सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२६ : सचित्र ज्योतिष शिक्षा, तृतीय फलित खण्ड
उच्च में हो तो--उत्तम वंश जात, भूपति, घनवान् बलवान् हो ।
१०७. जल योग-सूर्य चन्द्रमा शानि केन्द्र मे हो या ९ या १२ भाव में हों और
अन्य ग्रह निर्बेल हों तो ऐश्वयं, ज्ञान, धन से हीन, पराया अन्न चाहने वाळा, चपल
अति दु:खी लोभी शीत प्रकृति होता है । १
५०८. काल सपं योग-राहु केतु जिस घर में हों उसके भीतर सब ग्रह हों एक
भी ग्रह बाहर न हो ।
फल---गरीब हो, दीर्घ जीवन न हो । यदि ३,४ ग्रह उच्च में हों और काल सर्प
योग हो तो गरीब तो न होगा परन्तु अधिक उन्नति शील न होगा । किसी की कुंडली
में काल सपं योग हो परन्तु केमद्रुम योगन हो ओर राजयोग हो जो केन्द्र और
त्रिकोण स्वामियों के योग से बने हों तो उन्नतिशील होगा ।
१०९. गज केशरी योग-चन्द्र से गुरु सातवें घर में हो ।
फल- आदरणीय, धनवान, दयालु उन्नतिशील बिना कोई पाप ग्रह के किसी
प्रकार के सम्बन्ध हुए यह योग हो तो उपरोक्त फल होता है । यदि पाप ग्रह का योग
वृद्धि हो तो उपरोक्त पूर्ण फल नहीं होगा ।
अन्य-लग्न या चन्द्र से गुरु केन्द्र में हो ओर शुभ ग्रह मात्र से युत या दृष्ट हो
तथा अस्त नीच शत्रु गृही न हो तब गज केशारी योग होता है ।
फल--तेजस्वी, धनवान्, मेधावी, गुण सम्पन्न, राजप्रिय हो (वृ० पा०) ।
अन्य-चन्द्र से गुरु केन्द्र में हो शुभ ग्रह से चन्द्र दृष्ट हो । शुभ ग्रह अस्त या नीच
के न हों तो गज केशरी योग होता है। फल-उपरोक्त (जा० पारि०) ।
११०. चन्द्र मंगल योग--चन्द्र से मंगल सातवें घर में हो अन्यमत से चन्द्र मंगल
एक साथ होतों ।
फल--कई शुभ उत्सव उसके घर में हों कीति मिले सुखी जीवन व्यतीत करे ।
१११. अमला योग या अमळ कीति योग-छम्न या चन्द्र से दशम स्थान में
शुभ ग्रह हो ।
फल--राजमाभ्य, भोगी, दानी, बंधुओं का प्रिय, परोपकारी, धर्मात्मा गुणी, आचारवान्, सौभाग्यवान्, धनी मृदु स्वभाव, भाषण के योग्य । ११२. महाभाग्य योग-मुरुष का दिन में जन्म लग्न और सूर्ये चन्द्र में विषम राशि या स्त्री का रात्रि में जन्म लग्न और सूर्य चन्द्र में सम राशि हो तव यह योग होता है। फल---सबको आनन्द देने वाळा, दानी, विख्यात, पृथ्वी क' राज करने वाला शुद्ध आचरण ५० वर्ष आयु । स्त्री इस योग में उत्पन्न हो तो धनी हो, पति दीघं जीवी हो पुत्र पौत्र भी दीघं जीवी हों भाग्यशाली अच्छे चरित्र वाली हो । ११३. सरस्वती योग-शुक्र गुरु और बुध त्रिकोण या दूसरे घर में हों गुरु भी
उच्च का स्वगृही या भिन्न गृही हो और वली हो तो वडा भारी बुद्धिमान् हो नाटक कविता करने या गद्य पद्य में अळंकार शास्त्र में निपुण हो, प्रवन्ध रचना शात्त्रार्थ करने में पारंगत, त्रिलोक में कीति फेले, बहुत धनी हो स्त्री और सन्तान युक्त भाग्य