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भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 454 में से

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४२२ : सांचत्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड

नारी प्रिय, की तिमान्‌, दुर्ग का अधिकारी, बलाधिप, बल शौयेवान्‌ ६० वर्ष से

अधिक आयु ।

५७-विभावसु योग-मंगल स्वगृही व दशम स्थान में हो सूर्य उच्च का द्वितीय भाव में हो गुरु औरं चंद्र नवम स्थान में हों तो १२ वर्ष पर्यंत वंश प्रदीप, धनवान्‌, राजप्रिय भूमि स्वामी होता है ।

५८-नालक योग-भाग्येश स्थित नवांशेश लग्न में उच्चगत हो तो १२ वर्ष के

बाद राजा हो ।

५९-इन्द्र योग-पंचमेश लग्नेश का परस्पर परिवतंन हो, चंद्र पंचम स्थान में

हो तो सदा स्तुत, कीर्तिवान्‌, विशेष पराक्रमी, राजाधिराज भोगवान्‌ हो ।

अन्य०-चन्द्र से तीसरे मंगल, मंगल से सातवें शनि, और शनि से सातवें शुक्र हो,

शुक्र से सातवे गुरु हो तो इन्द्र योग होता है।

फल-विख्यात “शील वालो, गुणवान्‌, राजा हो या राजा के तुल्य धनी हो, वाचाल,

अनेक प्रकार से धन भूषण यश रूप प्रताप से युक्‍त हो ( जा० पारि० ) ।

६०-रवियोग-सूर्यं दशम स्थान में हो और दशमेश सूर्य सहित तृतीय भाव में

हो तो शास्त्राथं प्रक्रिया का सम्पन्न ज्ञाता, यथेष्ट काम युक्त भूमंडल का स्वामी,

स्वल्पाहारी, कमल सम नेत्र, राजाओं में वंदनीय होता है ।

६१-भास्कर योग--सूर्य से दूसरे बुध, बुध से ग्यारहवें चन्द्र, चन्द्र से त्रिकोण में गुरु हो ।

फल-पराक्रमी, प्रभु के सदृश, शास्त्रार्थविद्‌, रूपवान्‌, गांधवं विद्या का ज्ञाता, धनी, गणितज्ञ, धीर, समर्थ ।

६२-पारिजात-छग्नेश जिस राशि में हो उस राशि. का स्वामी जिस राशि में हो उसका स्वामी या उसका नवांशेश यदि केन्द्र या त्रिकोण में हो या अपनी उच्च

राशि में हो ।

फल-प्रष्य "गैर अंत्य अवस्था में सौख्य युक्त, राजाओं से पूजित, युद्ध प्रिय, हाथी घोड़ों से युक्त, अपने कमं धमं में रत और दयालु राजा । ६३-गजयोग-लग्नेश स्थित राशि से नवम राशि का स्वाप्ती ११ वें स्थान में चन्द्र युक्त इस भावेश से दृष्ट हो तो अश्वगज आदि वाहन २० वर्ष अनन्तर होते हैं । ६४-गंगा प्रवाह योग-षष्ठ में गुरु शुक्र हों, बुध सप्तम मकर राशि में हो, ५,७, ११ स्थानों में क्रमशः चन्द्र सूयं शनि हों तो तेजस्वी, धनवान्‌, अनेक भार्या पुत्रादि युक्त राजा, दिद्यावान्‌, विनोदी, गोष्ठी प्रिय, जितेन्द्रिय, यूर्णायुष्क: विनय सम्पन्न । ६५-अमरक योग-सप्तमेश, नवशेश बलवान्‌ हो, परिवर्तन इनफा हो तो आजान बाहु, पद्म पत्र नेत्र, व्यायाधिकार निपुण, कलत्र सौख्यवान्‌, ५० वर्ष के अनन्तर सुखों का अनुभव होता है ।

६६-कामिनी योग-गुरु द्विताय, शुक्र चतुर्थ, चन्द्र सप्तम, मंगल लाभ भाव में हो तो नगर गामाधिपत्य, भोग प्राप्त, प्रतापी हो ।