भारतकोश
सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

सचित्र ज्योतिष शिक्षा भाग २

Sachitra Jyotisha Shiksha Vol 2

बाबूलाल ठाकुर द्वारा

स्रोत: Motilal Banarsidass Edition · Motilal Banarsidass, Delhi (उद्गम)

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नाहव आदि योग : ४२९

अन्य ०--चन्द्र से छठे आठवें गुरु हो ळग्न से केन्द्र में न दो टी कट योग होता:

है । फल-राज्य कुल का भी दरिद्री हो अनेक कष्ट और प्रयाद दे नित्य यंतत्त रहे,

राजा का अप्रिय हो ( जा० पारि० ) ।

१२७-पद्म योग--( १ आकृति योग के द्वे योग से सिन्द ) छग्त दे, चन्द्र

से नवम स्थान में शुक्र से युक्त लाभेश हो तो १५ वर्ष के भीतर राज पूछित भोगी पुण्यवान्‌ हो । <

१२६-दंड योग--( १ आकूति योग के १३वें से भिन्न ) ३,४६.९१२ इन

राशियों पर सब ग्रह हों । फल-राज पद मिले, बड़ा पुष्पवान्‌ पृथ्वीएदि, तेजोमय,

सिंह के समान पराक्रम्‌ वाला बड़े बड़े घनी लोगों से सेवित हो ( मान ) 1

अन्य०--तृतीय स्थानेश उच्च का हो गुद तृतीय स्थान में हो मुकर से दृष्ट हों तों

गौधन भूमि से समृद्ध ग्रामाधिपत्य हो ( ज्यो० शा० ) ।

१२९-छत्र योग--( १ आकृति योग के १६वें योग के अतिरिक्त, अन्य प्रकार

का ) १.२,७,१२ भाव में सब ग्रह हों तो अपने वंश में श्रेष्ठ होता है, राजा होता है ।

१३०-चाप योग-( १ आकृति योग के १७वें योग से भिन्न प्रकार का ) कुम्भ

में शुक्र, मेष में मंगल, और स्वगृही गुरु हो तो राजा होता है ( मान० ) 1

अन्य०-चतुर्थेश दशमेश का परस्पर परिवर्तन हो लग्नेश उच्च में हो तो = वर्ष

के भीतर राज कोषाध्यक्ष हो महापराक्रमी कुल पूजित हो ( ज्यो० झा० ) 1

१३१-चक्र योग-( १ आकृति योग के २०वें योग से भिन्न ) दशम में राहु,

दशमेश लग्न में, लग्नेश नवम में हो तो २० ग्राम का अधिपति, सेनाधिपति हो, जन

स्तुति को प्राप्त हो ।

१३२-विद्युत ( दामिनी.) ( २ संख्या के योग के दूसरे योग से भिन्न ) लग्नेश

के केन्द्र में उच्च का लाभेश शुक्र युक्त हो तो त्याग, भोग में आसक्त, घनाध्यक्ष प्रभु हो।

१३३-केदार ( २ संख्यायोग के चोथा योग से भिन्त ) सब ग्रह मेषादि द्वादश

राशियों में क्रम से किसी चर राशि में हों तो-व्यापारवान्‌, सुखवान्‌, वित्तवान्‌ हो ।

१३४-गोल योग ( २ संख्या योग के सातवें योग से भिस्त ) पूर्ण चन्द्र गुरु शुक्र

से युक्त हो, नवम स्थान में बुध लग्नांश में हो तो विद्या विनय सम्पन्न ग्रामाधिकारी

चिरायु मिष्ठान्न भोजी हो ।

१३५-रज्जु योग-( ३ आश्रय योग के पहिले योग से भिन्त ) नवमेश के द्वाद￾शांश में पंचमेश पूर्ण चन्द्र से युक्त हो तो-विशाळ नेत्र, धनवान्‌, मानवान्‌, कोतिमान्‌,

पूत्रवान्‌, मध्य आयु का हो ।

१३६-मुसल योग ( ३ आश्रय योग के दूसरे योग से भिन्न ) दशम राहु हो,

दशमेश उच्च में हो शनि से दृष्ठ हो तो विशाल नेत्र, निर्मल मुख, मंत्री, व्यापार से

धनाजंन ।

१३७-माला योग ( ४ दल योग के पहले योग से भिन्त ) २, ९, ११ भाव के

स्वामी क्रम से ९, ११, २ स्थान में हो तो ३३ वर्ष बाद मंत्री घनाधिपति बराधिपः

कीतिमान्‌ होता है ।