूषण, बंधु इनसे रहित, स्थिति शून्य, पूवं
प्राप्त स्थान भी खों देवे, नीच स्त्री से प्रेम ।
(५) पामर-दुःखी जीवन, .अविचारणीय, झूठ बोलने वाला, वंचक, (दगाबाज)
संतान हानि हो, या संतान ही न हो, नीच जनों का प्रयोग करे, नास्तिक, अधिक
खान-पान करने वाला ।
(६) हर्ष योग-सुख, भोग, भाग्य, दृढ़ अंग युक्त, शत्रू ओं से जीते, पाप कर्म से
डरे, उसका मित्र हो वह प्रसिद्ध मुखिया हो, द्युति मित्र, कीति और संतान प्राप्त हो।
(७) दुष्कृति योग-स्त्री की हानि हो, पर स्त्री रत, बिना विचारे, आवारा,
विचरता रहे, प्रमेह आदि गुह्य रोग हों, राज से पीड़ा, बंघुजनों से परित्यक्त उसके £
कारण दुःख भोगे ।
(८) सरल योग-दीर्घायू, दृढ़ मति, निभंय, श्रीमान् विद्या सुत धन युक्त, आरंभ
में ही व्यापार में सफलता प्राप्त करे, शत्रुओं को दमन करे, निर्मल ख्याति हो ।
(९) निर्भाग्य योग-अपनी पैत्रिकी सम्पत्ति जमीन आदि सब नष्ट करे, साधु और
गुरुजनों का निदक, अघामिक, पुराने और पहिने हुए कपड़े पहिने, अभागी, बहुत दुःख
का पात्र हो । ५
(१०) दुर्योग-कोई कायं अपने शरीर की महानता से करे तो असफलता हो,
मनुष्यों की दृष्टि में लघु, दूसरों का द्रोही, अति स्वार्थी, केवल अपने पेट के पांलन की
चिन्ता करे, अपने घर से सदा गैर हाजिर रहे, और बाहर देशों में रहे 1
(११) दरिद्र योग-कर्ज से लदा, क्रूर, दरिद्र शरोमणि, कर्ण रोगी, सौभ्रात्र हीन, (अच्छे भाई से रहित) पाप या अपराध के कायं में चित्त, चालाकी से वात करें, दूसरों
से नीचता का व्यौहार करे ।
(१२) विमल योग-कम खर्च करे अधिक बचावे, प्रत्येक के साथ अच्छा सुखी, स्वतन्त्र और आदर का पात्र, अपने अच्छे गुणों के कारण प्रसिद्ध । दुर्योग पर विचार-यदि ६,८ यः १२ घर के स्वामी बली होकर केन्द्र या कोण में हों और १,१०,४ ओर ९वें घर का स्वामी बल हीन हो या अस्त हो और ६,८, १२वें घर में हो तब अशुभ फल होता है ।
परन्तु उपरोक्त के विपरीत हो अर्थात् ६,5,१२वं घर का स्वामी वलवान् होकर
केन्द्र या कोण में न हो और १,४,९ या १०वें घर का स्वामी ६,८,१२बे घर में न हो
और बली हो ओर अस्तंगत न हो तो शुभ फल होगा-वह भाग्यवान् होगो, धनवान्,