सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २
Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2
बाबूलाल ठाकुर द्वारा
स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)
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नाभसं आदि योग : ४२५
अन्य-शुक्र से कोण में गुरु हो, गुरु से पांचवें चन्द्र से केन्द्र में सूयं हो तो मरुत योग होता है ।
फल-वाचाल विशाल हृदय, स्थूल, उदर-शास्त्र का ज्ञाता, धन सम्पन्न, क्रय-विक्रय में निपुण, राजा या राजा के सदृश धनी हो (जा० पारि०) ।
९४. थोमत योग-भाग्येश, राज्येश का परस्पर परिवर्तन हो और गुरु की दृष्टि
हो और लग्नेश से युक्त हो तो श्रीमान्, कार्यो में निपुण, भोक्ता, दाता, चिरायु हो ।
९५. दश योग-लग्न से ६,७ स्थानों में सब ग्रह वल युक्त हों तो प्रभू, धनवान् कीतिमान्, भोगवान् होता है
९६. इष्ट पाल योग-जन्म में सव ग्रह आपोक्लिम (३,६,९,१२) में हो तो राज्य
देने वाला होता है सुखी और पुण्यवान् हो ।
९७. अमोघ योग-सव शुभ ग्रह स्वोच्च या मूल त्रिकोण में हों तो राज सम्बन्धी
धन प्राप्त हो ।
९८. क्षेम योग-१,८,६,१० भाव के स्वामी स्वक्षेत्री हों तो कुट॒म्व क्षेत्र में
आसक्त हो, ऐश्वर्यवान् हो ।
९९. केशरी योग-चन्द्र के केन्द्र में गुर हो तो सिंह समान सव शत्रुओं का नाश
कर्ता, सभा में ढिठाई से बोलने वाळा, राजस वृत्ति का, दीघं जीवी, अति यशस्वी,
अति वुद्धिमान् अपनी शक्ति से सव से जय प्राप्त करे ।
१००. आय योग-लर्नेश, गुरु, शुक्र ये ३ ग्रह केन्द्र में हों तो दीर्घाय् हो ।
१०१. उत्तम योग-सूयं से आपोविलम में चन्द्रमा बलवान् होकर बैठा हो तो
नीति कुशल, धनवान्, ज्ञानवान् कायं निपुण हो ।
१०२. धनाकर्षण योग-लग्नेश लाभ में लाभेश नवम मे, नवमेश सप्तम में, सप्तमेश पञ्चम में, पञ्चमेश द्वितीय में द्वितीयेशे लग्न में हो तो धन का आकर्षण
करता है।
१०३. मत्स्थ योग-लग्न और नवम में शुभ ग्रह, पञ्चम में शुभ अशुभ दानो हॉ
तथा ४,५ में पाप ग्रह हो तो काळ ज्ञाता, दयालु, गुण वुद्धि बळ रूप यशा विद्या और
तपस्या में युक्त ।
अन्य-लग्न से नवम पाप ग्रह, पञ्चम भाव पाप और शुभ युक्त, ४ या ८ भाव
में पाप ग्रह हो तो मत्स्य योग होता है उपरोबत फल (जा० पारि०) ।
१०४. उपचय योग-३,-,१०,११ स्थानों में सव शुभ प्रह हों तो जातक बहुत
धनवान् हो, दिन दिन वृद्धि हो, सौन्दर्य गुण युवत, मानयुक्त, कीतिवःन्, सुखी हो ।
१०४ अ. वसुमती योग-लग्न या चन्द्र से सव शुभ ग्रह उपचय में हों तो सदा |
अपने घर में रहे उसके पास बहुत धन रहे (फल० ) ।
१०५. कुछ बद्धेन -योग-सव शुभ ग्रह सूय चन्द्र स पञ्चम में हों तो आयुष्मान्
यारोग्यदान्, धनवान्, पुत्र पौत्रादि संयुक्त होता है ।
१०६. नौ योग-गुरु वलवान् होकर धनेश सहित मूल त्रिकोण में हो लग्नेश