भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

DevanagariHindipublished454 पृष्ठ

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शुभ ग्रह हों तो चामर योग होता हे । फछ--टोज पुज्य, विद्रा, कदा, बॉडत, राजा, सर्वज्ञ, वेद शास्त्र अधिकारी, ७० वर्ष आयु ( जा० दा |!

५०-शिव योग-पंचमेश नवम मॅ, नवमेश दश

राजेश के केन्द्र में बुध हो-तो मिष्ठान्न भोजी, व्राह्मण सं

पाठक, पुर्णायु ।

५२-गौरी योग-राज्येश स्थित अंश राशि का स्वामी राज्य स्थाद में हो लग्नेश

से युक्त गुरु हो तो ३६-वर्ष के उपरांत दाता, कीतिमान्‌, भूमि सवानी भोगी

संतति होता दै । अन्य--नवमेश चन्द्र हो वह स्त्रगृही या उच्च का केन्द्र या त्रिकोण

में हो उस पर गुरु की दृष्टि हो तो गौरी योग होता है । फल-- सुन्दर अंग, इलाघित,

राजा का मित्र, पुत्र अच्छे आचरण के हों, कमळ सदृश मुख, विरोधियों

सवसे स्तुति प्राप्त ( फल० ) ।

५३-लक्ष्मी योग-भाग्येश स्थित अंश राशि का स्वामी भाग्य स्थान में हो,

उच्चगत पंचमेश से . युक्त हो तो आप्तं, कीतिमान्‌, घनवान्‌, लक्ष्मीवान्‌, राजा हो

अन्य-नवमेश.शुक्र हो वह स्वगृही या उच्च का होकर त्रिकोण या केन्द्र में हो तो लक्ष्मी

योग होता है । फल--लक्ष्मी का पात्र अच्छे वाहन पर वेठे या यात्रा करे, राजाओं

में श्रेष्ठ, अपने जनों को आनन्द देने वाला, दाता ( फल० ) । अन्य--लग्नेश बलवान्‌

हो भाग्येश फल त्रिकोण या उच्च या स्वगृही होकर केन्द्र में हो तो लक्ष्मी योग होता

है । फल--सुन्दर गुणी, राजा बहु पुत्र, धनी यशस्वी, धर्मात्मा हो ( वृ० पा० ) ।

अन्य--भाग्येश परमोच्च या फल त्रिकोण में होकर केन्द्र में हो और लग्नेश

बलवान्‌ हो तो लक्ष्मी योग होता है ।

फल--सुन्दर' गुण वाळा, बहुत देश का स्वामी, विद्या अर कीति से यक्त

कामदेव सदृश सुन्दर, दश दिशाओं में राजाओं से पूजित, श्रेष्ठ राजा, बहुत स्त्री तथा

पुत्र युक्त हो ( जा० पारि० ) ।

५४-भारती योग-२, ५, १०, स्थान का स्वामी उच्च में नवमेश युक्‍त हो ।

ऋरछू--त्रिछोक में विख्यात, सर्वज्ञ, दान प्रिय, उत्तम स्त्रियों का भोग कर्ता मुदु शरीर

कमल नेत्र, ब्रोह्मण भक्त कवि अल्पाहारी ये सब ४८ वर्ष में प्राप्त हो ।

भ५-कलानिधि-३,११ भाव का स्वामी सप्तम स्थान में हो सप्तमेश द्वादश भाव

में उच्च का हो, द्वादशेश गुर युक्‍त नवम स्थान में हो । तो मद्दामनस्वी, राज्याधिपति,

यशस्त्री मानी, ५० वर्ष से अधिक आयु ।

अन्य-ख्रुध शुक्र रो युक्त या दृष्ट गुरु २,५ भाव में हो या बुध शुक्र के राशिस्थ हो ।

फरू--गुणी, राज मान्य, निरोग, सुखी, धनी, विद्यावान्‌ ( बुक पा० ) । De

५६-देवेन्द्र योग-~जन्म लग्न स्थिर हो उसका स्वामी लाभ में हो २,१० भाव

के स्वामियो का परसुणर परिवर्तन हो लग्नेश बलवान्‌ होकर लग्न में हो तो साँदयंवान,